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HomeVideosग्रीन पार्क के हरीश राणा की ‘अमर’ दास्तान, 13 साल बिस्तर पर रहने के बाद भी जाते-जाते दान कर संवार गए 3 ज़िंदगियां!

ग्रीन पार्क के हरीश राणा की ‘अमर’ दास्तान, 13 साल बिस्तर पर रहने के बाद भी जाते-जाते दान कर संवार गए 3 ज़िंदगियां!

Written By: Aksha Choudhary
Last Updated: 2026-03-25 14:26:37

दिल्ली के ग्रीन पार्क निवासी हरीश राणा का बुधवार को भावपूर्ण अंतिम संस्कार किया गया, हरीश पिछले 13 वर्षों से कोमा की स्थिति में थे और लंबे संघर्ष के बाद 24 मार्च 2026 की शाम 4.10 बजे एम्स (AIIMS) दिल्ली में उनका निधन हो गया, गहरे दुख की इस घड़ी में भी हरीश के परिवार ने एक अत्यंत साहसी और मानवीय निर्णय लिया, उन्होंने हरीश का हृदय वाल्व (Heart Valve) और दोनों कॉर्निया (Cornea) दान कर दिए, जिससे अब तीन जरूरतमंद लोगों को नया जीवन और दृष्टि मिल सकेगी.


Harish Rana funeral Green Park Delhi 2026: हरीश राणा की कहानी धैर्य पीड़ा और एक महान त्याग की महागाथा है, 13 साल पहले एक हादसे या बीमारी के बाद हरीश कोमा में चले गए थे, जिसके बाद से उनका परिवार दिन-रात उनकी सेवा में जुटा था, एम्स दिल्ली में इलाज के दौरान मंगलवार शाम उनकी हृदय गति रुक गई, जहां एक ओर परिवार इस लंबे वियोग से टूट चुका था, वहीं दूसरी ओर उन्होंने समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझा, हरीश के अंगों से अब एक हृदय रोगी को नया जीवन मिलेगा और दो दृष्टिहीन लोग इस खूबसूरत दुनिया को देख सकेंगे, ग्रीन पार्क में जब हरीश का शव पहुंचा, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं, लोगों ने उन्हें एक ‘योद्धा’ के रूप में विदा किया जिसने ना केवल अपनी बीमारी से लंबी जंग लड़ी, बल्कि मृत्यु के बाद भी परोपकार का मार्ग चुना, यह घटना दिल्ली और पूरे देश के लिए अंगदान के प्रति जागरूकता का एक बड़ा उदाहरण बनकर उभरी है, परिवार के इस कदम की चारों ओर सराहना हो रही है.

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Written By: Aksha Choudhary
Last Updated: 2026-03-25 14:26:37


Harish Rana funeral Green Park Delhi 2026: हरीश राणा की कहानी धैर्य पीड़ा और एक महान त्याग की महागाथा है, 13 साल पहले एक हादसे या बीमारी के बाद हरीश कोमा में चले गए थे, जिसके बाद से उनका परिवार दिन-रात उनकी सेवा में जुटा था, एम्स दिल्ली में इलाज के दौरान मंगलवार शाम उनकी हृदय गति रुक गई, जहां एक ओर परिवार इस लंबे वियोग से टूट चुका था, वहीं दूसरी ओर उन्होंने समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझा, हरीश के अंगों से अब एक हृदय रोगी को नया जीवन मिलेगा और दो दृष्टिहीन लोग इस खूबसूरत दुनिया को देख सकेंगे, ग्रीन पार्क में जब हरीश का शव पहुंचा, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं, लोगों ने उन्हें एक ‘योद्धा’ के रूप में विदा किया जिसने ना केवल अपनी बीमारी से लंबी जंग लड़ी, बल्कि मृत्यु के बाद भी परोपकार का मार्ग चुना, यह घटना दिल्ली और पूरे देश के लिए अंगदान के प्रति जागरूकता का एक बड़ा उदाहरण बनकर उभरी है, परिवार के इस कदम की चारों ओर सराहना हो रही है.

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