West Bengal Assembly Election 2026: बंगला विधानसभा चुनाव 2026 के चुनाव की तारीखे धीरे-धीरे पास आती जा रही है, बंगाल की सत्ता पर काबिज TMC प्रमुख और सीएम ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं हर बार की तरह इस बार भी उन्हें पूरी उम्मीद है कि वह इस बार भी बंगाल चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर सत्ता संभालेंगी. सही मायनों में बाद करे तो, ममता दीदी ने एक साहसी राजनीतिक नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाई है. ममता बनर्जी के चार दशक लंबे करियर में उन्होंने कई बार चोटों का सामना किया है और हर बार वे अपने सार्वजनिक जीवन में और भी मजबूत होकर उभरी है.
भले ही बात 1990 में हुए उनके ऊपर जानलेवा हमले की बात हो या 1993 में राइटर्स बिल्डिंग्स में उस समय के सीएम ज्योति बसु के खिलाफ प्रदर्शन में उन पर लाठीचार्ज का मामला हो इन सब को पार कर ममता बनर्जी बंगाल की सत्ता में एक ताकतवर छवि के तौर पर उभरीं है. ऐसे में चलिए विस्तार से जानें कि आखिर 1993 के विरोध प्रदर्शन में ऐसा क्या हुआ था जिसने उनकी सत्ता तक पहुंचने में उनकी राह बना दी.
राइटर्स बिल्डिंग तक निकाले गए मार्च के पीछे का मकसद?
तारीख थी 21 जुलाई 1993 ममता बनर्जी, जो उस समय यूथ कांग्रेस की पश्चिम बंगाल राज्य अध्यक्ष थीं, ने कोलकाता में ‘राइटर्स चलो अभियान’ नाम से एक मुहिम के तहत राइटर्स बिल्डिंग तक एक विरोध मार्च का आयोजन किया था. उस समय, राइटर्स बिल्डिंग तत्कालीन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु का दफ़्तर हुआ करती थी. ज्योति बसु के नेतृत्व वाली CPIM सरकार ने जब 1991 का विधानसभा चुनाव भारी बहुमत से जीता, तो ममता बनर्जी ने यह ‘साज़िश का सिद्धांत’ फैलाना शुरू कर दिया कि पार्टी ने चुनावों में ‘वैज्ञानिक धांधली’ करके जीत हासिल की है.
उस दौर में, वोट बैलेट पेपर के जरिए डाले जाते थे, और वोटर ID दिखाना अनिवार्य नहीं था. संयोग की बात है कि, 1991 में ही ममता बनर्जी कोलकाता दक्षिण निर्वाचन क्षेत्र से सांसद (MP) भी चुनी गई थीं. केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली नरसिम्हा राव सरकार में उन्हें मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री नियुक्त किया गया था. हालांकि वे राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा थीं, फिर भी ममता बनर्जी की नजरें पश्चिम बंगाल की सत्ता के गलियारों पर ही टिकी हुई थीं. नरसिम्हा राव सरकार में एक महत्वपूर्ण मंत्रालय का दायित्व संभालने के बावजूद, वे पश्चिम बंगाल के राजनीतिक मामलों में पूरी तरह से सक्रिय थीं.
बलात्कार पीड़िता को साथ लेकर ममता बनर्जी पहुंची राइटर्स बिल्डिंग
इस बात का प्रमाण जनवरी 1993 में राइटर्स बिल्डिंग में उनके जबरन प्रवेश की घटना से मिलता है, जब वे एक बलात्कार पीड़िता को साथ लेकर वहां पहुंची थीं; इस घटना के जरिए उन्होंने CPIM सरकार के शासन में कानून-व्यवस्था की बदहाली को उजागर किया था. तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु के दफ़्तर से जिस अपमानजनक तरीके से उन्हें बाहर निकाला गया था, उसके बाद ममता बनर्जी ने अगले छह महीनों के भीतर राइटर्स बिल्डिंग पर धावा बोलने की योजना बना ली थी. उन्हें एक नए मुद्दे की जरूरत थी, और CPIM द्वारा वोटों की कथित ‘वैज्ञानिक धांधली’ की चुनावी साज़िश का सिद्धांत एक नए विरोध प्रदर्शन और बेहद जरूरी सार्वजनिक ड्रामे के लिए एकदम सही आधार साबित हुआ.
उस वक्त ममता बनर्जी ने क्या मांग की?
