India News (इंडिया न्यूज), Ajmer News: अढ़ाई दिन का झोपड़ा, जो देश की सबसे प्राचीन मस्जिदों में से एक मानी जाती है, हाल ही में एक विवाद का केंद्र बन गया है। इस बार विवाद का कारण यहां नमाज अदा करने को लेकर है। हिंदू और जैन संतों ने इस मस्जिद में नमाज पढ़ने का विरोध किया है, क्योंकि इस ऐतिहासिक इमारत के गर्भगृह और बाहरी दीवारों के खंभों पर हिंदू और जैन मंदिरों की वास्तुशिल्प शैली स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। साल 2024 की शुरुआत में जब एक जैन साधु अढ़ाई दिन के झोपड़े को देखने पहुंचे, तो उन्हें समुदाय विशेष के लोगों ने रोक दिया। इस घटना के बाद विवाद बढ़ गया, क्योंकि अढ़ाई दिन का झोपड़ा एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, जिसे भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया जाता है। इसके बाद पूरे देश के जैन समुदाय ने प्रशासन के सामने अपनी आपत्ति दर्ज कराई।
अढ़ाई दिन का झोपड़ा 1192 ईस्वी में अफगान सेनापति मोहम्मद गोरी के आदेश पर कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाया गया था। इस स्थान पर पहले एक बड़ा संस्कृत विद्यालय और मंदिर थे, जिन्हें तोड़कर मस्जिद में बदल दिया गया था। मस्जिद के मुख्य द्वार के बाईं ओर एक संगमरमर का शिलालेख है, जिस पर संस्कृत में उस पुराने विद्यालय का उल्लेख है। इस मस्जिद में कुल 70 स्तंभ हैं, जो उन मंदिरों से लिए गए थे जिन्हें ध्वस्त कर दिया गया था, लेकिन स्तंभों को वैसे ही रहने दिया गया था। इन स्तंभों की ऊंचाई करीब 25 फीट है और हर स्तंभ पर सुंदर नक्काशी की गई है।
Ajmer: ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ पर बढ़ा विवाद
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इस मस्जिद का निर्माण उस समय हुआ जब मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराकर अजमेर पर विजय प्राप्त की थी। माना जाता है कि गोरी को अजमेर में स्थित कई सुंदर हिंदू धर्मस्थलों ने आकर्षित किया। उन्होंने अपने सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को आदेश दिया कि इनमें से सबसे सुंदर स्थल पर मस्जिद बनाई जाए। गोरी ने इसके लिए सिर्फ 60 घंटों (अढ़ाई दिन) का समय तय किया था। हेरात के वास्तुकार अबु बकर ने इस मस्जिद का डिज़ाइन तैयार किया था, और हिंदू श्रमिकों ने बिना रुके लगातार काम करते हुए इसे 60 घंटों में पूरा किया।
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अढ़ाई दिन का झोपड़ा आज एक ऐतिहासिक धरोहर है, लेकिन इसके इतिहास और संरचना को लेकर कई विवाद उठ चुके हैं, खासकर धार्मिक दृष्टिकोण से। जहां एक ओर यह मस्जिद और पर्यटन स्थल के रूप में महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर इसकी वास्तुशिल्प शैली और इतिहास के कारण यह विभिन्न समुदायों के बीच तनाव का कारण बनता है।