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आज़ाद और विकसित भारत में आज भी एमपी का उमरिया गांव बूंद-बूंद पानी के संघर्ष में है. यहां पुराने हेडपंप सूख चुके हैं. लोगो की उम्मीद सिर्फ एक प्राइवेट नल से बंधी है जो बिजली आने पर ही चलता है. क्यों प्रशासन की नजर अब तक इस गांव पर नहीं गई?
तपती दोपहर और खाली बर्तनों की कतार: उमरिया गांव में बूंद-बूंद के लिए जंग, लोगों को पानी नहीं किस्मत का इंतज़ार!
आज एक तरफ हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं. घर-घर फ्री इंटरनेट और बिजली पहुंचाने की बात करते हैं, लेकिन इन बड़े-बड़े वादों के बीच छोटे गांव की पानी की सुविधा न जाने किन फाइलों में कैद हो गई है. मध्य प्रदेश के कटनी जिले के एक छोटे से गांव की तस्वीर प्रशासन और सरकार की नाकामियों को उजागर करती है. यहां रीठी तहसील क्षेत्र के उमरिया गांव से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है. यहां पानी सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि रोज़ की जंग बन चुका है. अगर बिजली चली जाए, तो यहां के लोगों को प्यासा बैठना पड़ता है. पीने के पानी के लिए प्राइवेट नल का सहारा लेना पड़ रहा है. वहीं लोगों का कहना है कि कई बार प्रशासन को इस समस्या से अवगत कराया गया है लेकिन अबतक कोई हल नहीं मिल सका है.
मध्य प्रदेश के उमरिया गांव की विडंबना ये है कि यहां अब तक सरकार और प्रशासन की गाड़ियां नहीं पहुंच पाई तो हर घर तक पानी कैसे पहुंचेगा.दूसरी समस्या ये है कि पूरा गांव एक प्राइवेट पाइपलाइन से पीने का पानी भरता है. यही गांव की प्यास बुझाने की इकलौती उम्मीद है. गांव के सभी हैंडपंप पहले ही जवाब दे चुके हैं, इसलिए बिजली आ जाए तो घरों में पानी प्राइवेट नल से पहुंच जाता है. वरना स्थिति और भी गंभीर हो जाती है.
गांव की इस दयनीय हालत पर प्रशासन या गांव के मुखिया की नजर नहीं पड़ पाई है. 40 डिग्री सेल्सियस के तापमान में पूरा गांव अपने बरतनों को खड़खड़ाते हुए इस नल पर पहुंचता है और बच्चों के साथ घर तक कई लीटर पानी ढोकर ले जाते हैं. इस मामले में अपनी आपबीती सुनाते हुए गांव के एक व्यक्ति ने बताया कि बिजली नहीं रहती तो पानी भी नहीं मिलता, घंटों इंतज़ार करना पड़ता है. वहीं, कई बार खाली हाथ लौटना पड़ता है. कई सरकारी योजनाओं के बावजूद उमरिया गांव आज भी पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए जूझ रहा है. यहाँ नल-जल योजना का लाभ भी लोगों को नहीं मिल रहा है. वहीं, गर्मी बढ़ते ही हैंडपंप भी सूख चुके हैं.
लोगों का कहना है कि लगभग 20 साल से ये समस्या बनी हुई है, प्रशासन की तरफ़ से अबतक किसी तरह की सुनवाई नहीं हुई है. गर्मी बढ़ते ही हालात और भी बदतर हो जाते हैं. अप्रैल की तपती दोपहर में गांव के लोग सड़क किनारे बैठकर अपनी बारी का इंतज़ार करते नजर आते हैं.
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