Aaya Ram Gaya Ram Story: ‘आया राम गया राम’ यह मुहावरा अपने अक्सर राजनेताओं के लिए सुना होगा जो बार-बार पार्टियां बदलते है. लेकिन आपके मन में कभी यह सवाल आया कि आखिर इस मुहावरे का मतलब क्या है और यह किसने शुरू कि थी. अगर नहीं तो यह खबर आपके लिए ही है.
इस मुहावरे आया राम, गया राम की शुरुआत हरियाणा में हुई थी. इस मुहावरे के पीछे जिस व्यक्ति का हाथ था, वह एक राजनेता थे जिनका नाम गया लाल था. गया लाल अपनी राजनीतिक निष्ठा बार-बार बदलने के लिए जाने जाते थे. उनके बेटे उदय भान सिंह, हरियाणा कांग्रेस पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं.
कब शुरू हुई आया राम गया राम की कहानी?
यह कहानी 1967 की है, जब हरियाणा में पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहे थे. गया लाल ने हसनपुर जो अब होडल विधानसभा क्षेत्र है, से एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. उस समय, 16 निर्दलीय उम्मीदवार चुने गए थे. सरकार बनाने के लिए यूनाइटेड फ्रंट और कांग्रेस पार्टी, दोनों ने ही इन निर्दलीय विधायकों का समर्थन चाहा. शुरुआत में, गया लाल ने यूनाइटेड फ्रंट में शामिल होने का फैसला किया.
हालांकि, कुछ ही समय बाद, उन्होंने पाला बदल लिया और कांग्रेस पार्टी में चले गए. इसके कुछ ही घंटों बाद, उन्होंने फिर से अपना मन बदल लिया और यूनाइटेड फ्रंट में वापस आ गए. इस तरह, उन्होंने एक ही दिन में तीन बार पार्टियां बदलीं.
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ने बनाया यह मुहावरा
इसके बाद, यूनाइटेड फ्रंट के नेता और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री, राव बीरेंद्र सिंह ने चंडीगढ़ में मीडिया के सामने गया लाल को पेश किया. उन्होंने घोषणा की, जो ‘गया राम’ था, वह अब ‘आया राम’ बन गया है. यह जुमला जल्द ही राजनीतिक गलियारों में लोकप्रिय हो गया, और तब से हरियाणा के अंदर और बाहर दोनों जगह आया राम गया राम के मुहावरे का इस्तेमाल उन राजनेताओं के बारे में बताने के लिए किया जाता है जो अक्सर अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलते रहते हैं. हालांकि, हरियाणा में कई अन्य विधायकों और राजनेताओं ने भी अपने पूरे राजनीतिक करियर के दौरान कई बार अपनी निष्ठा बदली थी जब तक कि दलबदल विरोधी कानून लागू नहीं हो गया फिर भी आया राम, गया राम मुहावरा गया लाल के नाम के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया है.
पार्टी बदलने का सिलसिला जारी रहा
1972 में, गया लाल आर्य समाज में शामिल हो गए और उसके बाद चौधरी चरण सिंह की भारतीय लोक दल में चले गए. 1982 में एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अपना आखिरी विधानसभा चुनाव लड़ने से पहले, वह जनता पार्टी में भी शामिल हुए थे. 1967 के चुनावों के बाद, गया लाल 1977 के चुनावों में भी फिर से चुने गए. उनका निधन 2009 में हुआ.
उदयभान ने अक्सर इस बात का खंडन किया
गया लाल के बेटे उदय भान ने लगातार इस दावे का खंडन किया है. उनका तर्क है कि उनके पिता ने वास्तव में पार्टी नहीं बदली थी, बल्कि उस समय की मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अन्य पार्टियों को अपना समर्थन दिया था. यह उमा शंकर दीक्षित ही थे जिन्होंने संसद में सबसे पहले आया राम, गया राम मुहावरा गढ़ा था एक ऐसा मुहावरा जो बाद में उनके पिता से जुड़ गया. वास्तव में, यह बात लोहारू के पूर्व विधायक हीरानंद आर्य पर सबसे सटीक बैठती है, जिन्होंने, हैरानी की बात है, सात बार पार्टी बदली.