तिब्बती पठार भूवैज्ञानिक बदलाव: क्या एशिया का नक्शा धीरे-धीरे बदल रहा है? वैज्ञानिक क्यों कहते हैं कि 'दुनिया की छत' तिब्बती पठार 'बह रहा है'? सैटेलाइट्स ने कौन सा हैरान करने वाला और संभावित रूप से खतरनाक भूवैज्ञानिक व्यवहार दिखाया है और यह भविष्य के भूकंपों को कैसे प्रभावित कर सकता है? विस्तार से बताया गया है.
वैज्ञानिकों ने 'दुनिया की छत' तिब्बती पठार पर किया चौंकाने वाला खुलासा
वैज्ञानिकों ने तिब्बती पठार में होने वाले मूवमेंट को ट्रैक करने के लिए कोपरनिकस ‘सेंटिनल-1’ सैटेलाइट से मिले हाई-रिज़ॉल्यूशन मैप का इस्तेमाल किया. उन्होंने पाया कि तिब्बत का पूर्वी हिस्सा लगभग 25 मिलीमीटर प्रति वर्ष की गति से पूर्व की ओर बढ़ रहा है और अन्य क्षेत्र लगभग 10 मिलीमीटर प्रति वर्ष की गति से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं. यह अंतर बताता है कि बड़ी प्लेटें एक-दूसरे से खिंच रही हैं और टकरा रही हैं, जो इस विचार को चुनौती देता है कि महाद्वीप कठोर, न टूटने वाले ब्लॉकों से बने होते हैं.
पहले के मॉडल तिब्बती पठार को प्रमुख फॉल्ट लाइनों से अलग किए गए कठोर ब्लॉकों के मोज़ेक के रूप में दिखाते थे. हालांकि, नए अध्ययन से पता चलता है कि परत धीरे-धीरे बह रही है, एक ऐसा व्यवहार जिसे स्टैंडर्ड प्लेट टेक्टोनिक थ्योरी पूरी तरह से नहीं समझा पाती है. यह खोज बताती है कि महाद्वीपीय विरूपण और संरचना के पुराने मॉडलों को फिर से कैलिब्रेट करने की जरूरत है.
तिब्बती पठार लगभग 2.5 मिलियन वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, जिसकी औसत ऊंचाई 4,500 मीटर से ज़्यादा है, और यह भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान और चीन की सीमाओं को छूता है. पृथ्वी पर सबसे बड़े महाद्वीपीय टकराव क्षेत्र के रूप में, यहां छोटे मूवमेंट भी एशिया के लिए गंभीर परिणाम दे सकते हैं. सैटेलाइट डेटा वर्टिकल मूवमेंट का खुलासा करता है कि कुछ क्षेत्र 5 मिलीमीटर नीचे धंस रहे हैं और अन्य क्षेत्र 5 मिलीमीटर ऊपर उठ रहे हैं. ये सूक्ष्म बदलाव भविष्य में बड़े भूकंपों की संभावना वाले क्षेत्रों का संकेत दे सकते हैं.
इस रिसर्च के लिए, वैज्ञानिकों ने विश्लेषण किया कि 44,000 से ज़्यादा रडार इमेज और 14,000 से ज़्यादा GNSS (ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) माप. इससे वे मिलीमीटर तक सटीक वेलोसिटी मैप बना पाए, जो किसी महाद्वीपीय स्तर के अध्ययन के लिए अब तक का सबसे बड़ा जियोडेटिक डेटासेट है. यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) के विशेषज्ञों का कहना है कि यह डेटा भूकंप जोखिम मॉडल को बेहतर बना सकता है आपदा की तैयारी को बढ़ा सकता है और पूरे एशिया में समुदायों को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है.
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