Hinduism 33 Crore Gods and Goddesses: हिंदू धर्म के बारे में एक बात आपने भी जरूर सुनी होगी कि इसमें 33 करोड़ देवी-देवता हैं. यह बात इतनी प्रचलित है कि कई लोगों के लिए यह एक स्थापित तथ्य जैसी लगती है. लेकिन जब इस दावे को वेदों और उपनिषदों के मूल संदर्भों के साथ देखा जाता है, तो तस्वीर कहीं ज्यादा दिलचस्प हो जाती है. बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य से जब देवताओं की संख्या पूछी जाती है, तो वे आखिरकार 33 देवताओं की स्पष्ट गणना बताते हैं. वहीं ऋग्वेद के एक मंत्र में 3,339 देवताओं का उल्लेख मिलता है. इसलिए ‘33’ और ‘33 करोड़’ को सीधे एक ही अर्थ में देखना शास्त्रीय संदर्भों को सरल बना देना होगा.
बृहदारण्यक उपनिषद में 33 देवताओं की साफ गणना
बृहदारण्यक उपनिषद के तीसरे अध्याय के नौवें ब्राह्मण में ऋषि याज्ञवल्क्य और विदग्ध शाकल्य का संवाद है. शाकल्य देवताओं की संख्या पूछते हैं. जवाब में बड़ी संख्या से बातचीत शुरू होती है, लेकिन जब पूछा जाता है कि वास्तव में कितने देवता हैं, तो याज्ञवल्क्य कहते हैं कि 33 देवता हैं. इसके बाद वह इन 33 की संरचना भी बताते हैं-8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, इंद्र और प्रजापति.
33 देवताओं के ये पांच हिस्से क्या हैं?
उपनिषद के अनुसार 8 वसु, 11 रुद्र और 12 आदित्य मिलकर 31 होते हैं. इनके साथ इंद्र और प्रजापति को जोड़ने पर संख्या 33 हो जाती है. यानी यहां बात 33 करोड़ अलग-अलग देवी-देवताओं की नहीं, बल्कि देवताओं और शक्तियों के एक विशिष्ट वैदिक वर्गीकरण की है.
वसु सिर्फ नाम नहीं, प्रकृति से जुड़ी अवधारणा
बृहदारण्यक उपनिषद में 8 वसुओं की व्याख्या भी दी गई है. इसमें अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, सूर्य, द्युलोक, चंद्रमा और नक्षत्रों को वसु कहा गया है. उपनिषद इन्हें उन तत्वों के रूप में समझाता है जिनमें संसार का ‘वसु’ यानी धन या आधार निहित है. इस वजह से वैदिक संदर्भ में वसुओं को सिर्फ मानवाकार देवताओं की सूची मान लेना पूरी तस्वीर नहीं देता.
11 रुद्र कौन हैं?
रुद्र नाम आते ही आज सबसे पहले भगवान शिव की याद आती है, लेकिन बृहदारण्यक उपनिषद की व्याख्या कुछ अलग है. वहां 11 रुद्रों को मनुष्य के दस प्राण और आत्मा के संदर्भ में समझाया गया है. उपनिषद कहता है कि जब ये शरीर से निकलते हैं तो लोग शोक करते हैं, इसलिए इन्हें रुद्र कहा गया. बाद की धार्मिक परंपराओं में रुद्र का संबंध शिव से और अधिक गहराई से जुड़ गया.
12 आदित्य का संबंध महीनों से
इसी संवाद में 12 आदित्यों को वर्ष के 12 महीनों से जोड़ा गया है. उपनिषद के अनुसार ये पूरे संसार को अपने साथ आगे ले जाते हैं और सब कुछ ‘आद’ यानी ग्रहण करते हुए चलते हैं. बाद के ग्रंथों में 12 आदित्यों के नामों की अलग-अलग सूचियां भी मिलती हैं, इसलिए हर परंपरा में उनकी सूची एक जैसी हो, यह जरूरी नहीं है. यहां संस्कृत के शब्द ‘कोटि’ को समझना जरूरी हो जाता है. संस्कृत शब्दकोशों में ‘कोटि’ के कई अर्थ मिलते हैं, जिनमें करोड़ के अलावा वर्ग, श्रेणी या विभाग का अर्थ भी शामिल है. इसलिए ‘33 कोटि’ को हर संदर्भ में सीधे ‘33 करोड़’ पढ़ना जरूरी नहीं है. एक सरकारी प्रकाशन में भी 33 कोटि देवताओं के संदर्भ में ‘कोटि’ को वर्ग या श्रेणी के अर्थ से समझाया गया है.
ऋग्वेद में 3,339 देवताओं का भी उल्लेख
मामला यहीं खत्म नहीं होता. ऋग्वेद के तीसरे मंडल के नौवें सूक्त के नौवें मंत्र में अग्नि की उपासना के संदर्भ में 3,339 देवताओं का उल्लेख मिलता है. यानी वैदिक साहित्य में देवताओं की संख्या के अलग-अलग संदर्भ मौजूद हैं. इसे सीधे ‘33 करोड़’ का प्रमाण मानना ठीक नहीं होगा, क्योंकि बृहदारण्यक उपनिषद उसी विषय पर 33 की विशिष्ट गणना करता है और बड़ी संख्या को उनकी शक्तियों या अभिव्यक्तियों के रूप में समझाता है.
याज्ञवल्क्य ने 33 से संख्या एक तक क्यों पहुंचाई?
बृहदारण्यक उपनिषद के इस संवाद की सबसे खास बात यही है. 33 देवताओं के बाद याज्ञवल्क्य संख्या को क्रमशः 6, 3, 2, डेढ़ और अंत में 1 तक ले जाते हैं. इसका उद्देश्य केवल गिनती बताना नहीं, बल्कि अनेक देवताओं और उनके पीछे मौजूद एक मूल सत्ता के विचार पर चर्चा करना है. यानी उपनिषद का संवाद संख्या से आगे जाकर दर्शन की ओर बढ़ता है.
ब्रह्मा-विष्णु-महेश को 33 की सूची में रखना सही नहीं
आज हिंदू धर्म की लोकप्रिय परंपरा में ब्रह्मा, विष्णु और शिव को त्रिमूर्ति के रूप में जाना जाता है. लेकिन इन तीनों को बृहदारण्यक उपनिषद की 33 देवताओं की उस सूची में सीधे रख देना सही नहीं होगा. त्रिमूर्ति की परिपक्व अवधारणा हिंदू धार्मिक विचार के बाद के विकास में अधिक स्पष्ट रूप से सामने आती है. ऑक्सफोर्ड अकादमिक के एक अध्ययन के अनुसार, ब्रह्मा, विष्णु और शिव की त्रिमूर्ति अवधारणा गुप्त काल तक स्पष्ट रूप से विकसित हो चुकी थी.
वैदिक और बाद की परंपरा को अलग-अलग समझना जरूरी
हिंदू धार्मिक परंपरा हजारों वर्षों में विकसित हुई है, इसलिए वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मण ग्रंथों, महाकाव्यों और पुराणों में देवताओं और दिव्यता की अवधारणाओं के रूप अलग-अलग स्तरों पर दिखाई देते हैं. किसी बाद की लोकप्रिय धार्मिक अवधारणा को उसी रूप में सबसे पुराने वैदिक ग्रंथों में खोज लेना कई बार भ्रम पैदा कर सकता है. 33 देवताओं की वैदिक गणना और बाद की त्रिमूर्ति जैसी अवधारणाओं को उनके अलग-अलग ऐतिहासिक संदर्भ में देखना ज्यादा सटीक तरीका है.