Eid Mubarak 2026: आज पूरे भारत में ईद का त्योहार मनाया जा रहा है. इस मौके को लेकर मुस्लिम समुदाय में जबरदस्त उत्साह, उल्लास और खुशी का माहौल है. इस्लाम धर्म की मान्यता के अनुसार, ईद केवल इबादत का ही नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की मदद का भी त्योहार माना जाता है. इसलिए इस त्योहार पर जकात और फितरा देने का विशेष महत्व बताया गया है.
जानिए, ईद पर जकात और फितरा का महत्व क्या है?
Eid Mubarak 2026: रमजान खत्म होते ही ईद उल फितर मनाई जाती है. इस बार रमजान के 30 रोजे के बाद ईद का ऐलान हुआ है. आज पूरे भारत में ईद का त्योहार मनाया जा रहा है. इस मौके को लेकर मुस्लिम समुदाय में जबरदस्त उत्साह, उल्लास और खुशी का माहौल है. लोग नमाज पढ़ने के लिए मस्जिदों की ओर निकल पड़े हैं. हर कोई ईद की तैयारियों में जुटा हुआ है. नमाज के बाद मुबारकबाद देने का सिलसिला शुरू हो जाता है. इस्लाम धर्म की मान्यता के अनुसार, ईद केवल इबादत का ही नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की मदद का भी त्योहार माना जाता है. इसलिए इस त्योहार पर जकात और फितरा देने का विशेष महत्व बताया गया है. ऐसे सवाल है कि आखिर, इस्लाम में जकात और फितरा क्या होता है? जकात और फितरा दोनों में अंतर क्या है? इस बार फितरा और जकात कितना देना होगा? आइए जानते हैं इस बारे में-
इस्लाम धर्म में मुख्य रूप से 5 फर्ज (स्तंभ) हैं, जिसमें जकात भी एक है. जकात का अर्थ होता है अपनी कमाई का एक निश्चित हिस्सा जरूरतमंदों और गरीबों में बांटना. जकात देना सिर्फ दान नहीं है, बल्कि यह बहुत ही सवाब का काम है, जिसे इस्लाम में धार्मिक कर्तव्य माना जाता है. इसलिए हर सक्षम मुसलमान पर जकात अदा करना फर्ज है. खासतौर पर रमजान में जकात का महत्व अन्य दिनों की अपेक्षा कई गुणा बढ़ जाता है. कहा जाता है कि, रमजान में किए कामों का 70 गुणा अधिक सवाब मिलता है.इस्लाम में मान्यता है कि, अल्लाह ने अपने बंदों को जो भी दौलत और नेमतें प्रदान की हैं, उनमें गरीब और जरूरतमंदों का भी हक है. इसलिए जकात देने से न केवल जरूरतमंदों की मदद होती है, बल्कि देने वाले की संपत्ति भी पाक और पवित्र मानी जाती है.
इस्लामिक जानकारों के अनुसार, जकात हर उस मुसलमान पर फर्ज है, जो कि हैसियतमंद या सक्षम हो. व्यक्ति अपने पूरे साल की कुल बचत का ढाई प्रतिशत (2.5%) हिस्सा जकात के रूप में दान करना चाहिए. लेकिन इस बात का भी ध्यान रखें कि, जकात केवल उसी को दें जो वाकई जरूरतमंद,गरीब या कमजोर वर्ग से हो. जकात का मुख्य उद्देश्य समाज में आर्थिक संतुलन बनाए रखना और जरूरतमंदों की मदद करना है. इसके अलावा जिन लोगों के पास गहने के रूप में संपत्ति होती है, वे उसकी कीमत के हिसाब से जकात निकालते हैं. वैसे तो आप पूरे साल में कभी भी जकात दे सकते हैं. लेकिन अधिकतर लोग ईद से पहले जकात देते हैं. इसका कारण यह भी है कि, रमजान और ईद के दिनों में खाने-पीने का खर्च बढ़ता जाता है. नए कपड़े, फल, सवईंया आदि के लिए पैसों की जरूरत होती है. जकात देने से गरीब भी ईद की खुशियों में शामिल हो पाते हैं.
जकात देना हर हैसियतमंद (सक्षम) मुस्लिम व्यक्ति पर फर्ज (जरूरी) है. वैसे तो जकात पूरे साल में कभी भी दी जा सकती है. लेकिन, ज्यादातर लोग रमजान के महीने में ही जकात निकालते हैं. असल में ईद से पहले जकात अदा करने का रिवाज है. जकात गरीबों, विधवाओं, अनाथ बच्चों या किसी बीमार व कमजोर व्यक्ति को दी जाती है. महिलाओं या पुरुषों के पास अगर सोने चांदी के गहनों के रूप में भी कोई संपत्ति होती है, तो उसकी कीमत के हिसाब से भी जकात दी जाती है.
इस्लाम के जानकार बताते हैं कि, जकात-अल-फ़ित्र ईद-अल-फ़ित्र की नमाज से पहले दिया जाने वाला एक जरूरी दान है. रमजान के अंत में, मुसलमानों पर फितरा देना अनिवार्य है. यह दान अल्लाह का शुक्र अदा करने का प्रतीक है. फितरा में हर व्यक्ति को एक तय रकम दान करनी होती है. ताकि गरीब और जरूरतमंद लोग भी ईद की खुशी मना सकें.
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