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Bengal Riots: बंगाल की सड़कों पर बिछीं थीं लाशें! पैगंबर मोहम्मद की कीमती चीज के लिए भड़क उठे थे मुसलमान; सबसे खतरनाक दंगा

Hindu-Muslim Violence in Bengal: बंगाल का इतिहास बेहद दर्दनाक और मुश्किलों से भरा रहा है. आज से नहीं बल्कि आजादी के बाद से ही यहां हिंदू-मुस्लिम दंगा शुरू हो गया था. लेकिन आज हम आपको बंगाल की एक ऐसी रात के बारे में बताने वाले हैं जिस रात काफी-कुछ तबाह और बर्बाद हो गया था.

Hindu-Muslim Violence in Bengal: बंगाल का इतिहास बेहद दर्दनाक और मुश्किलों से भरा रहा है. आज से नहीं बल्कि आजादी के बाद से ही यहां हिंदू-मुस्लिम दंगा शुरू हो गया था. लेकिन आज हम आपको बंगाल की एक ऐसी रात के बारे में बताने वाले हैं जिस रात काफी-कुछ तबाह और बर्बाद हो गया था. जी हाँ! हम बात कर रहे हैं जनवरी 1964 की सर्द रातों की, ये वो रात है जब कोलकाता की सड़कों पर लोग नहीं डर मंडरा रहा था. लोग तो अपने दरवाज़े बंद कर अपने घरों में डर के साये में थे. इन दिनों बाज़ारों में सन्नाटा छाने लगा था. इन दिनों शरणार्थी बड़ी ही तेजी से बंगाल का रुख कर रहे थे और ट्रेनें बिल्कुल भरी हुई आ रहीं थीं. बता दें कि वो लोग सहमे हुए थे. इसके अलावा, वो अपने साथ दिल दहला देने वाली कहानियाँ भी लाए थे. 

जब पाक से बंगाल आया खौफ

इस दौरान आये हुए शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान में हुए हमलों के दर्दनाक किस्से बता रहे थे. लोग बता रहे थे कि कैसे उनके घरों में आग लगा दी गई, उनके परिवार बिखर गए, और कैसे धार्मिक हिंसा ने उनकी हर उस चीज़ को उनसे छीन लिया जो उनके लिए सबसे ज्यादा कीमती थी. इन कहानियों ने कोलकाता के लोगों और बंगाल के लोगों के मन में आक्रोश और डर भर दिया था. अब बंगाल का माहौल भी काफी तनावपूर्ण हो गया था. मुस्लिम-हिंदू हर कोई डर के साए में जी रहा था. 

जब फैली पैगंबर मोहम्मद के बाल चोरी होने की खबर

इंटरनेशनल कमीशन ऑफ़ ज्यूरिस्ट्स की 1965 की रिपोर्ट ने बताया गया है कि ये वो दौर था जब भारत अपनी धर्मनिरपेक्ष पहचान को आगे बढ़ाने में लगा हुआ था, उस दौरान हर जगह ये सीख दी जा रही थी कि ‘हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई आपस में भाई भाई’. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम पड़ाव पर थे. ठीक इसी समय दिसंबर 1963 में श्रीनगर के हज़रतबल दरगाह से एक पवित्र निशानी, पैगंबर मोहम्मद के बाल, की चोरी की ख़बर सामने आई. इसके बाद, यह ख़बर अफ़वाहों की एक लहर में बदल गई. पाकिस्तान में, इस घटना को एक गंभीर धार्मिक अपमान के तौर पर खूब प्रचारित किया गया. जिसकी वजह से, पूर्वी पाकिस्तान के कई इलाकों में हिंदू समुदाय पर हमले भड़क उठे. बड़ी संख्या में लोग सीमा पार करके पश्चिम बंगाल में शरण लेने के लिए भाग आए. बाद में, यही घटनाएँ बंगाल के भीतर सांप्रदायिक बदले की भावना भड़कने का मुख्य कारण बनीं.

जब अफवाहों ने लिया सबसे खतरनाक रूप

BBC की एक रिपोर्ट में इस बात की जानकारी दी गई है कि जनवरी 1964 के दूसरे हफ़्ते में कोलकाता में हालात इतने बिगड़ गए थे की हर तरफ आगजनी और लाशें बीछी हुईं थीं. 11 जनवरी तक, कई इलाकों में हिंसा भड़क उठी थी. रिपोर्टों से पता चलता है कि भीड़ ने खास तौर पर मुस्लिम इलाकों को निशाना बनाया; दुकानों में तोड़फोड़ की गई और घरों में आग लगा दी गई. कई जगहों पर हथियारों से हमले किए गए. हालात इतने बेकाबू हो गए कि प्रशासन को सेना बुलानी पड़ी. मध्य कोलकाता हिंसा का मुख्य केंद्र बन गया, जबकि दंगे 24 परगना जैसे ग्रामीण ज़िलों में भी फैल गए. पूरे राज्य में डर और अराजकता का माहौल छा गया.

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सड़कों पर बिछीं थीं लाशें

हालात इतने खराब हो चुके थे कि शहर की सड़कों पर एक अफ़रा-तफ़री और उन्माद का माहौल छा गया था. कई इलाकों में आगज़नी बिना किसी रोक-टोक के जारी रही. पुलिस ने हालात पर काबू पाने की काफी कोशिश की, लेकिन भीड़ उनके काबू में आने का नाम ही नहीं ले रही थी. इस दौरान कई जगहों पर पुलिस को गोलियां चलानी पड़ीं. बताया जा रहा है कि इन भयानक दंगों में 264 लोगों की जान चली गई. इनमें से 208 लोग सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए, जबकि 56 लोगों की मौत पुलिस और सेना की कार्रवाई की वजह से हुई है. लेकिन, कुछ स्वतंत्र रिपोर्टों में मरने वालों की संख्या इससे भी कई ज्यादा बताई गई है. 

घर छोड़कर भागे थे मुसलमान

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये दंगा सबसे भयानक रूप ले चुका था. इस दौरान लगभग 70,000 मुसलमानों को अपने ठिकाने बदलने पड़े थे और अपने आशियानों को अलविदा कहना पड़ा था. इतना ही नहीं करीब 55,000 लोगों को खुले मैदानों और राहत शिविरों में रहना पड़ा. इस घटना को 1950 के बाद से भारत में सांप्रदायिक तनाव की सबसे बड़ी घटना  के रूप में देखा जाता है. यहीं से शुरू हुआ था हिंदू-मुस्लिम विवाद. 

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