UP Mein Siyasi Sangram: सपा के चीफ ने साफ संकेत दिया कि 2027 में लोधी समाज के बिना देश के सबसे बड़े राज्य में बदलाव असंभव सा है. अखिलेश यादव ने भाजपा के सबसे बड़े और मजबूत किले यानी 'लोध वोट बैंक' पर सीधा निशाना साधा है.
यूपी में लोध समाज की ताकत कितनी है?
Uttar Pradesh Assembly Elections 2027: भारत के सबसे बड़े राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. जिसकी झलक अभी से देखने को मिल रही है.उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी दांव-पेच और शह-मात का खेल शुरू हो गया है. सत्ता में आने के लिए विपक्ष की छटपटात देखने को मिल रही है. वहीं दूसरी तरफ भाजपा हैट्रिक लगाने की तैयारी कर रही है. मुख्यमंत्री योगी लगातार पसीने बहा रहे हैं, वहीं अखिलेश यादव कड़ी टक्कर देने के लिए मैदान में उतर चुके हैं.
चुनाव से पहले सभी पार्टियां वोट बैंस से आगे नए समाजिक समीकरणों को साधने में लगे हुए हैं. समाजवादी पार्टी के चीफ अखिलेश यादव ने यूपी महासमर को फतह करने के लिए लगातार अपने पीडीए फॉर्मूले का विस्तार कर रहे हैं. रविवार को कासगंज में स्वतंत्रता सेनानी महारानी अवंतीबाई लोधी की जयंती पर जनसभा को संबोधित किया और कई चुनावी वादा किया
उन्होंने मंच से कहा, ‘मैं लोधी समाज के लोगों को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि उन्हें राजनीतिक सम्मान और स्थान देने का काम हम समाजवादी लोग करेंगे. आने वाले समय में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार होगी, तो 16 अगस्त की छुट्टी महारानी अवंतीबाई लोधी जी के सम्मान में हम लोग घोषित करेंगे.’ सपा के चीफ ने साफ संकेत दिया कि 2027 में लोधी समाज के बिना देश के सबसे बड़े राज्य में बदलाव असंभव सा है. अखिलेश यादव ने भाजपा के सबसे बड़े और मजबूत किले यानी ‘लोध वोट बैंक’ पर सीधा निशाना साधा है.
अब सवाल यह उठ रहा है कि यूपी की 403 विधानसभा सीटों के चुनावी गणित में लोध समाज की ताकत कितनी है? पॉलिटिकल एनालिस्ट और ग्राउंड डेटा के मुताबिक उत्तर प्रदेश के करीब 25 जिलों की 90 से 100 विधानसभा सीटों पर लोध समुदाय की बड़ी संख्या है और उनमें चुनाव नतीजों पर सीधा असर डालने की क्षमता है.
अभी की स्थिति यह है कि इस लोध वोट बैंक का 90 से 95 प्रतिशत हिस्सा भारतीय जनता पार्टी को भारी वोट देता रहा है. पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के समय से ही इस समुदाय को भाजपा का कट्टर और वैचारिक समर्थक माना जाता रहा है. ऐसे में अखिलेश यादव इस वोट बैंक में 10 से 15 प्रतिशत तक की सेंध लगाने में भी सफल हो सकते हैं. आंकड़े बताते हैं कि यूपी में कम से कम 58 से 60 सीटें ऐसी हैं जहां लोधी समुदाय इतनी मजबूत स्थिति में है कि अगर वे चाहें तो अपनी और किसी दूसरी जाति की ताकत का इस्तेमाल करके अपना MLA चुनकर विधानसभा भेज सकते हैं.
यहां लोध वोटर बहुत अहम हैं. बुलंदशहर सदर में 70,000 से 80,000 लोध वोटर हैं, अनूपशहर में 75,000, स्याना में 120,000 और डिबाई विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज़्यादा 145,000 लोध वोटर हैं.
