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बाग्राम एयरबेस: भारत के लिए एक छुपा हुआ ख़तरा

Bagram Air Base: बाग्राम एयरबेस को अमेरिका ने 2021 में इसे खाली कर दिया था लेकिन इसकी रणनीतिक अहमियत अब भी बनी हुई है. आज जब इसे दोबारा हासिल करने की बातें फिर से उठने लगी हैं.

Bagram Air Base: अफ़ग़ानिस्तान के परवान प्रांत में स्थित बगराम एयरबेस, अमेरिका के सबसे लंबे युद्ध का एक अवशेष मात्र नहीं है. यह एक भू-राजनीतिक केंद्र है जिसका भविष्य दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन का निर्धारण कर सकता है. हालांकि 2021 में अमेरिकी सेना द्वारा इसे त्याग दिया गया था, फिर भी इसका सामरिक महत्व मिटने का नाम नहीं ले रहा है. आज जब वाशिंगटन द्वारा इस पर फिर से कब्ज़ा करने की माँग फिर से उठ रही है, तो इसके निहितार्थ अफ़ग़ानिस्तान से कहीं आगे तक फैले हुए हैं. विशेष रूप से भारत के लिए, बगराम अवसर नहीं, बल्कि ख़तरा है, जो अस्थिरता की नई लहरें पैदा करने की धमकी दे रहा है और साथ ही पाकिस्तान को शीत युद्ध के बाद से अभूतपूर्व तरीके से सशक्त बना रहा है.

दक्षिण एशिया का भू-रणनीतिक रत्न

इस एयरबेस की स्थिति ही इसे दुनिया की सबसे कीमती सैन्य संपत्तियों में से एक बनाती है. यह काबुल से महज़ 40 मील दूर है और एशिया के सबसे अशांत क्षेत्रों के बीचोंबीच स्थित है. इसके दो विशाल रनवे  11,800 और 9,688 फीट लंबे  किसी भी बड़े बमवर्षक, ड्रोन या कार्गो विमान को संभाल सकते हैं.पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा था कि बाग्राम, “उस जगह से सिर्फ़ एक घंटे की दूरी पर है, जहां चीन अपने परमाणु हथियार बनाता है.” इस क्षेत्र में कोई और सैन्य ठिकाना नहीं है जो चीन के इतने संवेदनशील क्षेत्रों के इतने क़रीब हो.

वायुशक्ति से परे: खुफिया लाभ

बाग्राम लंबे समय से अमेरिका के खुफ़िया निगरानी केंद्र के रूप में काम करता आया है. जहां उन्नत आईएसआर प्रणालियां हैं चीन के परमाणु मिसाइल ठिकानों, रूस की सेना की गतिविधियों और ईरान के नेटवर्क पर नजर रखी जाती थी. आज जब चीन अपने मिसाइल सिस्टम को तेज़ी से बढ़ा रहा है, तो ऐसे क़रीब से निगरानी करना अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम होगा.

महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता

असल में बाग्राम पर हो रही खींचतान अफ़ग़ानिस्तान के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक शक्तियों की होड़ का हिस्सा है.चीन ने अफ़ग़ानिस्तान में पहले ही अरबों डॉलर का निवेश किया है और उसे बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव में शामिल कर लिया है.
रूस ने 2025 में तालिबान सरकार को आधिकारिक मान्यता दे दी, ताकि अमेरिका की पहुंच कम हो. इन दोनों शक्तियों के लिए अमेरिका का बाग्राम लौटना एक शत्रुतापूर्ण कदम माना जाएगा, जो उन्हें फिर से शीत युद्ध जैसे मोड में ले जाएगा.

अफ़ग़ानिस्तान का खरबों डॉलर का खजाना

अफ़ग़ानिस्तान के पास करीब 1 ट्रिलियन डॉलर की खनिज संपदा है जिसमें लिथियम जैसे खनिज शामिल हैं जो वैश्विक ऊर्जा भविष्य के लिए अहम हैं. बाग्राम पर अमेरिका की पकड़ चीन को इन संसाधनों पर पकड़ बनाने से रोक सकती है.
लेकिन इसकी कीमत काफी ज़्यादा होगी.

