Freshers to CXOs: भारत के कॉर्पोरेट जगत में स्किल-आधारित भर्ती की लगातार हो रही चर्चाओं के बावजूद भी IIT, IIM और BITS जैसे टियर-1 संस्थानों की डिग्रियां आज भी लोगों को पूरी तरह से हैरान करती हैं. दरअसल, यह दबदबा सिर्फ शुरुआती वेतन तक सीमित नहीं है, बल्कि करियर के उच्चतम स्तर (CXO) तक अपनी पकड़ बनाए रखनें में सबसे ज्यादा मददगार साबित भी है. तो वहीं, इसके पीछे कई ठोस मनोवैज्ञानिक और व्यावसायिक कारण बताए गए हैं.
कठोर चयन प्रक्रिया (The Filter Effect)
इस प्रकि्रया के दौरान कंपनियों के लिए टियर-1 डिग्री एक ‘प्रूवन ट्रैक रिकॉर्ड’ की तरह काम करती है. जहां, इन संस्थानों की प्रवेश परीक्षाएं (JEE, CAT) दुनिया की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक होती है. दूसरी तरफ नियोक्ताओं का मानना है कि जो उम्मीदवार लाखों में से चुने गए हैं, उनमें मानसिक दृढ़ता, समस्या सुलझाने की क्षमता और अनुशासन पहले से ही कहीं ज्यादा मौजूद है.
तैयार कार्यबल (Workplace Readiness)
लेकिन, शोध (Research) के मुताबिक, देखा जाए तो तकनीकी भूमिकाओं में टियर-1 और अन्य कॉलेजों का अंतर लगातार कम हो रहा है. हालांकि, गैर-तकनीकी (Non-tech) भूमिकाओं में टियर-1 छात्र काफी ज्यादा आगे रहते हैं. तो वहीं, दूसीर तरफ इन परिसरों का “इनविजिबल करिकुलम” जैसे केस स्टडीज, डिबेट्स और इंडस्ट्री एक्सपोजर, उन्हें कॉर्पोरेट भाषा, प्रस्तुति और दबाव में फैसले लेने के लिए बेहतरीन तरीका माना जाता है.
शक्तिशाली पूर्व छात्र नेटवर्क (Alumni Network)
तो वहीं, CXO के स्तर पर, भर्ती ज्यादातकर योग्यता से अधिक विश्वास और नेटवर्क पर फिलहाल पूरी तरह से निर्भर करती है. लेकिन, टियर-1 संस्थानों का एक मजबूत ‘एलुमनाई बेस’ होता है जो एक-दूसरे को रेफरल, मेंटरशिप और व्यावसायिक देने का काम करता है. इतना ही नहीं, यह ‘क्लब’ जैसा माहौल नेतृत्व की भूमिकाओं में उनकी पहुंच को सबसे ज्यादा आसान बनाने की कोशिश भी करता है.
तो वहीं, दूसरी तरफ कई कंसल्टिंग और निवेश बैंक अपनी टीम में टियर-1 स्नातकों को इसलिए रखते हैं ताकि वे क्लाइंट्स को अपनी गुणवत्ता का भरोसा दिला सकें. इसके अलावा, यह कंपनियों के लिए एक “मार्केटिंग टूल” के रूप में भी पूरी तरह से काम करता है.