Bahon me chale aao song: हिंदी सिनेमा में कुछ गाने ऐसे होते हैं, जो वक्त के साथ पुराने जरूर होते हैं, लेकिन उनका जादू कभी फीका नहीं पड़ता. 1973 में आई फिल्म ‘अनामिका’ का गाना ‘बाहों में चले आओ’ भी ऐसा ही एक रोमांटिक गीत है. रिलीज के करीब 53 साल बाद भी यह गाना पुराने हिंदी रोमांटिक गीतों की पसंदीदा सूची में अपनी जगह बनाए हुए है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें प्रेम को किसी भारी-भरकम अंदाज में नहीं, बल्कि बेहद सादगी और मासूमियत के साथ पेश किया गया है.
जया भादुड़ी ने इशारों में कह दी दिल की बात
‘बाहों में चले आओ’ में जया भादुड़ी और संजीव कुमार की जोड़ी नजर आई थी. गाने के जरिए प्रेमिका अपने प्रेमी को अपने करीब आने के लिए कहती है. उसके अंदाज में प्यार के साथ हल्की नाराजगी, इंतजार और अपनापन भी नजर आता है. यही भाव इस गीत को महज एक रोमांटिक गाना नहीं रहने देते, बल्कि इसे प्रेम के बेहद सहज इजहार में बदल देते हैं.
लता की आवाज ने गाने में भर दी मिठास
इस गाने को लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी. उनकी आवाज की नजाकत और भावनात्मक गहराई ने गीत के रोमांस को और असरदार बना दिया. गाने के बोल मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे, जबकि इसकी धुन आर.डी. बर्मन ने तैयार की थी. तीनों दिग्गजों की प्रतिभा जब एक साथ आई तो ऐसा गीत बना, जिसे सुनने वाले आज भी उसी भाव के साथ महसूस करते हैं.
सादगी में छिपा था 70 के दशक का रोमांस
आज के दौर के रोमांटिक गानों की तुलना में ‘बाहों में चले आओ’ बेहद सरल नजर आता है, लेकिन शायद यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है. गीत में प्रेमिका अपने प्रेमी से बिना किसी बनावटीपन के अपने दिल की बात कहती है. न ज्यादा दिखावा, न शब्दों का बोझ-बस प्यार, इंतजार और करीब आने की चाहत. यही सादगी 70 के दशक के उस मासूम लेकिन बेबाक रोमांस की याद दिलाती है, जो आज भी दर्शकों को आकर्षित करता है.
पांच दशक बाद भी प्लेलिस्ट से नहीं हुआ बाहर
समय के साथ संगीत की पसंद बदली, रोमांटिक गानों का अंदाज बदला और फिल्मों का दौर भी बदल गया, लेकिन ‘बाहों में चले आओ’ की लोकप्रियता कायम रही. जब भी पुराने रोमांटिक हिंदी गानों की बात होती है, यह गीत आज भी याद किया जाता है. लता मंगेशकर की आवाज, मजरूह सुल्तानपुरी के बोल, आर.डी. बर्मन की धुन और जया भादुड़ी-संजीव कुमार की स्क्रीन केमिस्ट्री ने मिलकर इसे ऐसा गीत बना दिया, जिसकी मिठास पांच दशक से ज्यादा समय बाद भी कम नहीं हुई.