पूर्व CM कल्याण सिंह के इस गढ़ में, अतरौली विधानसभा क्षेत्र में लगभग 85,000 लोध वोटर हैं, बरौली विधानसभा क्षेत्र में 65,000 और छर्रा में लगभग 50,000 लोध वोटर हैं.
एटा सदर में 60,000 और मारहरा में 85,000 लोध वोटर इस समुदाय के हैं. फिरोजाबाद और आगरा: फिरोजाबाद की जसराना सीट पर 100,000, शिकोहाबाद में 55,000 और सिरसागंज में 65,000 लोध वोट हैं. वहीं, आगरा की फतेहपुर सीकरी सीट पर 75,000 वोटर हैं.
पीलीभीत को लोध बहुल जिला माना जाता है. बिसलपुर में 120,000 और बरखेड़ा में 135,000 लोध वोट हैं. इसके अलावा, पीलीभीत सदर में 75,000 और पूरनपुर में 80,000 वोटर हैं. बरेली की मीरगंज सीट पर 80,000 और आंवला में 85,000 वोटर हैं.
शाहजहांपुर की दादरौल सीट पर 110,000 वोटर हैं, जलालाबाद में 80,000 वोटर हैं, और सदर में 60,000 वोटर हैं. रामपुर सदर की आबादी 65,000 है, और मिलक की आबादी 75,000 है.
मैनपुरी की भोगांव सीट, जो समाजवादी पार्टी (SP) का गढ़ है, में 110,000 लोध वोटर हैं. फर्रुखाबाद सदर में 50,000, कायमगंज में 60,000, अमृतपुर में 65,000, और भोजपुर में 75,000 वोटर हैं.
इटावा सदर में 75,000, औरैया के दिबियापुर में 75,000, और बिधूना में 80,000 वोटर हैं. कन्नौज और कानपुर देहात: कन्नौज के तिरवा में 120,000 और कानपुर देहात के रसूलाबाद (SC रिजर्व सीट) में 80,000 लोध वोटर हैं.
उन्नाव के पुरवा विधानसभा क्षेत्र में 110,000, सदर में 65,000, भगवंतनगर में 60,000 और बांगरमऊ में 55,000 वोटर हैं. लखनऊ के BKT (बख्शी का तालाब) में 80,000, हरदोई के बालामऊ में 60,000 और सीतापुर के महमूदाबाद (सिधौली) में 65,000 वोटर इस समुदाय के हैं.
रायबरेली और फतेहपुर: रायबरेली के हरचंद्रपुर में 90 हजार और फतेहपुर सदर में 1 लाख वोटर चुनाव की दिशा और दशा तय करने की ताकत रखते हैं.
बुंदेलखंड में भी लोध समाज की ताकत कम नहीं है. महोबा के चरखारी में 90 हजार वोटर हैं. बांदा सदर में 55 हजार और नरैनी में 80 हजार वोट हैं. ललितपुर सदर में 65 हजार और महरौनी में 55 हजार वोटर हैं. जालौन की उरई सीट पर 60 हजार लोध वोटर हैं। इसके अलावा हमीरपुर की राठ विधानसभा में भी इस समाज का बड़ा और निर्णायक प्रभाव माना जाता है.
उत्तर प्रदेश के 25 जिलों की लोध समाज यूपी की सत्ता की चाबी अपने हाथ में रखता है. 403 विधानसभा सीटों वाले प्रदेश में अगर 90 से 100 सीटों पर किसी एक समाज का प्रभाव चुनाव के पूरे रुख को बदल सकता है. 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अखिलेश यादव की रणनीति बिल्कुल साफ है. यदि वे भाजपा के इस 95 प्रतिशत वाले एकमुश्त लोध वोट बैंक में महारानी अवंतीबाई लोधी के सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी का दांव चलकर थोड़ी भी दरार डाल पाते हैं, तो यह यूपी की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होगी.
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