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Babu Jagjivan Ram: पहले इंदिरा गांधी की तारीफ फिर विरोध, क्यों 2 बार PM बनने से चूके ‘बाबू’

Babu Jagjivan Ram: संविधान निर्माता बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर के बाद दलितों के बड़े नेताओं में शुमार जगजीवन राम उपप्रधामंत्री तो बने, लेकिन दो-दो बार पीएम बनने से वंचित रहे गए.

Babu Jagjivan Ram: भारतीय राजनीति में बाबू जगजीवन राम का अहम स्थान है. वह देश के कुछ चुनिंदा नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने ना केवल देश की आजादी में योगदान दिया बल्कि जरूरत पड़ने पर वह सरकार के खिलाफ भी गए. दलित समुदाय से आने वाले जगजीवन राम के लिए हर दौर में और हर जगह मुश्किल आई. पढ़ाई से लेकर राजनीति में अपनी जगह बनाने के लिए उन्हें अन्य नेताओं की तुलना में अधिक संघर्ष करना पड़ा. भारत के उपप्रधानमंत्री का पद संभालने वाले जगजीवन राम देश के रक्षा मंत्री भी रहे. 1971 के भारत-पाकिस्तान के बीच चले युद्ध के दौरान जगजीवन राम ही देश के रक्षा मंत्री थे. बहुत कम लोग जानते होंगे कि ‘बाबूजी’ के नाम से भारतीय राजनीति में चर्चित जगजीवन राम के नाम 50 साल तक सांसद रहने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी दर्ज है. इसे अब तक कोई नहीं तोड़ पाया है. भारतीय राजनीति में बहुत काबिल नेता होने के बावजूद वह एक नहीं बल्कि दो-दो प्रधानमंत्री बनने से चूके. इस स्टोरी में हम जानेंगे जगजीवन राम की राजनीति, निजी जीवन और दो-दो बार पीएम ना बन पाने की असली वजह. 

शिक्षा हासिल करने में  आईं कई अड़चनें

बिहार के भोजपुर जिले के चांदवा गांव में सोभी राम और वसंती देवी के यहां 5 अप्रैल, 1908 में जन्में जगजीवन राम दलित परिवार से ताल्लुक रखते थे. आसपास स्कूल नहीं था, लेकिन पढ़ने के शौक और जुनून के चलते माता-पिता भी मजबूर हुए. माता-पिता के प्रयास के बाद उन्होंने आरा टाउन स्कूल से शुरुआती शिक्षा ग्रहण की. वह बचपन में ही समझ गए थे कि शिक्षा की लौ ही दलितों के जीवन में उजियारा ला सकती है. बचपन में ही उन्होंने ठान लिया था कि वह बड़े होकर  दलितों के लिए कुछ बड़ा करेंगे. इसके लिए खुद को शिक्षित  और सक्षम बनाने की जुगत में जुट गए.  

सुनने को मिलते थे ताने

उस दौर में भी बिहार भी अन्य राज्यों की तरह जातियों और वर्गों में बंटा था. उच्च वर्ग और निचले वर्ग की खाई बहुत चौड़ी थी. दलित समाज से संबंध रखने के कारण उन्हें अपने शुरुआती दिनों में बहुत मुश्किलों को सामना करना पड़ा. दलित होने के नाते ताने सुनने को मिलते थे. उन्होंने दलितों के साथ हो रहे भेदभाव  और कटाक्ष को बहुत ही करीबी से देखा, समझ और महसूस किया. जाति आधारित भेदभाव को झेलने वाले जगजीवन राम का हौसला टूटने के बजाय दृढ़ होता गया. प्राथमिक शिक्षा आरा से हासिल करने वाले जगजीवन राम ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की.

बेहद करीब से देखा दलितों संग भेदभाव

जगजीवन राम का जीवन संघर्षपूर्ण रहा. स्कूली शिक्षा उन्होंने आरा शहर से हासिल की, क्योंकि भोजपुरी जिले में घर के नजदीक कोई स्कूल नहीं था. जातिगत भेदभाव से आज भी जूझ रहे बिहार में उस समय भी स्कूल में किसी दलित लड़के का पढ़ाई करना आसान नहीं था. आरा शहर में स्कूली शिक्षा ग्रहण करने के दौरान पहली बार भेदभाव का सामना किया और यही से उनके मन में दलितों के लिए कुछ करने का ख्याल आया. बिहार के इस स्कूल में उन्हें अछूत (Untouchable) समझा जाता था. उच्च वर्ग से आने वाले बच्चे उन्हें चिढ़ाते थे.

