ओडिशा के गंजाम जिले के खल्लिकोट की निवासी समीरा नायक आज हिम्मत, आत्मस्वीकृति और प्रतिभा की जीवंत मिसाल बनकर उभरी हैं. मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी समीरा ने बचपन से ही कला के प्रति असाधारण लगाव दिखाया, लेकिन अपनी लैंगिक पहचान को लेकर भीतर ही भीतर लंबा संघर्ष झेला है. सामाजिक दबाव और पारिवारिक आशंकाओं के बीच वर्षों तक स्वयं को अभिव्यक्त न कर पाने के बाद उन्होंने 2025 के नवंबर में जेंडर रीअसाइनमेंट सर्जरी करवाई थी. अब वे न केवल एक समर्पित कलाकार हैं, बल्कि कला शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.
सपनों की राह में सामाजिक चुनौतियां
समीरा की शैक्षणिक यात्रा खल्लिकोट से शुरू हुई थी. स्कूली शिक्षा के बाद उन्होंने आर.सी.एम. कॉलेज से प्लस टू पूरा किया और फिर सरकारी कॉलेज आर्ट्स और क्राफ्ट खल्लिकोट में दाखिला लेकर चार वर्षों तक फाइन आर्ट्स की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान उन्होंने परिवार के सामने अपनी वास्तविक पहचान साझा करने की हिम्मत दिखाई, लेकिन सामाजिक कलंक के भय से उन्हें तत्काल समर्थन नहीं मिला.
अपनी राह खुद बनाई, अब दूसरों को दिखा रहीं दिशा
इतना सब होने के बावजूद समीरा ने हार नहीं मानी और 2024 में राज्य से बाहर जाकर हार्मोन थेरेपी शुरू की. सर्जरी के बाद खल्लिकोट लौटकर समीरा ने उसी संस्थान में अतिथि अध्यापक के रूप में पदभार संभाली, जहाँ से उन्होंने कला की बारीकियाँ सीखी थीं. स्वास्थ्य पूरी तरह सामान्य न होने के बावजूद वे रोजाना क्लास ले रही हैं. उनके सहकर्मी और विद्यार्थी उनकी विषय-समझ, रचनात्मक दृष्टिकोण और संवेदनशील शिक्षण शैली की सराहना करते हैं.
ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए प्रेरक संदेश
समीरा का मानना है कि शिक्षा व्यक्ति को आत्मसम्मान और स्वतंत्र जीवन का हक प्रदान करता है. वे कहती हैं, “लैंगिक पहचान चाहे जो भी हो, यदि व्यक्ति शिक्षित है तो समाज में सम्मानपूर्वक आगे बढ़ने की राह बन सकती है. उनकी यह सोच ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए विशेष रूप से प्रेरक है. वहां के कला जगत ने समीरा की उपलब्धि को सकारात्मक बदलाव के रूप में देख रहा है.
आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा
उम्मीद की जा रही है कि उनका अनुभव और नजरिया आने वाली पीढ़ी के कलाकारों में संवेदनशीलता और समावेशी सोच को ज्यादा दृढ़ करेगा. खल्लिकोट की यह प्रेरक कहानी बताती है कि जब आत्मविश्वास और सृजनशीलता साथ रहते हैं, तो मुश्किल संघर्ष भी प्रेरणा में बदल जाता है.