Mulayam Mayawati Alliance: कल्याण सिंह सरकार से नाराज मायावती ने ऐसा खेल खेला, जिससे मुलायम सिंह भी साथ में आ गए. दोनों ने मिलकर 31 घंटे के लिए जगदंबिका पाल को सीएम बनवा दिया.
मुलायम और मायावती ने मिलकर दिया यूपी को 31 घंटे का सीएम!
Mulayam Mayawati Alliance: अनिल कपूर की बेहद सफल फिल्म ‘नायक’ दर्शकों का आज भी याद होंगी, जिसमें आम आदमी शर्त के चक्कर में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो जाता है. इसके बाद यह मामूली आदमी पूरे सिस्टम को हिला देता है. 21-22 फरवरी, 1998 को उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसा ड्रामा हुए, जिसने नायक फिल्म की कहानी को भी फिल्म फेल कर दिया. मायावती और मुलायम सिंह यादव समेत समूचे विपक्ष ने ऐसा राजनीति ताना-बाना बुना कि कल्याण सिंह की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार गिर गई और आननफानन में जगदंबिका पाल को मुख्य्मंत्री बना दिया. इस पूरे मामले तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी का अहम रोल रहा. आखिर क्यों जगदंबिका पाल सिर्फ 31 घंटे ही सीएम रह पाए? क्यों हुआ इतना बड़ा राजनीतिक ड्रामा और किसने जीती जंग? पॉलिटिकल किस्सा के इस अंक में जानते हैं 21 और 22 फरवरी, 1998 में 24 से 48 घंटे का पूरा राजनीतिक ड्रामा.
1990 के दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति बेहद उथल-पुथल वाली है. इसी दशक में 1996 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के भीतर मारपीट हुई थी, जिसमें कई विधायकों को चोटें आई थीं. इनमें से कुछ अस्पताल तक में भर्ती कराया पड़ा था. पूरे दशक में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बदलाव जारी रहे. इस दशक में मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह और मायावती मुख्यमंत्री बनीं. उठापठक का यह दौरान 2000 तक जारी रहा. इस कड़ी में 1998 में उत्तर प्रदेश में हुए एक बड़े राजनीतिक नाटकीय घटनाक्रम में पूर्वांचल के नेता और फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के सांसद जगदंबिका पाल भी मुख्यमंत्री बन गए.
हुआ यूं कि भारतीय जनता पार्टी और कल्याण सिंह से नाराज बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने सरकार गिराने विधिवत घोषणा कर दी. मायावती ने तो बकाया प्रेस कॉन्फ्रेंस करके धमकी तक दे डाली कि अब वह कल्याण सिंह की सरकार को काम नहीं करने देंगी. यह पूरा मामला 21 फरवरी, 1998 का है. मायावती के एलान के कुछ घंटे के बाद ही पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव भी फुलफॉर्म में आ गए. उन्होंने भी सार्वजनिक रूप से कह दिया कि वह यूपी में भाजपा की सरकार को हर हाल में गिराएंगे.
कल्याण सिंह की सरकार मायावती की बहुजन समाज पार्टी के सहयोग से चल रही थी. फिर भाजपा और बसपा के बीच अनबन शुरू हो गई. मायावती 21 फरवरी की दोपहर करीब 2 बजे राजभवन पहुंचीं. कल्याण सिंह सरकार से समर्थन वापस लेने के साथ ही उन्होंने जगदंबिका पाल को अपना समर्थन दे दिया. पूरी भूमिका तैयार थी. यहां तक कि कल्याण सिंह सरकार में ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर जगदंबिका पाल को सीएम उम्मीदवार तक चुना लिया. इसके बाद मायावती ने ही राज्यपाल रोमेश भंडारी से कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करने के साथ जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने की सिफारिश कर दी.
लखनऊ में मुलायम सिंह यादव और मायावती भाजपा सरकार को गिराने की तैयारी कर रहे थे तो उधर कल्याण सिंह गोरखपुर में चुनाव प्रचार व्यस्त थे. उस दौर में मोबाइल फोन चलन में नहीं था. भाजपा के रणनीतिकारों ने गोरखपुर फोन करके कल्याण सिंह को इस राजनीतिक ड्रामा की जानकारी दी तो उनके होश उड़ गए. आननफानन में कल्याण सिंह 21 फरवरी को शाम 5 बजे के करीब लखनऊ पहुंचे. कल्याण सिंह सीधे राजभवन गए और राज्यपाल रोमेश भंडारी से बहुमत साबित करने का वक्त मांगा. रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह की इस मांग को ठुकरा दिया. इसके बाद भारतीय राजनीति में इतिहास रचा गया और जगदंबिका पाल को यूपी के सीएम पद की शपथ दिलाई गई.
इससे पहले राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया. इसके बाद आननफानन में जगदंबिका पाल को रात 10 बजकर 30 मिनट पर मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. रोचक बात यह थी कि नरेश अग्रवाल ने जगदंबिका पाल के साथ ही उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली. सबसे बड़ा और शर्मनाक वाकया यह हुआ कि राजभवन का स्टाफ राष्ट्रगान बजाना तक भूल गया.
राज्यपाल रोमेश भंडारी ने 21 फरवरी की रात जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई तो हंगामा मच गया. 21 फरवरी की सुबह भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंच गई. भाजपा की ओर से वकीलों ने तर्क दिया कि उनके पास बहुमत था लेकिन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने इसे अनसुना किया. कोर्ट ने भाजपा के हक में फैसला सुनाते हुए राज्यपाल से बहुमत के लिए कल्याण सिंह को बुलाने का आदेश दिया. इसके चलते 23 फरवरी 1998 को जगदंबिका पाल को इस्तीफा देना पड़ा. दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर कल्याण सिंह की अगुवाई में भाजपा सरकार को तीन दिनों में बहुमत साबित करने का निर्देश दिया. इसके चलते नैतिकता के आधार पर जगदंबिका पाल को 31 घंटे के भीतर मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा.
इसमें सबसे बड़ा ट्विस्ट यह है कि यह पूरा खेल पूर्वांचल के बाहुबली और दिग्गज नेता हरिशंकर तिवारी का था. दरअसल, वर्ष 1997 में हरिशंकर तिवारी ने सहयोगी नेताओं जगदंबिका पाल, राजीव शुक्ला, श्याम सुंदर शर्मा और बच्चा पाठक के साथ मिलकर अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस की स्थापना की थी. 1998 में कल्याण सिंह सरकार से हरिशंकर तिवारी की अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस बाहर निकल गई. दरअसल, यह पूरा खेल हरिशंकर तिवारी का था.
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