Balaghat Tribal Children Death Reason: बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौतों ने हर किसी को चिंता में डाल दिया था. क्या इसके पीछे कोई एक रहस्यमयी वायरस या बीमारी थी? इस मामले की जांच में सामने आया कि मासूमों की मौत के पीछे एक नहीं, बल्कि कई वजहें हो सकती हैं. जानिए जांच में क्या सामने आया, कितने बच्चे अस्पताल पहुंचे और अब बालाघाट में हालात कैसे हैं.
बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत का रहस्य! क्या कोई एक वायरस छीन रहा था सांसें?(Image:AI)
मध्य प्रदेश के बालाघाट से आई एक खबर ने हर किसी का दिल दहला दिया था. जब दूर-दराज़ के आदिवासी इलाकों में मासूम बच्चे अचानक दम तोड़ने लगे, तो चारों तरफ हड़कंप मच गया. हर किसी के मन में बस एक ही सवाल था कि आखिर वो कौन-सी रहस्यमयी बीमारी है जो इन बच्चों की सांसें छीन रही है?
अब इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार की एक बेहद चौंकाने वाली जांच रिपोर्ट सामने आई है. जिस दुश्मन को लोग कोई एक वायरस या बीमारी मान रहे थे, सच उससे कहीं ज्यादा उलझा हुआ और भयानक निकला. आखिर क्या खुलासा हुआ है इस रिपोर्ट में और मौतों की असली वजह क्या निकली? आइए जानते हैं…
आपको बता दें कि मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों के बीच फैली बीमारी को लेकर केंद्र सरकार की जांच जारी है. अब तक की जांच में बच्चों की मौत के पीछे कई अलग-अलग कारण सामने आए हैं. इनमें खसरा, मलेरिया, एक से ज्यादा संक्रमण, सांस लेने में परेशानी, शरीर में पानी की कमी, कुपोषण, खून की कमी और शरीर में अचानक गंभीर कमजोरी जैसी स्थितियां शामिल हैं. अधिकारियों का कहना है कि अभी तक ऐसा कोई एक बीमारी या संक्रमण सामने नहीं आया है, जिसे इन सभी मौतों की एकमात्र वजह कहा जा सके.
TOI की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि, अब तक 431 बच्चों को इलाज के लिए अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्रों में भर्ती कराया गया है. इनमें से 379 बच्चों को इलाज के बाद घर भेज दिया गया है, जबकि 52 बच्चों का अभी इलाज चल रहा है और डॉक्टर उनकी लगातार निगरानी कर रहे हैं.
इस बीमारी की स्थिति पर नजर रखने के लिए बड़े स्तर पर जांच शुरू की गई है. अब तक 32 हजार से ज्यादा लोगों की जांच की जा चुकी है. शुरुआत में सिर्फ तीन गांवों में निगरानी की जा रही थी, लेकिन अब इसे बढ़ाकर करीब 50 गांवों तक कर दिया गया है.
बच्चों की बीमारी और मौत के मामलों की जांच के लिए केंद्र सरकार की राष्ट्रीय संयुक्त बीमारी जांच टीम को 12 अगस्त को बालाघाट भेजा गया था. इससे पहले 4 अगस्त को हुई राष्ट्रीय स्तर की बैठक में बालाघाट की स्थिति, बच्चों की मौत, खसरा और मलेरिया के मामलों, जांच की व्यवस्था और बीमारी को फैलने से रोकने के उपायों की समीक्षा की गई थी.
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएमआर की एक अलग टीम भी इस मामले की जांच कर रही है. जबलपुर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज, जबलपुर की टीमें प्रभावित इलाकों में जाकर जांच कर रही हैं.
इन टीमों की ओर से बच्चों की बीमारी के लक्षण, खून और दूसरे नमूनों की जांच, खसरा और मलेरिया की स्थिति, हुई मौतों की वजह और मच्छरों से जुड़े कारणों को समझने की कोशिश की जा रही है.
अधिकारियों के मुताबिक, शुरुआत में कई बच्चों की मौत घर पर ही हो गई थी या अस्पताल पहुंचने से पहले उनकी हालत बेहद गंभीर हो गई थी. ऐसे मामलों में बच्चों की बीमारी से जुड़ी पुरानी जानकारी, जांच रिपोर्ट और जरूरी नमूने नहीं मिल सके. यही वजह है कि हर मौत के पीछे की सही वजह पता करना मुश्किल हो रहा है.
अब जिन बच्चों की मौत हुई है, उनके मामलों की एक-एक करके दोबारा समीक्षा की जा रही है. परिवार के लोगों से भी बच्चे की बीमारी, लक्षण और इलाज से जुड़ी जानकारी ली जा रही है, ताकि मौत की संभावित वजह का पता लगाया जा सके.
बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए टीकाकरण और साफ-सफाई पर भी खास ध्यान दिया जा रहा है. 1 से 10 साल की उम्र के 14,637 बच्चों को खसरा-रूबेला का अतिरिक्त टीका लगाया जा चुका है.
इसके अलावा 600 से ज्यादा पीने के पानी के स्रोतों को साफ और सुरक्षित किया गया है. 4,338 घरों में कीटनाशक का छिड़काव भी पूरा कर लिया गया है.
इलाके में इलाज की सुविधा बढ़ाने के लिए छह चलती-फिरती चिकित्सा इकाइयां भी तैनात की गई हैं. ये टीमें बिरसा और बैहर इलाकों में काम कर रही हैं. प्रभावित क्षेत्रों में 10 से ज्यादा डॉक्टर और 10 से ज्यादा सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी भी तैनात हैं.
लोगों की जांच के दौरान बच्चों की सेहत से जुड़ी कई गंभीर समस्याएं भी सामने आई हैं. 7,711 बच्चों में गंभीर कुपोषण पाया गया. इनमें से 518 बच्चों को विशेष पोषण केंद्रों में भर्ती कराया गया है, जहां उन्हें इलाज के साथ पौष्टिक भोजन दिया जा रहा है.
इसके अलावा 13,406 बच्चों में दस्त की समस्या पाई गई. वहीं 274 बच्चे गंभीर निमोनिया से पीड़ित मिले. इन बच्चों को उनकी हालत के मुताबिक इलाज और जरूरी स्वास्थ्य सुविधाएं दी गई हैं.
सरकार का कहना है कि बालाघाट में हालात अब धीरे-धीरे सुधर रहे हैं. पिछले सात दिनों में जिले में खसरे का कोई नया मामला सामने नहीं आया है. हालांकि, स्वास्थ्य विभाग ने निगरानी और इलाज का काम अभी बंद नहीं किया है. खास तौर पर दूरदराज के आदिवासी इलाकों और बेहद कमजोर आदिवासी समुदायों की बस्तियों में बच्चों की सेहत पर लगातार नजर रखी जा रही है.
फिलहाल सबसे अहम बात यह है कि जांच में बच्चों की मौत के कई संभावित कारण सामने आए हैं, लेकिन किसी एक बीमारी या संक्रमण को सभी मौतों की वजह नहीं माना गया है. बीमारी के असली कारणों को लेकर जांच अभी जारी है.
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