ममता बनर्जी ने, यूथ कांग्रेस की पश्चिम बंगाल राज्य अध्यक्ष के तौर पर, फ़ोटो वाले वोटर ID कार्ड को अनिवार्य बनाने और उन्हें वोट डालने के लिए ‘एकमात्र वैध दस्तावेज़’ के तौर पर मान्यता देने की मांग की. यह काम भारत के चुनाव आयोग (ECI) का था. उस समय, चुनाव आयुक्त का चुनाव राष्ट्रपति द्वारा केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफ़ारिश पर किया जाता था.
यह देखते हुए कि केंद्र में कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी, ममता बनर्जी और यूथ कांग्रेस के लिए फ़ोटो वोटर ID के मुद्दे पर वामपंथी सरकार के ख़िलाफ़ कोलकाता में ‘राइटर्स चलो अभियान’ शुरू करना कोई समझदारी भरा कदम नहीं था. लेकिन इतिहास गवाह है कि 21 जुलाई 1993 की घटनाओं ने ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया.
21 जुलाई 1993 के उस मनहूस दिन क्या हुआ था?
‘राइटर्स चलो अभियान’ के तहत, यूथ कांग्रेस के सदस्य कोलकाता में पांच अलग-अलग जगहों पर इकट्ठा हुए और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के दफ़्तर की ओर मार्च करना शुरू कर दिया. उनका मकसद इमारत को घेरना था. अपने तय ठिकाने से लगभग 1 किलोमीटर पहले, ब्रेबॉर्न रोड पर, पुलिस ने आगे बढ़ रहे यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं को रोक दिया. इलाके में पहले से ही धारा 144 लागू कर दी गई थी.
तत्कालीन पुलिस कमिश्नर तुषार तालुकदार ने हमले पर क्या बताया था?
‘द टेलीग्राफ़’ को तत्कालीन पुलिस कमिश्नर तुषार तालुकदार ने बताया था कि ममता के समर्थक, जो मेयो रोड क्रॉसिंग पर मौजूद थे, उन्होंने पुलिस पर पत्थर फेंके और कई गाड़ियों में आग लगा दी. उन्होंने बताया कि ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों द्वारा दी गई चेतावनियों को अनसुना कर दिया गया. बेकाबू भीड़ को देखकर, मेरे एक अफ़सर ने कहा कि व्यवस्था बहाल करने का एकमात्र उपाय गोली चलाना है, वरना पुलिसकर्मी और राज्य सचिवालय हमले की चपेट में आ जाएंगे. इसके बाद मैंने सुना कि पुलिस ने गोली चला दी है और यूथ कांग्रेस के कई कार्यकर्ता घायल हो गए हैं. बाद में मुझे पता चला कि 13 लोगों की मौत हो गई थी.
यूथ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पुलिस पर हमला कर दिया, जिसके चलते पुलिस को लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़ने का सहारा लेना पड़ा. जब भीड़ पुलिस से कहीं ज़्यादा हो गई और पुलिस को बचने का कोई रास्ता नहीं दिखा, तो उन्होंने आगे बढ़ रही भीड़ पर गोली चला दी.
झड़प में ममता बनर्जी भी घायल हुईं
पुलिस के साथ हुई झड़प के दौरान ममता बनर्जी भी घायल हो गई थीं. वह तो सड़क के बीच में बने ट्रैफिक पुलिस के एक खंभे पर भी चढ़ गई थीं. यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया और पुलिस से बचाने के लिए उनके चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना लिया.
इस घटना ने उनको राजनीतिक सितारा बना दिया
21 जुलाई 1993 की घटना ने आम लोगों के मन में ‘बांग्लार मेये’ (बंगाल की बेटी) ममता बनर्जी के प्रति सहानुभूति की एक नई लहर जगा दी. रातों-रात, वह पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों में एक सितारा बन गईं. ठीक 5 साल बाद, उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपनी खुद की राजनीतिक पार्टी शुरू की, जिसका नाम ‘अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ (AITC) रखा. 21 जुलाई 1993 का अनुभव ममता बनर्जी के लिए साल 2005-2007 के दौरान बहुत काम आया, जब उन्होंने सिंगूर और नंदीग्राम में CPI(M) सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया.
साल 2011 तक, ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में CPI(M) के 34 साल पुराने शासन का अंत कर दिया. 18 साल तक चला उनका यह अभियान आखिरकार राइटर्स बिल्डिंग पर जाकर अपने मुकाम तक पहुंचा. यूथ कांग्रेस के इस विरोध मार्च को तब से TMC ने अपना लिया है और इसका नाम बदलकर ‘शहीद दिवस’ रख दिया है। ममता सरकार हर साल कोलकाता के एस्प्लेनेड मोड़ (धर्मतला) पर बड़े ही धूमधाम और भव्यता के साथ इस दिन को मनाती है.