स्कूल में झेली परेशानी

स्कूल में उन्हें अलग बर्तन से पानी पीना पड़ता था. स्कूल के बच्चे उन्हें रोज यही एहसास कराते थे कि दलित हो और तुम्हें शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार ही नहीं है. बावजूद इसके जगजीवन राम शिक्षा के प्रति और अधिक दृढ़ होते गए. जगजीवन राम ने स्कूल में ही एक दिन उस घड़े यानी बर्तन को तोड़कर इसका विरोध भी किया. इसका असर यह हुआ कि प्रधानाचार्य को स्कूल में अछूतों के लिए अलग से रखे गए पानी पीने के बर्तन को हटाना पड़ा. यह उनकी पहली बड़ी जीत थी, लेकिन वह एहसास कर चुके थे कि लड़ाई अभी बहुत बाकी है.

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में भी हुआ अपमान

महात्मा गांधी से लेकर तमाम समाजसेवी भारतीय समाज में फैली जातीय भेदभाव की सच्चाई से पूरी तरह से रूबरू हो चुके थे. वह प्रयासरत भी थे कि भारतीय समाज से जातीय व्यवस्था के कलंक का निदान तलाशा जा सके. महात्मा गांधी ने तो साबरमती आश्रम (सत्याग्रह आश्रम) की भी स्थापना की. महात्मा गांधी ने 17 जून 1917 को अहमदाबाद में साबरमती नदी के तट पर इसकी स्थापना की. इस आश्रम का मकसद ही  सामाजिक कार्य, आत्मनिर्भरता और दलितों (हरिजनों) के लिए उत्थान था.

करना पड़ा भेदभाव का सामना

साबरमती आश्रम को हरिजन आश्रम भी कहा जाता था. महात्मा गांधी चाहते थे कि दलित के प्रति भेदभाव समाप्त हो और आश्रम एक प्रतीक बने, जहां  हर जाति और समुदाय के लोग रहें. इधर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता पंडित मदन मोहन मालवीय भी इसी तरह की कोशिश कर रहे थे. वह जगजीवन राम से प्रभावित भी हुए. इसके चलते वर्ष 1925 में पंडित मदन मोहन मालवीय और जगजीवन राम की मुलाकात हुई. मदन मोहन मालवीय ने खुद जगजीवन राम को  बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में आमंत्रित किया.  जगजीवन राम जब विश्वविद्यालय में पहुंचे तो उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा.

अनुसूचित जातियों को किया संगठित

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में सामाजिक बहिष्कार के बावजूद जगजीवन राम ने यही से शिक्षा ग्रहण की और  कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की. पढ़ाई के दौरान भेदभाव का सामना करने वाले जगजीवन राम ने इस घटना के बाद समाज के एक वर्ग के साथ इस प्रकार के सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ विरोध करने के लिए हौसला भी दिया. यह लड़ाई आसान नहीं थी, इसलिए उन्होंने अनुसूचित जातियों को संगठित किया. जगजीवन राम ने कई बार रविदास सम्मेलन का आयोजन कर कलकत्ता (कोलकाता) के विभिन्न क्षेत्रों में गुरु रविदास जयंती मनाई थी. रविदास ने जातीय व्यवस्था के विरोध में भी और उन्होंने इसके खिलाफ बहुत कुछ लिखा भी था.

अखिल भारतीय शोषित वर्ग लीग की रखी नींव

 वर्ष 1934-35 के दौरान जगजीवन राम ने अखिल भारतीय शोषित वर्ग लीग (All India Depressed Classes League) की नींव रखी, जो अछूतों को समानता का अधिकार दिलाने के लिए काम करती थी. 1935 में ही उन्होंने हिंदू महासभा के एक सत्र में प्रस्ताव रखा कि पीने के पानी के कुएं और मंदिर अछूतों के लिए खुले रखे जाएं. वह जगजीवन राम ही थे, जिन्होंने वर्ष 1935 में बाबूजी रांची में हैमोंड आयोग से पहली बार दलितों के लिये मतदान के अधिकार की मांग की.

