JEE IIT Success Story: बचपन में गंभीर बीमारी से पैरों में लकवा होने की वजह से कैलिपर्स और बैसाखी सहारा बना लेकिन उन्होंने इसे कमजोरी नहीं माना बल्कि उसी शरीर के साथ आगे बढ़ने की ताक़त बनाई.
IIT Success Story: कहते हैं अगर इरादे मज़बूत हों, तो हालात कितने ही मुश्किल क्यों न हों, इंसान खुद को तराश ही लेता है. ऐसी ही एक प्रेरक कहानी है बिहार के पटना ज़िले के रहने वाले सौरभ कुमार की, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी को कभी हालातों के हवाले नहीं छोड़ा. सौरभ का बचपन आसान नहीं रहा. बहुत छोटी उम्र में तेज़ बुखार के बाद आई न्यूरोलॉजिकल समस्या ने उनके पैरों को लकवाग्रस्त कर दिया. चलने के लिए कैलिपर्स और बैसाखी उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन गए. लेकिन उन्होंने इसे कभी कमजोरी नहीं माना. उनके लिए यह कोई कमी नहीं, बल्कि उनके शरीर का एक अलग तरीका था दुनिया से जुड़ने का.
आर्थिक हालात भी चुनौतीपूर्ण थे. पढ़ाई के साथ-साथ ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सौरभ ने स्कूल के दिनों में मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान पर काम किया. वहीं उन्होंने मेहनत, आत्मनिर्भरता और ज़िम्मेदारी का असली मतलब सीखा. कम उम्र में काम करने का अनुभव उनके आत्मविश्वास की नींव बन गया. पढ़ाई के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ. तमाम अड़चनों के बावजूद सौरभ ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और आज वह एक इंजीनियरिंग ग्रेजुएट हैं. लेकिन उनकी पहचान सिर्फ़ पढ़ाई तक सीमित नहीं रही. उन्होंने खुद को खेलों में भी निखारा और अब बेहतरीन स्वीमर भी हैं.
सौरभ कुमार, IIT रुड़की के इंजीनियरिंग फिजिक्स डिपार्टमेंट के 2025 बैच के ग्रेजुएट, बिहार के पटना ज़िले से आने वाले 23 वर्षीय एथलीट हैं. वर्ष 2021 में JEE Advanced में PwD कैटेगरी में 165 रैंक हासिल कर सौरभ ने IIT रुड़की में इंजीनियरिंग फिजिक्स चुना. एयरोस्पेस का सपना रैंक के कारण पूरा न हो सका, लेकिन सिस्टम्स, मैकेनिक्स और इलेक्ट्रॉनिक्स की जिज्ञासा ने उन्हें इंजीनियरिंग फिजिक्स तक पहुंचाया. मार्च 2022 में वह सीखते हुए, समझते हुए अकेले कैंपस पहुंचे.
बचपन में प्रोस्थेटिक्स की सुविधा न होने के कारण सौरभ औपचारिक स्कूल नहीं जा पाए. क्लास 6 तक उनकी पढ़ाई घर पर ट्यूटर के ज़रिए हुई. बाद में जब उन्हें कैलिपर्स और बैसाखी मिले, तब उन्होंने शिवम स्कूल, बिहटा से क्लास 6 से 10 तक पढ़ाई की और फिर केंद्रीय विद्यालय, कंकड़बाग से 12वीं पूरी की.
किसान पिता और गृहिणी मां के साथ आर्थिक स्थिरता हमेशा अनिश्चित रही. क्लास 8 से 10 के दौरान सौरभ ने मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान पर काम किया और रोज़ 100–200 रुपये कमाए. दुकान के मालिक मोहम्मद एजाज उनके जीवन में एक अभिभावक जैसे बन गए. जाति, धर्म या पृष्ठभूमि से परे एक ऐसा रिश्ता, जिसने सौरभ को हर स्तर पर सहारा दिया.
क्लास 10 के बाद पढ़ाई छोड़ने का मन बना चुके सौरभ को उनके दोस्त शशि राज आनंद ने रोका. पटना ले जाकर उन्होंने भरोसा दिलाया कि हालात मिलकर संभाले जा सकते हैं. वही भरोसा आगे चलकर सौरभ की ज़िंदगी की दिशा बदल गया.
2024 में IIT रुड़की में PwD छात्रों के लिए एक इवेंट आयोजित करते हुए सौरभ की मुलाकात पैरालंपियन मोहम्मद शम्स आलम से हुई. यहीं से स्विमिंग की दिशा में उन्होंने अपना कदम उठाया है. जुलाई 2024 में शुरुआत कर तीन महीनों में ही उन्होंने स्टेट सिल्वर मेडल और नेशनल टॉप 10 में जगह बना ली. 2025 में गोल्ड मेडल्स और नेशनल चैंपियनशिप में चौथा स्थान हासिल किया. उनका यह सफ़र तेज़ था, लेकिन मेहनत से भरा रहा है.
आज सौरभ एक सेशन में 5 किमी तक तैरते हैं. मार्च 2026 में इटली में होने वाली वर्ल्ड पैरा स्विमिंग सीरीज़ के लिए उनका चयन हुआ है, पूरी स्पॉन्सरशिप के साथ. उनका अगल लक्ष्य वर्ष 2028 में आयोजित होने वाली पैरालंपिक्स में हिस्सा लेना है. यह कहानी किसी “असाधारण संघर्ष” की नहीं, बल्कि सिस्टम को समझकर, हर चुनौती को अवसर में बदलने की है.
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