World Glaucoma Day 2026: वर्ल्ड ग्लूकोमा डे हर साल 12 मार्च को मनाया जाता है. इससे पहले आठ मार्च से 14 मार्च तक विश्व ग्लूकोमा सप्ताह मनाया जाता है. आज विश्व ग्लूकोमा सप्ताह 2026 का दूसरा दिन है. आंकड़ों के अनुसार, भारत में 1 करोड़ से ज्यादा लोग इस गंभीर बीमारी के शिकार हैं. वहीं, पूरी दुनिया में 8 करोड़ से ज्यादा लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं. हेल्थ एक्सपर्ट कहते हैं कि, ग्लूकोमा अंधेपन का सबसे बड़ा कारण है. आइए जानते हैं इससे बचने के उपाय-
आंखों के लिए जगह है काला मोतिया, जानें इससे जुड़ी खास बातें. (Canva)
World Glaucoma Day 2026: वर्ल्ड ग्लूकोमा डे हर साल 12 मार्च को मनाया जाता है. इससे पहले आठ मार्च से 14 मार्च तक विश्व ग्लूकोमा सप्ताह मनाया जाता है. आज विश्व ग्लूकोमा सप्ताह 2026 का दूसरा दिन है. इस दिन को मनाने का उद्देश्य ग्लूकोमा (काला मोतिया) के प्रति जागरूकता बढ़ाना है. इसका आयोजन विश्व ग्लूकोमा एसोसिएशन द्वारा किया जाता है. इस सप्ताह के जरिए, ग्लूकोमा के बारे में जानकारी देकर और आंखों की जांच कराने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. एक्सपर्ट की माने तो, काला मोतिया का जल्द पता लगाने के लिए 40 से अधिक उम्र वालों को हर 3 साल के अंतराल में आंखों और ऑप्टिक तंत्रिका की जांच करवानी चाहिए.
बता दें कि, ग्लूकोमा को हिन्दी में काला मोतियाबिंद या कांचबिंदु कहते हैं. आंकड़ों के अनुसार, भारत में 1 करोड़ से ज्यादा लोग इस गंभीर बीमारी के शिकार हैं. वहीं, पूरी दुनिया में 8 करोड़ से ज्यादा लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं. हेल्थ एक्सपर्ट कहते हैं कि, ग्लूकोमा अंधेपन का सबसे बड़ा कारण है. ऐसे में जरूरी है कि आंखों का ठीक से ख्याल रखते हुए प्रॉपर जांच कराएं. अब सवाल है कि आखिर काला मोतिया है क्या? क्या ग्लूकोमा की रिकवरी संभव है? क्या हैं काला मोतिया के लक्षण? ग्लूकोमा का रिस्क कम कैसे करें? इस बारे में India News को बता रहे हैं राजकीय मेडिकल कॉलेज कन्नौज के नेत्र रोग विशेषज्ञ आलोक रंजन-
विश्व ग्लूकोमा सप्ताह 2026 (8-14 मार्च) की थीम ‘ग्लूकोमा मुक्त विश्व के लिए एकजुट होना’ (Uniting for a Glaucoma-Free World) है. यह थीम ग्लूकोमा के कारण होने वाले अंधत्व को रोकने के लिए वैश्विक सहयोग, शीघ्र निदान और जागरूकता बढ़ाने पर केंद्रित है, क्योंकि यह मूक रूप से दृष्टि चुराने वाली लाइलाज बीमारी है. इसकी लापरवाही किसी को भी अंधा बन सकती है.
डॉ. आलोक रंजन कहते हैं कि, काला मोतिया या ग्लूकोमा से बचने के लिए आंखों की जांच जरूर करानी चाहिए. अगर परिवार का कोई सदस्य काला मोतिया से पीड़ित है तो ऐसे परिवार के सदस्यों में इसका खतरा 10 गुना तक बढ़ जाता है. बता दें कि, कैमरों की तरह काम करने वाली आंखों को मस्तिष्क से जोड़ने वाली नसों (ऑप्टिक नर्व) में ग्लूकोमा के कारण कमी आ गई तो इसकी रिकवरी करना संभव नहीं है. इस बीमारी के शरीर में कोई शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते. इसलिए नियमित जांच न कराने से अक्सर एक आंख की रोशनी जा सकती है.
तनाव आंखों की बीमारी को अधिक बढ़ावा देती है. ऐसा होने से शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन बढ़ जाता है. इसकी वजह से आंख का प्रेशर बढ़ जाता है. इससे कालामोतिया होने की संभावना बढ़ जाती है. एक्सपर्ट के मुताबिक, आंख में सामान्य दबाव की मात्रा 10 से 21 मिमी एचजी होता है. तनाव की वजह से यह कार्टिसोल हार्मोन बढ़ने के साथ-साथ यह दबाव भी बढ़ जाता है, जो आंखों की रोशनी के लिए बेहद खतरनाक है.
डॉक्टर सावधान करते हैं कि, यदि किसी को उच्च रक्तचाप, मधुमेह, थाइरॉयड की बीमारी है तो उन्हें आंखों का ज्यादा ध्यान देना चाहिए. क्योंकि, इस स्थिति में रिस्क बढ़ जाता है. इसके अलावा, जो लोग खांसी के लिए इन्हेलर, नाक में एलर्जी के कारण नेजल स्प्रे या त्वचा के संक्रमण के लिए कोई क्रीम या एंटी एजिंग के लिए दवा या इंजेक्शन लेते हैं, इनमें भी स्टेरॉयड होने की वजह से रिस्क बढ़ जाता है.
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