Explainer- Oniomania Compulsive Buying Disorder: शॉपिंग करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन अगर यह लत बन जाए तो जल्दी मेंटल डिसऑर्डर में बदल जाती है. अगर आप उन लोगों में हैं जिन्हें हमेशा शॉपिंग की ही पड़ी रहती हैं तो जान लीजिए कि ये भी एक तरह की बीमारी है. इस बीमारी को मेडिकली भाषा में कंपल्सिव बाइंग डिसऑर्डर या ओनियोमेनिया कहा जाता है. मनोचिकित्सक डॉ. विवेक कुमार बता रहे हैं इस बीमारी के बारे में-
Oniomania Compulsive Buying Disorder: शादी-समारोह या त्योहारों पर खरीददारी करना एक सामान्य बात है. इस दौरान लोग घर की जरूरत के सामान से लेकर अपने और परिवार के लिए कुछ न कुछ लेते हैं. इस तरह की शॉपिंग 3 महीने में तो कोई 6 महीने में करते हैं. हालांकि, शॉपिंग करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन अगर यह लत बन जाए तो जल्दी मेंटल डिसऑर्डर में बदल जाती है. अगर आप उन लोगों में हैं जिन्हें हमेशा शॉपिंग की ही पड़ी रहती हैं तो जान लीजिए कि ये भी एक तरह की बीमारी है. डॉक्टर बेवजह या ज्यादा शॉपिंग को एक तरह की मानसिक बीमारी मानते हैं.
इस बीमारी को मेडिकली भाषा में कंपल्सिव बाइंग डिसऑर्डर या ओनियोमेनिया कहा जाता है. दुनिया भर में बहुत से ऐसे लोग हैं जो इस बीमारी के शिकार हैं, लेकिन वो इसे पहचान नहीं पाते हैं. एक आंकड़ों के अनुसार, विकासशील देशों में हर 20 में से 1 व्यक्ति इस बीमारी का शिकार होता है. अब सवाल है कि आखिर ज्यादा शॉपिंग करने की बीमारी क्या है? महिला या पुरुष… किसमें यह बीमारी अधिक होती है? किस उम्र के लोगों में इस बीमारी का खतरा? इस बारे में India News को बता रहे हैं राजकीय मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सक डॉ. विवेक कुमार-
2015 के लेखों के अनुसार, पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में ओनियोमेनिया की बीमारी की संभावना तीन गुना ज्यादा होती है. कंपल्सिव बाइंग डिसऑर्डर की शुरुआत कम उम्र से ही शुरू हो जाती है और ऐसा कम ही देखा गया है कि 30 साल की उम्र के बाद किसी में ये लक्षण पैदा हों. शोध में यह भी पता चला है कि ये समस्या समय के साथ बढ़ती जाती है.
2016 में हुई स्टडी “Compulsive Buying Behavior: Clinical Comparison with Other Behavioral Addictions” के अनुसार युवाओं में कंपल्सिव बाइंग बिहेवियर (CBB) लगातार 4.9% से बढ़ रहा है. इसमें 18 से 30 साल के युवा ज्यादा हैं. मनोचिकित्सक कहते हैं कि ओनियोमेनिया कंपल्सिव बाइंग डिसऑर्डर है. इसमें व्यक्ति को शॉपिंग करने की लत लग जाती है और बेवजह हर समय शॉपिंग करता है. ऐसा तनाव, एंग्जाइटी, अकेलेन, आत्मविश्वास की कमी समेत कई वजहों से हो सकता है.
1915 में जर्मन मनोचिकित्सक एमिल क्रेपेलिन ने शॉपिंग की लत को ओनियोमेनिया नाम दिया. ग्रीक में ओनियोस का मतलब सेल होता है और मेनिया का मतलब पागलपन. यह शब्द 1980 के बाद ज्यादा प्रचलन में आया. ओनियोमेनिया पर एक सर्वे हुआ जिसमें सामने आया कि जिन लड़कियों को शॉपिंग की लत होती है, वह सबसे ज्यादा अपनी लुक पर पैसा खर्च करती हैं. उन्हें कपड़े, जूते, हैंडबैग, मेकअप जैसी चीजें खरीदनी होती हैं.
ओनियोमेनिया के शिकार लोग हमेशा शॉपिंग की इच्छा रखते हैं. वह खुद को शॉपिंग से बिजी रखना चाहते हैं. अगर वह ऐसा ना करें तो परेशान हो जाते हैं. वह हद से ज्यादा चीजें खरीद बैठते हैं. शॉपिंग करने से उन्हें खुशी मिलती है, वह चाहकर भी खुद पर कंट्रोल नहीं कर पाते हैं. ऐसे लोग कभी बजट बनाकर शॉपिंग नहीं करते.
डॉक्टर कहते हैं कि, ओनियोमेनिया को कई सोशल और इकोनॉमिकल कारक भी प्रभावित करते हैं. सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर को देख उनका मन भी करता है कि वह रोज नई-नई चीजें खरीदकर ट्राई करें. वहीं, ई-कॉमर्स साइट्स भी बार-बार नोटिफिकेशन देकर या सोशल मीडिया पर प्रॉडक्ट्स को दिखाकर लोगों को शॉपिंग करने के लिए ललचाती हैं. इसके अलावा लोगों को इस बीमारी का शिकार क्रेडिट कार्ड ने भी बनाया है. इससे लोगों को खर्च करते वक्त पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ती. ऐसे में बेहतर है कि ऐसे लोगों से क्रेडिट कार्ड दूर रखें.
डॉक्टर बताते हैं कि, ओनियोमेनिया एक मेंटल डिसऑर्डर है, जिसके लिए थेरेपी ली जाती हैं. यह बीमारी कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी और मेडिसिन से ठीक हो सकती है. कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी में मरीज से बातचीत की जाती है और यह समस्या क्यों है, इसका पता लगाया जाता है. अगर व्यक्ति को किसी बात की चिंता है, कोई अवसाद है तो उसे पहचान कर उस पर काबू किया जाता है. लेकिन, यह सबकुछ डॉक्टर की सलाह से ही संभव है.
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