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जान हथेली पर रखकर स्कूल जाते हैं बच्चे; सैलाब वाली नदी में ‘मौत से सामना’ करते मासूमों का वायरल हुआ खौफनाक वीडियो!

वायरल वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे स्कूल जाने के लिए छात्रा-छात्राएं अपनी जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं. विदिशा जिले के काकरुआ गांव में स्थित बेतवा चेक डैम का यह सीन तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. जानें आखिर क्या है पूरा मामला?

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले से एक बेहद हैरान करने वाली और दिल दहला देने वाली तस्वीर सामने आई है. सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसे देखकर किसी की भी रूह कांप जाएगी. इस वीडियो में छोटे-छोटे मासूम बच्चे अपनी जान को जोखिम में डालकर स्कूल जाते हुए नजर आ रहे हैं. मामला विदिशा जिले के ककरुआ गांव का है, जहां के बच्चे हर रोज अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए मौत के मुंह से होकर गुजरने को मजबूर हैं. आइए जानते हैं क्या है इस दर्दनाक कहानी की पूरी हकीकत.

13 किलोमीटर का चक्कर बचाने के लिए अपनाते हैं यह रास्ता

ककरुआ गांव के बच्चों के सामने सबसे बड़ी मजबूरी शिक्षा के बुनियादी ढांचे की कमी है. इस गांव में स्कूल सिर्फ आठवीं कक्षा तक ही है. इसके आगे की पढ़ाई (दसवीं कक्षा तक) करने के लिए बच्चों को सड़क मार्ग से 13 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. लेकिन अगर बच्चे बेतवा नदी पर बने चेक डैम के पिलर्स को पार कर लें, तो यही दूरी घटकर महज 1.5 किलोमीटर रह जाती है. इसी लंबे सफर और समय को बचाने के लिए 9 बच्चे, जिनमें नौवीं कक्षा की पांच छात्राएं भी शामिल हैं, हर रोज इस बेहद जोखिम भरे शॉर्टकट का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं. 

कूद-कूदकर पार करते हैं सैलाब वाली नदी का टूटा बांध

बच्चों के लिए यह रास्ता किसी एडवेंचर गेम जैसा नहीं, बल्कि मौत का खेल है. चेक डैम को पार करने के लिए बच्चों को कंक्रीट के उन पिलर्स पर चलना पड़ता है, जो एक-दूसरे से करीब तीन से चार फीट की दूरी पर खड़े हैं. हर ट्रिप में बच्चों को ऐसे लगभग 10 पिलर्स को कूद-कूद कर पार करना पड़ता है. ग्रामीणों का कहना है कि पिलर्स के बीच का यह चौड़ा गैप इस रास्ते को बेहद खतरनाक बना देता है. खासकर मानसून के दिनों में स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब नदी का जलस्तर बढ़ जाता है और ये पिलर्स पूरी तरह से फिसलन भरे हो जाते हैं. जरा सा संतुलन बिगड़ा और सीधा तेज बहाव वाली बेतवा नदी में समा जाने का खतरा रहता है.

मजबूर मां-बाप, बच्चों को पढ़ाई छूटने का डर

इस खतरनाक रास्ते को लेकर जब बच्चों के माता-पिता से टाइम्स ऑफ इंडिया ने बात की गई, तो उनका दर्द छलक कर सामने आ गया. एक माता-पिता ने लाचारी जताते हुए कहा, ‘हमें खेतों में काम करना पड़ता है, इसलिए हम रोजाना बच्चों को स्कूल छोड़ने और लाने नहीं जा सकते. बच्चों को पास का यह रास्ता आसान लगता है. हमारे पास सिर्फ दो ही विकल्प हैं, या तो हम अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दें या फिर इस जानलेवा रास्ते से भेजने को मजबूर रहें.’

इस जोखिम भरे रास्ते का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी साफ दिखने लगा है. कम हाइट होने के कारण एक छात्रा समय पर पिलर्स पार नहीं कर पाई और उसे कई दिन स्कूल छोड़ना पड़ा. नतीजतन, परीक्षा में फेल होने के कारण उसे इस साल दोबारा नौवीं कक्षा में ही पढ़ना पड़ रहा है. अभिभावकों के मन में हर वक्त यही डर सताता रहता है कि कहीं इस शॉर्टकट के चक्कर में कोई अनहोनी न हो जाए या बच्चों का भविष्य खराब न हो जाए.

प्रशासन के पास नहीं हैं सवालों के जवाब?

बच्चों की जान पर बनी इस आफत पर जब प्रशासनिक अधिकारियों से सवाल किया गया, तो जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) एन.के. अहिरवार ने समस्या को स्वीकार किया. उन्होंने कहा, ‘मैंने खुद मौके का दौरा किया है और इस बारे में कलेक्टर को अवगत करा दिया है. मैंने इस समस्या का जल्द समाधान निकालने के लिए उच्च अधिकारियों को भी पत्र लिखा है.’ हालांकि, हैरानी की बात यह है कि अधिकारियों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि बच्चों के लिए सुरक्षित रास्ता कब तक बनकर तैयार होगा. ककरुआ गांव के लोग और मासूम छात्र-छात्राएं स्थानीय प्रशासन से सिर्फ एक ही गुहार लगा रहे हैं कि उनकी जिंदगी दांव पर लगने से पहले नदी पर एक सुरक्षित रास्ता या पुल का निर्माण किया जाए, ताकि बिना किसी डर के बच्चे अपनी शिक्षा पूरी कर सकें.

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