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Chaitra Navratri: चैत्र नवरात्रि 2026 का पांचवां दिन आज, स्कंदमाता की कृपा पाने के लिए जरूर पढ़ें ये मंत्र

Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्र का पांचवां दिन देवी स्कंदमाता को समर्पित होता है और इस दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व माना जाता है. मान्यता है कि सच्चे मन से उनकी आराधना करने पर निःसंतान दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है और जीवन में खुशहाली, शांति व समृद्धि का वास होता है.

Written By: Shivashakti narayan singh
Last Updated: March 23, 2026 11:30:17 IST

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Skandamata Puja: धार्मिक परंपराओं के अनुसार, नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है. इन दिनों का आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक होता है. इस वर्ष 23 मार्च को चैत्र नवरात्र का पांचवां दिन मनाया जा रहा है, जिसे स्कंदमाता की उपासना के लिए विशेष माना गया है.

 कहा जाता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने के साथ-साथ स्कंदमाता की कथा का पाठ करने से भक्तों को विशेष फल मिलता है. इससे न केवल मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, बल्कि जीवन की कई समस्याएं भी दूर होने लगती हैं.

मां स्कंदमाता की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर नामक एक राक्षस ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही संभव होगी. उस समय भगवान शिव गहन तप में लीन थे और सती का पुनर्जन्म भी नहीं हुआ था. इस कारण तारकासुर को विश्वास हो गया कि शिव विवाह नहीं करेंगे और वह अमर बना रहेगा.तारकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान शिव का ध्यान भंग करने का प्रयास किया. इसी बीच सती ने हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया. माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की. अंततः उनके प्रयास सफल हुए और भगवान शिव ने उनसे विवाह कर लिया.इसके बाद दिव्य तेज उत्पन्न हुआ, जिसे अग्नि देव ने संभाला और फिर उसे गंगा को सौंप दिया. गंगा ने उस तेज को सरवन वन में प्रवाहित किया, जहां से भगवान कार्तिकेय (स्कंद) का जन्म हुआ.बड़े होने पर माता पार्वती ने स्वयं कार्तिकेय को युद्ध कौशल सिखाया और उन्हें सिंह पर सवार होकर युद्धभूमि में भेजा. वहां उन्होंने अपने पराक्रम से तारकासुर का वध किया.

 मां स्कंदमाता के मंत्र

वंदे वांछित कामार्थे चंद्रार्धकृतशेखराम्।

सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कंदमाता यशस्वनीम्।।

धवलवर्णा विशुद्ध चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।

अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।

मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥

प्रफु्रल्ल वंदना पल्लवांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।

कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

 

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Written By: Shivashakti narayan singh
Last Updated: March 23, 2026 11:30:17 IST

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Skandamata Puja: धार्मिक परंपराओं के अनुसार, नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है. इन दिनों का आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक होता है. इस वर्ष 23 मार्च को चैत्र नवरात्र का पांचवां दिन मनाया जा रहा है, जिसे स्कंदमाता की उपासना के लिए विशेष माना गया है.

 कहा जाता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने के साथ-साथ स्कंदमाता की कथा का पाठ करने से भक्तों को विशेष फल मिलता है. इससे न केवल मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, बल्कि जीवन की कई समस्याएं भी दूर होने लगती हैं.

मां स्कंदमाता की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर नामक एक राक्षस ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि उसकी मृत्यु केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही संभव होगी. उस समय भगवान शिव गहन तप में लीन थे और सती का पुनर्जन्म भी नहीं हुआ था. इस कारण तारकासुर को विश्वास हो गया कि शिव विवाह नहीं करेंगे और वह अमर बना रहेगा.तारकासुर के अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं ने भगवान शिव का ध्यान भंग करने का प्रयास किया. इसी बीच सती ने हिमालय के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया. माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की. अंततः उनके प्रयास सफल हुए और भगवान शिव ने उनसे विवाह कर लिया.इसके बाद दिव्य तेज उत्पन्न हुआ, जिसे अग्नि देव ने संभाला और फिर उसे गंगा को सौंप दिया. गंगा ने उस तेज को सरवन वन में प्रवाहित किया, जहां से भगवान कार्तिकेय (स्कंद) का जन्म हुआ.बड़े होने पर माता पार्वती ने स्वयं कार्तिकेय को युद्ध कौशल सिखाया और उन्हें सिंह पर सवार होकर युद्धभूमि में भेजा. वहां उन्होंने अपने पराक्रम से तारकासुर का वध किया.

 मां स्कंदमाता के मंत्र

वंदे वांछित कामार्थे चंद्रार्धकृतशेखराम्।

सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कंदमाता यशस्वनीम्।।

धवलवर्णा विशुद्ध चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।

अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।

मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥

प्रफु्रल्ल वंदना पल्लवांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।

कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियों का हम यह दावा नहीं करते कि ये जानकारी पूर्णतया सत्य एवं सटीक है. पाठकों से अनुरोध है कि इस लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. India News इसकी सत्यता का दावा नहीं करता है.

 

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