MBA IIM Story: भारत में एमबीए की सफलता आज भी पहली सैलरी से आंकी जाती है, जहां प्लेसमेंट के आंकड़े बाकी पहलुओं पर भारी पड़ते हैं. लेकिन IIM कोलकाता की डायरेक्टर के अनुसार बदलते जॉब मार्केट में यह सोच अब अधूरी और भ्रामक साबित हो रही है.
MBA IIM Story: भारत में आज भी ज़्यादातर MBA उम्मीदवारों और उनके परिवारों के लिए सफलता का सबसे बड़ा पैमाना पहली नौकरी की सैलरी मानी जाती है. प्लेसमेंट सीज़न के दौरान सबसे ज़्यादा CTC, औसत पैकेज और रिकॉर्ड ऑफर्स की चर्चा बाकी सभी बातों को पीछे छोड़ देती है. लेकिन IIM कोलकाता की डायरेक्टर डॉ. मोहूआ बनर्जी मानती हैं कि यह सोच अब मौजूदा जॉब मार्केट की सच्चाई को नहीं दर्शाती है.
उनके अनुसार, सैलरी एक आसान और मापने योग्य आंकड़ा है, इसलिए समाज और B-स्कूल रैंकिंग सिस्टम इसे जरूरत से ज़्यादा महत्व दे देते हैं. जबकि आज के दौर में करियर की सफलता कहीं ज़्यादा जटिल और बहुआयामी हो चुकी है.
डॉ. बनर्जी इस धारणा को एक बड़ी गलतफहमी बताती हैं कि MBA करना सफलता का आसान रास्ता है. एचटी की एक रिपोर्ट के अनुसार उनका कहना है कि MBA असल में एक कठिन परिवर्तन की प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति प्रोफेशनल और व्यक्तिगत दोनों स्तरों पर विकसित होता है. आज जब AI, सस्टेनेबिलिटी और टेक्नोलॉजी के कारण नौकरियां तेज़ी से बदल रही हैं, तब पहली नौकरी सिर्फ़ एक शुरुआत है, मंज़िल नहीं.
डॉ. बनर्जी के मुताबिक, MBA के बाद मिलने वाली पहली भूमिका केवल एंट्री पॉइंट होती है. इंडस्ट्री में बदलाव, ऑटोमेशन और नई स्किल्स की मांग के चलते प्रोफेशनल्स को बार-बार खुद को ढालना पड़ता है. ऐसे में सिर्फ़ शुरुआती सैलरी पर फोकस करने वाले लोग आगे चलकर पीछे छूट सकते हैं. असल मायने यह रखते हैं कि छात्र निर्णय लेने की क्षमता, अनुकूलनशीलता और नैतिक सोच विकसित कर रहे हैं या नहीं.
उनका मानना है कि MBA का रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट सिर्फ़ सैलरी से नहीं आंका जाना चाहिए. सीखने की गुणवत्ता, भविष्य की स्किल्स, इंडस्ट्री से जुड़ाव और बदलते बाज़ार के अनुसार खुद को तैयार करने की क्षमता भी उतनी ही अहम है. IIM कोलकाता में इसी सोच के तहत सस्टेनेबिलिटी और ESG को कोर मैनेजमेंट स्किल्स के रूप में पढ़ाया जा रहा है, न कि सिर्फ़ एक वैकल्पिक विषय की तरह.
डॉ. बनर्जी बताती हैं कि AI और डेटा एनालिटिक्स ने एंट्री-लेवल मैनेजमेंट रोल्स को भी बदल दिया है. सिर्फ़ टूल्स सीखना काफी नहीं है, बल्कि डेटा से जुड़े फैसलों में बायस, जोखिम और जवाबदेही को समझना भी जरूरी है. इसीलिए IIM में तकनीकी कौशल के साथ मैनेजेरियल समझ पर बराबर ज़ोर दिया जाता है.
अंत में, डॉ. बनर्जी का संदेश साफ है कि सफलता को पहली सैलरी स्लिप तक सीमित नहीं किया जा सकता. आज के अनिश्चित समय में लंबे करियर के लिए लचीलापन, निरंतर सीखने की आदत और नैतिक नेतृत्व कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं. यही असली सफलता की पहचान है.
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