मुंबई–अहमदाबाद पर निर्भरता घटी, अब पूरे गुजरात के मरीज सूरत पर जता रहे हैं भरोसा सूरत (गुजरात), अप्रैल 02: डायमंड और टेक्सटाइल सिटी के रूप में पहचाना जाने…
मुंबई–अहमदाबाद पर निर्भरता घटी, अब पूरे गुजरात के मरीज सूरत पर जता रहे हैं भरोसा
सूरत (गुजरात), अप्रैल 02: डायमंड और टेक्सटाइल सिटी के रूप में पहचाना जाने वाला सूरत अब स्वास्थ्य क्षेत्र में भी नई पहचान बना रहा है। शेल्बी अस्पताल में पिछले तीन महीनों में 12 किडनी ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किए जाने के बाद सूरत अब ट्रांसप्लांट हब के रूप में उभरता नजर आ रहा है। इस सफलता ने शहर को मेडिकल टूरिज्म के नक्शे पर भी मजबूत स्थान दिलाया है।
शेल्बी अस्पताल के चीफ एडमिनिस्ट्रेटर ऑफिसर नीरव शाह ने बताया कि पहले लोग ट्रांसप्लांट के लिए मुंबई या अहमदाबाद जाते थे, लेकिन अब सूरत ऐसा शहर बन गया है जहां जटिल ट्रांसप्लांट भी सफलतापूर्वक किए जा सकते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले तीन महीनों में हुए सभी 12 ट्रांसप्लांट सफल रहे हैं और आने वाले समय के लिए बड़ी संख्या में मरीज पूछताछ कर रहे हैं। फिलहाल अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट की सफल शुरुआत हो चुकी है, और भविष्य में लिवर सहित अन्य अंगों के ट्रांसप्लांट की दिशा में भी आगे बढ़ने की योजना है।
कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट और ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. मुकेश गोयल ने बताया कि मंजूरी मिलने के बाद कुछ ही महीनों में 12 ट्रांसप्लांट किए गए हैं और सभी सफल रहे हैं। उन्होंने कहा कि सूरत अब सिर्फ शहर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे गुजरात और सौराष्ट्र से मरीज यहां इलाज के लिए आ रहे हैं।
ट्रांसप्लांट सर्जरी एक जटिल प्रक्रिया होती है, जिसमें विशेषज्ञों की टीम मिलकर काम करती है। इसमें मुख्य रूप से नेफ्रोलॉजिस्ट, यूरो सर्जन और एनेस्थेटिस्ट की अहम भूमिका होती है।

इस प्रकार की सर्जरी में : डॉ. मुकेश गोयल (नेफ्रोलॉजिस्ट) मरीज की पहचान कर उसकी पूरी जांच करते हैं और उसे ट्रांसप्लांट के लिए तैयार करते हैं।
इसके बाद डॉ. भार्गव पंड्या (यूरोलॉजिस्ट) सर्जरी की मुख्य प्रक्रिया संभालते हैं।
वहीं डॉ. केविन देसाई (एनेस्थेटिस्ट) ऑपरेशन के दौरान मरीज को उचित एनेस्थीसिया देकर उसकी स्थिति स्थिर रखते हैं।
इन तीनों विशेषज्ञों के समन्वय और टीमवर्क से ट्रांसप्लांट सर्जरी सुरक्षित और सफल बनती है। इसके बाद डॉ. आरूल शुक्ला, डॉ. हिमानी गरासिया और ICU टीम मरीज की देखभाल में अहम भूमिका निभाते हैं। वहीं संजय टांचक ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर के रूप में मरीज और अस्पताल के बीच सेतु का काम करते हैं।
आंकड़ों के अनुसार अब तक 4 महिलाओं और 8 पुरुषों के ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं। इनमें भरूच, जूनागढ़ और मोरबी जैसे शहरों के मरीज भी शामिल हैं। दाताओं में परिवारजनों की महत्वपूर्ण भूमिका देखने को मिली है—जैसे भाई ने बहन को, मां ने संतान को और भाभी ने देवर को किडनी दान दी है।
डॉ. गोयल ने किडनी दान से जुड़े भ्रम दूर करते हुए कहा कि किडनी दान करने से दाता के स्वास्थ्य या आयु पर कोई असर नहीं पड़ता। इंसान के पास दो किडनी होती हैं और एक किडनी के साथ भी सामान्य जीवन जिया जा सकता है। दाता को आमतौर पर 3-4 दिनों में अस्पताल से छुट्टी मिल जाती है और उसे जीवनभर दवाएं लेने की जरूरत नहीं होती।
ट्रांसप्लांट के बाद मरीज का डायलिसिस बंद हो जाता है और वह फिर से सामान्य जीवन जी सकता है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक किडनी ट्रांसप्लांट का 10 साल का सर्वाइवल रेट लगभग 80 प्रतिशत है, जो काफी आशाजनक माना जाता है।
इस तरह सूरत स्वास्थ्य क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छू रहा है और अंगदान के प्रति बढ़ती जागरूकता के साथ शहर अब जीवनदान देने वाली सिटी के रूप में पहचान बना रहा है।
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