दो-दो बार गए जेल

कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही देश में आजादी की लौ जलने लगी थी. जगजीवन राम भी इस आंच में झुलसने से खुद को नहीं रोक पाए. महात्मा गांधी के विचारों ने उन्हें प्रभावित किया.  इसके बाद आजादी के आंदोलन में कूद पड़े. उन्होंने महात्मा गांधी के साथ सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. उस दौरान बाबू जगजीवन राम चुनिंदा दलित नेताओं में थे, जो एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और दलित नेता के तौर पर उभर रहे थे.

बहुत कम लोग जानते होंगे कि वह संविधान सभा के सदस्य भी थे. स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग ले रहे जगजीवन राम को वर्ष 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के चलते ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. राजनीतिक गतिविधियों के लिये 1940 के दशक में उन्हें दो बार जेल जाना पड़ा.

दो-दो बार चूके पीएम बनने से

बहुत कम लोग जानते होंगे कि जगजीवन राम के नाम 50 साल तक सांसद रहने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी दर्ज है. इतने काबिल नेता होने के बावजूद वह दो वर्ष के दौरान (1977 और 1980) में प्रधानमंत्री बनने से चूक गए. वर्ष 1977 में जनता पार्टी की जीत हुई तो जगजीवन राम को प्रधानमंत्री पद का अहम दावेदार माना गया. लेकिन बाजी मोरारजी देसाई मार ले गए. मोराजी देसाई को पीएम चुना गया. इससे वह बहुत आहत हुए. काफी मनाने और जयप्रकाश नारायण के अनुरोध पर वह कैबिनेट का हिस्सा बने.  उन्हें उपप्रधानमंत्री भी बनाया गया.

बेटे के स्कैंडल ने पहुंचाया नुकसान

पीएम नहीं बन पाने के पीछे एक और वजह थी कि  बेटे सुरेश राम के एक कथित अश्लील तस्वीरों के स्कैंडल ने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया. इसके साथ ही जगजीवन राम ने इमरजेंसी के समर्थन में कई भाषण दिए थे, इससे जनसंग के कई नेता उनके पीएम बनने के विरोध में आ गए. दो साल बाद ही वर्ष 1980 में हुए लोकसभा चुनाव में जगजीवन राम को जनता पार्टी ने पीएम पद का उम्मीदवार बनाया था, लेकिन जनता पार्टी को इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था. इस तरह दो-दो बार जगजीवन राम पीएम बनने से चूके. 

भारी बड़ा शुरुआत में इंदिरा गांधी का विरोध

1977 में इमरजेंसी लगी तो जगजीवन राम ने इंदिरा गांधी को मौन समर्थन दिया था. लगातार गिरफ्तारियों और विरोध से जगजीवन राम बेचैन हो गए. इसके बाद 1 फरवरी 1977 को इंदिरा गांधी से मुलाकात कर दमनकारी कानूनों को हटाने, मीडिया की स्वतंत्रता बहाल करने और गिरफ्तार किए गए लोगों को रिहा करने की गुजारिश की. इंदिरा गांधी नहीं मानीं तो उन्होंने कांग्रेस पार्टी और सरकार से इस्तीफा दे दिया. इसके बाद उन्होंने ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ नामक एक नई पार्टी बनाई.

JP YADAV

जेपी यादव डेढ़ दशक से भी अधिक समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. वह प्रिंट और डिजिटल मीडिया, दोनों में समान रूप से पकड़ रखते हैं. मनोरंजन, साहित्य और राजनीति से संबंधित मुद्दों पर कलम अधिक चलती है. अमर उजाला, दैनिक जागरण, दैनिक हिंदुस्तान, लाइव टाइम्स, ज़ी न्यूज और भारत 24 जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं.कई बाल कहानियां भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं. सामाजिक मुद्दों पर 'रेडी स्टडी गो' नाटक हाल ही में प्रकाशित हुआ है. टीवी और थिएटर के प्रति गहरी रुचि रखते हुए जेपी यादव ने दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक 'गागर में सागर' और 'जज्बा' में सहायक लेखक के तौर पर योगदान दिया है. इसके अलावा, उन्होंने शॉर्ट फिल्म 'चिराग' में अभिनय भी किया है. वर्तमान में indianews.in में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत हैं.

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