तालिबान की लाल रेखा

काबुल में अब मज़बूती से जमे तालिबान ने अपनी स्थिति बिल्कुल स्पष्ट कर दी है. चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ फ़सीहुद्दीन फ़ितरत ने घोषणा की है, “हमें किसी भी धौंसिया या हमलावर का डर नहीं है. अफ़ग़ानिस्तान की एक इंच ज़मीन पर भी कोई समझौता संभव नहीं है.” विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुत्ताक़ी ने भी इसी तरह का रुख़ अपनाया है, और ज़ोर देकर कहा है कि तालिबान आर्थिक सहयोग का स्वागत तो करता है, लेकिन विदेशी सैनिकों की वापसी स्वीकार नहीं करेगा. तालिबान के लिए, बगराम सिर्फ़ एक अड्डा भर नहीं है.यह 2021 में संयुक्त राज्य अमेरिका पर उनकी विजय का अंतिम प्रतीक है. इस पर फिर से कब्ज़ा करने की अनुमति देना उनके शासन की वैधता को ही कमज़ोर कर देगा.

बीजिंग और मॉस्को की नज़दीकियां

जैसा कि अनुमान था चीन और रूस ने काबुल के विरोध का समर्थन किया है. शिनजियांग पर अमेरिकी निगरानी से चिंतित बीजिंग ने “तनाव बढ़ाने” के ख़िलाफ़ चेतावनी दी है. तालिबान शासन को वैध ठहराने के बाद, मॉस्को किसी भी अमेरिकी वापसी को अपने मध्य एशियाई क्षेत्र में सीधी घुसपैठ मानता है. साथ मिलकर, ये शक्तियाँ वाशिंगटन के विरुद्ध कूटनीतिक और वित्तीय दबाव बनाने की संभावना रखती हैं. इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि वे बगराम को घेरे में रखने के लिए अमेरिका-विरोधी मिलिशिया को समर्थन दे सकते हैं.

पुनः कब्ज़े की सैन्य चुनौती

भले ही वाशिंगटन वापस लौटने के लिए दृढ़ हो, फिर भी परिचालन चुनौतियां विकट हैं. सैन्य योजनाकारों का अनुमान है कि बगराम की सुरक्षा के लिए 10,000 से ज़्यादा सैनिकों की आवश्यकता होगी, साथ ही स्तरित हवाई सुरक्षा और विशाल रसद भी. फिर भी, भौगोलिक स्थिति अमेरिकियों के विरुद्ध है. पहाड़ों से घिरा और गुरिल्ला रणनीति के संपर्क में, यह अड्डा जल्द ही लगातार रॉकेट हमलों के अधीन एक किला बन सकता है, जो अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत युद्ध के दौरान अलग-थलग पड़े सैन्य चौकियों की याद दिलाता है.

बगराम की छाया में आतंकवादियों का पुनरुत्थान

अमेरिका की वापसी से चरमपंथी रोष भी भड़केगा. ISIS-K और अल-क़ायदा जैसे समूह पुनः कब्ज़े को भर्ती और दुष्प्रचार के लिए एक उपहार के रूप में इस्तेमाल करेंगे. ISIS-K, जो पहले से ही पुनरुत्थान कर रहा है ने 2024 में ईरान और रूस में विनाशकारी हमलों के साथ अपनी वैश्विक पहुंच दिखाई है जिसमें 230 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. अल-क़ायदा, हालांकि कमज़ोर हो गया है ने चुपचाप अफ़ग़ानिस्तान में नौ प्रशिक्षण शिविरों का पुनर्निर्माण किया है. दोनों समूह बगराम के पुनरुत्थान को “औपनिवेशिक आक्रमण” के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करेंगे, और मध्य पूर्व, अफ़्रीका और उसके बाहर से जिहादियों को इकट्ठा करेंगे.

जलता हुआ क्षेत्र

इसके परिणाम केवल अफ़ग़ानिस्तान तक ही सीमित नहीं रहेंगे. जुलाई से दिसंबर 2024 तक अफ़ग़ानिस्तान की धरती से पाकिस्तान में 600 से ज़्यादा हमले किए गए. अमेरिका की नई उपस्थिति इन नेटवर्कों को अमेरिकी सैनिकों और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों, दोनों के ख़िलाफ़ अभियान तेज़ करने के लिए प्रेरित करेगी. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान अपने हमले तेज़ कर देगा, जबकि उइगर उग्रवादियों को चीन को निशाना बनाने के लिए ISIS-K के घेरे में खींचा जा सकता है. ईरान और रूस गुप्त रूप से विद्रोहियों को धन और हथियार पहुँचा सकते हैं, जिससे एक लंबा छाया युद्ध सुनिश्चित होगा जो अमेरिकी संसाधनों को खत्म कर देगा.

