सब्सटेंसिव मोशन: भारतीय जनता पार्टी सब्सटेंसिव मोशन के तहत सांसद राहुल गांधी की अयोग्यता की मांग कर रही हैं ऐसे में चलिए विस्तार से जानें कि सब्सटेंसिव मोशन का क्या मतलब है.
सब्सटेंसिव मोशन
फरवरी 2025 में, दुबे ने लोकसभा में राहुल गांधी के खिलाफ एक प्रिविलेज मोशन फाइल किया था, जिसमें उन पर अपने भाषण में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने और देश की इज्जत को कम करने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया था. यह नया कदम सीनियर BJP नेता संजय जायसवाल की चिंताओं के बाद उठाया गया है, जिन्होंने स्पीकर को लिखे एक लेटर में गांधी के भाषण के कुछ हिस्सों को लिस्ट किया था, जिनके बारे में उन्होंने कहा था कि उन्हें रिकॉर्ड से हटा दिया जाना चाहिए. लिस्ट में गांधी का यह दावा भी शामिल है कि सरकार ने भारत माता को बेच दिया है.
स्पीकर के पास नोटिस को स्वीकार या अस्वीकार करने और यह तय करने का पूरा अधिकार है कि इसे कैसे लिया जाना चाहिए. अगर इसे स्वीकार किया जाता है, तो इस पर सदन में बहस की जा सकती है और वोटिंग के लिए रखा जा सकता है. कुछ मामलों में, आरोपों की जांच करने और रिपोर्ट देने के लिए इसे खास तौर पर बनाई गई कमेटी को भी भेजा जा सकता है. रोज़ाना की बहस का हिस्सा होने वाले रूटीन दखल के उलट, एक ठोस प्रस्ताव सदन को उठाए गए मुद्दे पर सीधे विचार करने और उस पर अपनी राय देने के लिए मजबूर करता है. यह देखते हुए कि राहुल गांधी विपक्ष के नेता के संवैधानिक पद पर हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाले किसी भी कदम के लिए एक स्ट्रक्चर्ड पार्लियामेंट्री सिस्टम की जरूरत होती है. एक ठोस प्रस्ताव वह फ्रेमवर्क देता है.
दुबे द्वारा बताए गए पत्र में राहुल गांधी के सार्वजनिक कार्यक्रमों और टिप्पणियों के उन पहलुओं पर भी सवाल उठाए गए हैं, जिनके बारे में BJP का कहना है कि वे राष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता पर असर डालते हैं. दुबे ने कहा है कि मोशन का मकसद पार्लियामेंट की इज्ज़त बचाना और अकाउंटेबिलिटी पक्का करना है. हालांकि, कांग्रेस ने लगातार ऐसी कोशिशों को पॉलिटिक्स से मोटिवेटेड और अपने सीनियर लीडरशिप को टारगेट करने की एक बड़ी कोशिश का हिस्सा बताया है.
फिलहाल, अगला कदम पूरी तरह से स्पीकर ओम बिरला पर निर्भर करता है. वह मोशन को मंज़ूर कर सकते हैं, मना कर सकते हैं, या नियमों के तहत कोई दूसरा रास्ता तय कर सकते हैं. जैसे-जैसे पार्लियामेंट का सेशन जारी है, यह डेवलपमेंट इस बात पर ज़ोर देता है कि रूल बुक कैसे ट्रेजरी बेंच और अपोज़िशन के बीच चल रहे टकराव का सेंटर बन गई है.
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