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SP Brahmin Strategy: M-Y फॉर्मूले के बाद, क्या अब सपा ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश कर रही है?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027: मायावती के बाद, क्या समाजवादी पार्टी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश कर रही है? SP अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव (M-Y) वोट बैंक फ़ॉर्मूले से आगे बढ़ने का प्रयास क्यों कर रही है?

Uttar Pradesh Assembly Election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के लिए समाजवादी पार्टी ने अपनी कमर कस ली हैं. चुनाव से पहले अखिलेश ने PDA फॉर्मूला के तहत पहले पिछड़े और दलित लोगों को लुभाने की कोशिश की. इसके बाद अब अखिलेश यादव की नजर ब्राह्मण को लुभाने की कोशिश कर रही है. वह अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव फॉर्मूले से हटकर कुछ नया करने की कोशिश कर रहे है.
9 मार्च को अयोध्या में एक कार्यक्रम के दौरान विपक्ष के नेता माता प्रसाद पांडे द्वारा ब्राह्मण समुदाय से की गई एक ज़ोरदार अपील के बाद, यह सवाल राज्य के राजनीतिक गलियारों में गूंजने लगा है. ऐसे में चलिए विस्तार से जानें कि क्या सच में मायावती के बाद, सपा विधानसभा चुनावों से पहले ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिश कर रही है.

सरकार के तानाशाही रवैये से डरे हुए हैं ब्राह्मण- माता प्रसाद पांडे

विपक्ष के नेता माता प्रसाद पांडे  ने कहा था कि ब्राह्मण, सरकार के तानाशाही रवैये से डरे हुए हैं. उन्हें एकजुट होना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि 2027 में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनें, ताकि उनकी खोई हुई गरिमा वापस मिल सके. हालांकि, यह पहली बार नहीं था जब किसी राजनीतिक मंच पर इस तरह के प्रयास के संकेत मिले हों.

सपा ने भगवान परशुराम की जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने पर भी जोड़ा डाला

उत्तर प्रदेश विधानसभा में, सपा विधायक कमल अख्तर ने मांग की कि भगवान परशुराम की जयंती 19 अप्रैल को एक बार फिर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाए. उन्होंने कहा कि सपा के शासनकाल में ऐसा अवकाश था, लेकिन बाद में इसे रद्द कर दिया गया था. इस मांग को ब्राह्मण समुदाय की गरिमा का मामला बताया गया और यह एक व्यापक रुझान को दर्शाता है, जिसमें सपा नेताओं ने विधानसभा बहसों और विभिन्न ज़िलों में सार्वजनिक सभाओं दोनों जगहों पर ब्राह्मणों से जुड़े मुद्दे उठाने शुरू कर दिए हैं.

क्या है राजनीतिक विश्लेषकों का मानना?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना ​​है कि इस उभरते हुए परिदृश्य को आकार देने में दो विशिष्ट घटनाओं ने अहम भूमिका निभाई है. पहली घटना इस साल की शुरुआत में माघ मेले के दौरान हुए एक विवाद से जुड़ी है, जब पुलिस ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पालकी को संगम में पवित्र स्नान के लिए जाने से रोक दिया था. इस घटना से विरोध प्रदर्शन भड़क उठे और शिष्यों तथा पुलिसकर्मियों के बीच झड़पें हुईं. इसके बाद मचे हंगामे के दौरान, एक युवा शिष्य को उसकी चोटी (पवित्र बालों का गुच्छा) से घसीटते हुए दिखाने वाली तस्वीरें बड़े पैमाने पर वायरल हुईं.
इस घटना ने ब्राह्मण समुदाय के कुछ वर्गों में आक्रोश पैदा कर दिया और यह तेज़ी से एक राजनीतिक मुद्दा बन गया, जिसमें विपक्षी नेताओं ने सरकार पर धार्मिक हस्तियों का अपमान करने का आरोप लगाया. दूसरा मुद्दा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए दिशानिर्देशों से संबंधित है, जिनका उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव को रोकना है. ऊंची जातियों से जुड़े कुछ छात्र समूहों ने इन नियमों की आलोचना की है. उनका तर्क है कि इन नियमों से यह धारणा बन सकती है कि ‘सामान्य श्रेणी’ (General Category) के छात्र स्वभाव से ही भेदभाव करने वाले होते हैं.

