Maharashtra Akola Ravana puja: देशभर में दशहरे पर रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है. लेकिन महाराष्ट्र के अकोला जिले में एक ऐसा गांव भी है, जहां दशानन का दहन नहीं, बल्कि पूजा की जाती है. यहां के ग्रामीण रावण को खलनायक के बजाय अपना ग्राम देवता और रक्षक मानते हैं. स्थानीय मान्यता के मुताबिक, सांगोला गांव में करीब 350 साल से रावण की पूजा की परंपरा चली आ रही है. दशहरे के दिन गांव के लोग एकजुट होकर विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. ग्रामीणों का विश्वास है कि रावण महाराज की आराधना से उनके गांव में सुख-समृद्धि बनी रहती है. आखिर इस गांव में रावण की पूजा क्यों होती है और कैसे शुरू हुई यह परंपरा? आइए जानते हैं.
दशहरे पर रावण दहन नहीं, होती है दशानन की पूजा
महाराष्ट्र के अकोला जिले की पातुर तहसील स्थित सांगोला गांव में दशहरे का नजारा दूसरे इलाकों से अलग होता है. जहां देश के कई हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं, वहीं सांगोला में दस सिरों वाले रावण की प्रतिमा की पूजा की जाती है. गांव के लोग उन्हें अपना ग्राम देवता और रक्षक मानते हैं. दशहरे पर विशेष पूजा आयोजित होती है, जिसमें ग्रामीण बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. स्थानीय परंपरा के अनुसार, प्रतिमा की पूजा केवल दशहरे तक सीमित नहीं है, बल्कि सालभर श्रद्धालु यहां आराधना करते हैं. इस पूजा में महिलाएं भी शामिल होती हैं.
कैसे शुरू हुई रावण की पूजा की परंपरा?
सांगोला गांव में रावण की पूजा की शुरुआत को लेकर एक पुरानी लोककथा प्रचलित है. स्थानीय मान्यता के मुताबिक, कई सौ साल पहले गांव में एक ऋषि महाराज रहा करते थे. ग्रामीण उन्हें श्रद्धा की नजर से देखते थे. कहा जाता है कि अपने अंतिम समय में ऋषि महाराज ने ऐसी प्रतिमा स्थापित करने की बात कही थी, जिसमें दस बिंदु या चिह्न हों. लेकिन मूर्तिकार ने दस मुखों वाली प्रतिमा बना दी, जो रावण के स्वरूप जैसी दिखाई देती थी.
गांव की सीमा पर रुक गई बैलगाड़ी
लोककथा के अनुसार, जब इस प्रतिमा को बैलगाड़ी से गांव लाया जा रहा था, तब बैलगाड़ी गांव की सीमा पार नहीं कर सकी. ग्रामीणों ने इस घटना को दैवी संकेत के रूप में देखा. इसके बाद प्रतिमा को उसी स्थान पर स्थापित कर दिया गया. मान्यता है कि तभी से दस मुखों वाली इस प्रतिमा को रावण का स्वरूप मानकर ग्राम देवता के रूप में पूजा जाने लगा. हालांकि, यह गांव में पीढ़ियों से चली आ रही स्थानीय मान्यता है.
भगवान शिव के भक्त के रूप में रावण की आराधना
रावण के भक्त ज्ञानेश्वर महाराज धाकरे के मुताबिक, गांव में रावण की पूजा का अर्थ उसके चरित्र के हर पहलू का समर्थन करना नहीं है. उनके अनुसार, ग्रामीण भगवान शिव के प्रति रावण की भक्ति, साधना और आराधना का सम्मान करते हैं. पौराणिक कथाओं में रावण को लंका का शक्तिशाली राजा और भगवान शिव का परम भक्त बताया गया है. सांगोला के ग्रामीण इसी धार्मिक पक्ष को अपनी परंपरा का आधार मानते हैं.
रावण महाराज की कृपा से खुशहाल है गांव
सांगोला के लोगों की मान्यता है कि रावण महाराज की पूजा से गांव में सुख-समृद्धि बनी रहती है. ग्रामीण उन्हें अपना रक्षक मानते हैं और विश्वास करते हैं कि उनकी आराधना से गांव पर संकट नहीं आता. सोने की लंका के राजा रावण से जुड़ी इसी मान्यता के कारण कुछ ग्रामीण अपने गांव की खुशहाली को भी उनकी कृपा से जोड़कर देखते हैं. दशहरे के दिन होने वाली विशेष पूजा गांव के लोगों को अपनी पुरानी परंपरा और आस्था से जोड़ती है. दशहरा आमतौर पर रावण के अंत और भगवान श्रीराम की विजय के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है. वहीं, सांगोला गांव की परंपरा रावण के प्रति स्थानीय आस्था और लोकविश्वास को दर्शाती है. यहां रावण दहन के बजाय उनकी प्रतिमा की पूजा की जाती है. करीब 350 साल पुरानी बताई जाने वाली यह परंपरा दिखाती है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक मान्यताएं और त्योहार मनाने के तरीके कितने विविध हो सकते हैं.