भारत पर मंडराते खतरे

हालांकि भारत के लिए खतरे विशेष रूप से गंभीर हैं. सबसे तात्कालिक जोखिम सीमा पार आतंकवाद है. अफ़गानिस्तान स्थित समूह कश्मीर और पंजाब में जिहादी नेटवर्क के साथ परिचालन संबंध बनाए रखते हैं. अफ़गानिस्तान में फिर से उभरता उग्रवाद अनिवार्य रूप से भारत के अशांत क्षेत्रों में फैल जाएगा, जिससे उग्रवाद को नई गति मिलेगी. साथ ही, दक्षिण एशियाई दर्शकों को लक्षित चरमपंथी प्रचार भारत के भीतर सांप्रदायिक दरारों का फायदा उठाते हुए कट्टरपंथ को बढ़ावा देगा.

घेरेबंदी की दुविधा

चीनी घेरेबंदी की संभावना भी उतनी ही चिंताजनक है. पाकिस्तान पहले से ही चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की मेजबानी कर रहा है, ऐसे में अफ़गानिस्तान में बीजिंग की गहरी पैठ भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर शिकंजा कस रही है. विडंबना यह है कि बगराम में अमेरिकी उपस्थिति, चीनी परमाणु गतिविधियों का पर्दाफाश करके भारत को फ़ायदा पहुँचाने वाली ख़ुफ़िया जानकारी प्रदान कर सकती है. साथ ही, यह नई दिल्ली को एक ख़तरनाक संतुलन साधने की स्थिति में भी धकेल सकती है, जिससे उसे वाशिंगटन की अपेक्षाओं और बीजिंग के प्रकोप के बीच संतुलन बनाना पड़ सकता है.

नई दिल्ली के लिए आर्थिक दांव

आर्थिक रूप से भी दांव कम गंभीर नहीं हैं. भारत ने अपनी संसाधन सुरक्षा रणनीति के तहत अफ़गान खनिजों, विशेष रूप से लिथियम पर नज़र रखी है. लेकिन अगर बगराम एक अमेरिकी संपत्ति बन जाता है या अगर बीजिंग अपने खनन हितों को मज़बूत करता है, तो नई दिल्ली के लिए प्रतिस्पर्धा से पूरी तरह बाहर हो जाने का ख़तरा है. जब तक भारत शंघाई सहयोग संगठन और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर कूटनीतिक रूप से अपनी स्थिति मज़बूत नहीं करता, पाकिस्तान एक बार फिर अफ़गानिस्तान का मुख्य द्वारपाल बनकर उभर सकता है.

पाकिस्तान का रणनीतिक खजाना

वास्तव में बगराम के पुनरुद्धार का सबसे बड़ा लाभार्थी पाकिस्तान हो सकता है. अमेरिकी अभियानों के लिए ख़ुद को रसद गलियारे के रूप में पेश करके, इस्लामाबाद सहायता, हथियारों के हस्तांतरण और राजनीतिक प्रभाव के उस चक्र को पुनर्जीवित कर सकता है जिसका उसे शीत युद्ध और आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के दौरान आनंद मिला था. भारत के लिए और भी ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि पाकिस्तान के आतंकवादी गुटों को नई जगह मिल जाएगी. लश्कर-ए-तैयबा जैसे समूह अफ़गानिस्तान की पनाहगाहों का फ़ायदा उठा सकते हैं, जबकि इस्लामाबाद की “रणनीतिक गहराई” की पोषित अवधारणा फिर से स्थापित हो जाएगी.