ब्राह्मण वोटरों और समाजवादी पार्टी का कैसा रहा रिश्ता?

चुनावी इतिहास से पता चलता है कि ब्राह्मण वोटरों ने समाजवादी पार्टी को बड़े पैमाने पर समर्थन शायद ही कभी दिया है. यह समुदाय जो उत्तर प्रदेश की आबादी का लगभग 10–12 प्रतिशत है 2000 के दशक के आखिर तक कांग्रेस पार्टी के प्रति वफ़ादार रहा, जिसके बाद इसने अपनी वफ़ादारी लगभग पूरी तरह से BJP की ओर मोड़ ली. चुनावी डेटा भी इस रुझान की पुष्टि करता है: 2017 के विधानसभा चुनावों में, BJP को लगभग 83 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिले, और 2019 के लोकसभा और 2022 के विधानसभा चुनावों में, यह आंकड़ा लगभग 89 प्रतिशत रहा. यहां तक कि 2024 के लोकसभा चुनावों में भी, समाजवादी पार्टी के 37 विजयी उम्मीदवारों में से केवल एक ब्राह्मण सांसद चुना गया.

पिछले चुनावों में कैसा था समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन?

समाजवादी पार्टी का ब्राह्मण समुदाय से जुड़े मुद्दों पर फिर से ध्यान केंद्रित करना ऐसे समय में हो रहा है, जब पार्टी हाल के चुनावों में हासिल हुए राजनीतिक लाभों को और मज़बूत करना चाहती है. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में, पार्टी को महज़ 47 सीटें मिली थीं. हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनावों में, SP के नेतृत्व वाला गठबंधन 125 सीटें जीतकर राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरा. पार्टी के वोट शेयर में भी काफ़ी बढ़ोतरी देखने को मिली; यह 2017 के लगभग 21.8 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 32 प्रतिशत हो गया. इस बढ़त का श्रेय OBC, मुस्लिम और दलित मतदाताओं के बीच दिखाई गई एकजुटता को दिया जा सकता है.

समाजवादी पार्टी का मुस्लिम-यादव से नाता

समाजवादी पार्टी (SP) का मुस्लिम-यादव (M-Y) गठबंधन उत्तर प्रदेश में उसका पारंपरिक और मुख्य वोट बैंक है. इसका अनुमानित हिस्सा मतदाताओं का लगभग 20-25% है, जो BJP के खिलाफ पार्टी के समर्थन का आधार बनता है. जहां यह आधार पार्टी को एक मज़बूत नींव देता है, वहीं पार्टी अपनी अपील का दायरा बढ़ाने के लिए अब PDA और ब्राह्मण फ़ॉर्मूले की ओर बढ़ रही है.
समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती यह है कि वह ब्राह्मण वोटरों को यह विश्वास दिलाए कि पार्टी उनके हितों का भी प्रतिनिधित्व कर सकती है, और साथ ही अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव समर्थन आधार को भी बनाए रखे. पार्टी के नेता अक्सर पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव की विरासत का ज़िक्र करते हैं जिनके जानेश्वर मिश्र जैसे प्रमुख ब्राह्मण नेताओं के साथ करीबी संबंध थे और यह तर्क देते हैं कि पार्टी में हमेशा से ही उच्च-जाति के नेतृत्व के लिए जगह रही है. इस मोड़ पर यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि क्या इन चल रहे प्रयासों से चुनावी फ़ायदा मिलेगा; हालाँकि, जैसे-जैसे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, ब्राह्मण वोटों के लिए मुकाबला राज्य के भीतर एक महत्वपूर्ण रुझान के रूप में उभरता दिख रहा है.
Shristi S

Shristi S has been working in India News as Content Writer since August 2025, She's Working ITV Network Since 1 year first as internship and after completing 3 months intership Shristi Joined Inkhabar Haryana of ITV Group on November 2024. She Worked in Inkhabar Haryana 9 months there she cover full Haryana news. Currently In India News her speciality is hard news, lifestyle, entertainment, Business.

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