झारखंड के गिरिडीह जिले के पीरटांड प्रखंड के कुड़को गांव में एक विचित्र पर्व मनाया जाता है, जो आस्था और खतरे के अद्भुत संगम को प्रदर्शित करता है. यह पर्व है भोक्ता पर्व.
भगवान शिव को समर्पित यह पर्व बेहद अनूठा है. शिव की भक्ति में डूबे श्रद्धालुओं के ये करतब देखकर हर कोई सोच में पड़ जाता है कि यह भक्ति की पराकाष्ठा है या अंधविश्वास?
भोक्ता पर्व की भयंकर परंपराएं
चरक पूजा या मंडा पर्व के नाम से जाना जाने वाला यह लोक आस्था का महापर्व सालों से चली आ रही परंपरा है. श्रद्धालु जलते अंगारों पर नंगे पांव चलते हैं, आग के कोयलों से होली खेलते हैं. सबसे चौंकाने वाला दृश्य तो तब आता है जब कुछ श्रद्धालु पीठ में नुकीली कील चुभाकर 60 फीट ऊँचे खंभे से झूल जाते हैं और ऊपर से फूलों की बारिश करते हैं.
कुड़को गांव का भव्य आयोजन
पीरटांड के कुड़को में हर साल भोक्ता पर्व धूमधाम से मनाया जाता है. बीते शुक्रवार को सैकड़ों भक्तों ने शारीरिक यातनाएँ सहकर बाबा भोलेनाथ को प्रसन्न किया. महिलाएं भी इस आयोजन में सक्रिय रूप से सहभागिता करती हैं. कुछ महिलाएं जीभ में कीलें चुभोकर, शरीर पर हुक लगाकर झूलती हैं.
इस आस्था के पीछे गाँव वालों की मान्यता है कि ये करतब मन्नत पूरी होने और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किए जाते हैं. फूलों की पंखुड़ियां जो झूलते भक्तों द्वारा बरसाई जाती हैं, इन्हें पकड़ने से सुख-समृद्धि की कामना पूरी होती है. वहीं जिन महिलाओं को संतान प्राप्ति नहीं हो रही होती है उनका विश्वास है कि यदि फूल स्वयं उनकी झोली में गिरे तो संतान सुख मिलता है.
इस पर्व के दौरान गांव में भव्य मेला लगता है. बच्चों के खिलौने, चाय-नास्ते की दुकानें सजती हैं. दूर-दूर से दर्शनार्थी यहां ये पर्व देखने आते हैं. यह पर्व झारखंड की आदिवासी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है.