भारत की दुविधा

वाशिंगटन के लिए दुविधाएं बहुत बड़ी हैं, लेकिन भारत के लिए विकल्प अस्तित्वगत हैं. सीमा सुरक्षा कड़ी करनी होगी, ड्रोन-रोधी प्रणालियों, ख़ुफ़िया नेटवर्क और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमताओं में निवेश करना होगा. साथ ही, नई दिल्ली तालिबान शासन की अनदेखी नहीं कर सकता. व्यावहारिक जुड़ाव, आर्थिक, कूटनीतिक और मानवीय यह सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी है कि पाकिस्तान काबुल पर एकाधिकार न जमा ले.

रणनीतिक धैर्य और साझेदारी

भारत को रूस को अलग-थलग किए बिना, बीजिंग के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान के साथ साझेदारी का भी लाभ उठाना चाहिए. रणनीतिक धैर्य ज़रूरी होगा. वाशिंगटन के विपरीत, भारत अफ़गानिस्तान को प्रयोग के रंगमंच के रूप में नहीं देख सकता. नई दिल्ली के लिए, दांव अस्तित्वगत हैं.

निष्कर्ष: एक मंडराता तूफ़ान

बगराम एयर बेस अब सिर्फ़ एक हवाई अड्डा नहीं रहा. यह अधूरे युद्धों, फिर से उभरती प्रतिद्वंद्विता और ख़तरनाक महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक है. संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए यह चीन के ख़िलाफ़ अपनी शक्ति को फिर से स्थापित करने का एक अवसर प्रस्तुत करता है. पाकिस्तान के लिए यह रणनीतिक गहराई और नए सिरे से लाभ प्रदान करता है. हालांकि भारत के लिए यह एक मंडराता तूफ़ान है जो आतंकवाद, घेराबंदी और आर्थिक हाशिए पर धकेले जाने का ख़तरा है. असली सवाल यह नहीं है कि क्या अमेरिका बगराम लौट सकता है, बल्कि यह है कि क्या ऐसा करने से दक्षिण एशिया आग के एक और चक्र में फंस जाएगा. भारत के लिए, उत्तर स्पष्ट है. नई दिल्ली को उथल-पुथल के लिए तैयार रहना होगा, सभी हितधारकों को साथ लाना होगा, और सबसे महत्वपूर्ण बात, यह सुनिश्चित करना होगा कि पाकिस्तान एक बार फिर अफ़गानिस्तान की कहानी को निर्देशित न करे.

भारत की बढ़ती भेद्यता

बगराम के आसपास विकसित हो रही गतिशीलता के बीच, भारत खुद को कई मोर्चों पर लगातार असुरक्षित पा रहा है. अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकानों का फिर से सक्रिय होना और अमेरिकी अभियानों के लिए एक रसद गलियारे के रूप में पाकिस्तान का नया प्रभाव, सीमा पार आतंकवाद को और बढ़ा सकता है. कश्मीर में पहले से ही उग्रवाद से जूझ रहे भारत को दो मोर्चों पर ख़तरा है. पश्चिमी मोर्चे पर अफ़ग़ानिस्तान के पनाहगाहों से उत्साहित पाकिस्तान समर्थित समूहों से और उत्तरी मोर्चे पर चीन से, जो बेल्ट एंड रोड पहल के तहत अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के माध्यम से अपनी रणनीतिक घेराबंदी को और मज़बूत करेगा. आर्थिक रूप से अफ़ग़ान खनिजों को सुरक्षित करने की नई दिल्ली की आकांक्षाओं को वाशिंगटन और बीजिंग द्वारा दरकिनार किया जा सकता है, जिससे उसका प्रभाव और कम हो जाएगा.

कूटनीतिक रूप से, भारत को अमेरिका-चीन-रूस के बीच एक ऐसे मुकाबले में हाशिए पर धकेले जाने का ख़तरा है जहां पाकिस्तान खुद को एक अपरिहार्य शक्ति-मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर रहा है. संक्षेप में, बगराम पर फिर से कब्ज़ा, जो वाशिंगटन के लिए स्थिरता का वादा करता है भारत को क्षेत्रीय असुरक्षा के एक कमज़ोर गढ़ में बदल सकता है.

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Divyanshi Singh

दिव्यांशी सिंह उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की रहने वाली हैं। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई की है और पिछले 4 सालों से ज्यादा वक्त से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। जियो-पॉलिटिक्स और स्पोर्टस में काम करने का लंबा अनुभव है।

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