Bhalchandra Sankashti Chaturthi 2026: आज 6 मार्च 2026 को भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है. इस दिन प्रथम पूजनीय भगवान गणेश जी की पूजा का विधान है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह दिन व्रत, साधना और चंद्र दर्शन का विशेष संयोग लेकर आता है. अब सवाल है कि आखिर भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का महत्व क्या है? भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2026 पर चंद्रोदय का समय क्या है? इस बारे में बता रहे हैं उन्नाव के ज्योतिषाचार्य ऋषिकांत मिश्र शास्त्री-
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी आज, नोट करें चंद्रोदय टाइम. (Canva)
Bhalchandra Sankashti Chaturthi 2026: सनातन धर्म में व्रत-त्योहारों का विशेष महत्व है. क्योंकि, यही तो हैं जो तन-मन की शुद्धि, आध्यात्मिक उन्नति और शारीरिक स्वास्थ्य का सशक्त माध्यम हैं. ये सभी व्रत-त्योहार किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित होते हैं. इसी आस्था से जुड़ा एक खास दिन है भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी, जो आज 6 मार्च 2026 को मनाई जा रही है. इस दिन प्रथम पूजनीय भगवान गणेश जी की पूजा का विधान है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह दिन व्रत, साधना और चंद्र दर्शन का विशेष संयोग लेकर आता है. इस दिन भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं और रात में चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलते हैं. मान्यता है कि, भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी पर सच्चे मन से किया गया व्रत जीवन की रुकावटों को कम करता है, मानसिक शांति देता है और आर्थिक स्थिरता लाने में सहायक माना जाता है. अब सवाल है कि आखिर भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का महत्व क्या है? भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2026 पर चंद्रोदय का समय क्या है? भक्तों के लिए क्यों खास है यह व्रत? इस बारे में India News को बता रहे हैं उन्नाव के ज्योतिषाचार्य ऋषिकांत मिश्र शास्त्री-
हिंदू पंचांग के अनुसार, चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आज यानी 6 मार्च 2026 को मनाई जा रही है. इसके बता दें कि, चतुर्थी तिथि 6 मार्च 2026 को शाम 7 बजकर 53 मिनट से प्रारंभ हो रही है. वहीं, इस तिथि की समाप्ति 7 मार्च 2026 को शाम 7 बजकर 17 मिनट पर होगी. वहीं, चंद्रोदय का समय रात करीब 9 बजकर 31 मिनट का है. परंपरा के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही खोला जाता है. इसलिए भक्त रात में चंद्र दर्शन के बाद पूजा पूर्ण करते हैं.
ज्योतिषाचार्य कहते हैं कि, संकष्टी चतुर्थी का सबसे महत्वपूर्ण क्षण चंद्र दर्शन का होता है. रात में जब चंद्रमा दिखाई देता है, तब भक्त दूध और जल से अर्घ्य अर्पित करते हैं. इसके बाद भगवान गणेश की आरती की जाती है और व्रत खोला जाता है. कई लोग इस समय परिवार के साथ प्रसाद बांटते हैं और गणपति से जीवन की समस्याएं दूर करने की प्रार्थना करते हैं.
ज्योतिषाचार्य के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी का संबंध चंद्रमा और गणेश ऊर्जा से माना जाता है. इसलिए ‘भालचंद्र’ नाम स्वयं संकेत देता है कि यह चंद्रमा से जुड़ा हुआ रूप है. कई प्राचीन चित्रों में भगवान गणेश के मस्तक पर चंद्रमा का चिह्न दर्शाया जाता है. इसलिए जब चतुर्थी तिथि और चंद्र ऊर्जा का मेल होता है, तब मन और बुद्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. यही कारण है कि इस दिन व्रत रखने और गणेश पूजा करने से मानसिक तनाव कम होने और निर्णय क्षमता बेहतर होने की बात कही जाती है.
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