दिग्गज अभिनेत्री स्मिता पाटिल ने बॉलीवुड में महिलाओं के वस्तुकरण (Objectification) के खिलाफ निडर होकर आवाज उठाई थी. उन्होंने तर्क दिया कि फिल्म निर्माता मार्केटिंग के लिए महिला शरीर का शोषण करते है, जबकि नायकों को ऐसे चित्रण से छूट दी जाती है. उनका यह बयान आज भी फिल्म जगत में लिंग भेद पर सवाल खड़ा करता है.
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Parallel Cinema: भारतीय सिनेमा के इतिहास में स्मिता पाटिल एक ऐसा नाम है, जिन्होंने न केवल अपनी अदाकारी से समांतर सिनेमा को नई पहचान दी, बल्कि अपने बेबाक विचारों से फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं के प्रति संकीर्ण मानसिकता को भी चुनौती दी. हाल ही में सोशल मीडिया पर उनका एक दशक पुराना इंटरव्यू फिर से चर्चा में है, जिसमें उन्होंने बॉलीवुड में महिलाओं के चित्रण और मार्केटिंग के लिए उनके शरीर के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताई थी.
महिलाओं के प्रति दोहरा नजरिया
दूरदर्शन को दिए उस ऐतिहासिक साक्षात्कार में स्मिता पाटिल ने इंडस्ट्री के दोहरे मानदंडों पर प्रहार करते हुए कहा था, हीरो को तो आप नंगा दिखा नहीं सकते, क्योंकि उससे कुछ फायदा होने वाला नहीं है लेकिन औरत को नंगा दिखाने पर मेकर्स को लगता है कि सौ लोग और फिल्म देखने आ जाएंग. स्मिता का यह बयान उस दौर की व्यावसायिक फिल्मों के प्रचार के तरीकों पर एक करारा प्रहार था. उन्होंने साफ किया था कि अक्सर फिल्मों में महिलाओं को केवल एक ‘मार्केटिंग टूल’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है, ताकि दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचा जा सके.
फिल्म ‘चक्र’ का विवाद और स्मिता की स्पष्टता
यह बहस उस समय और तेज हो गई थी जब स्मिता पाटिल की फिल्म ‘चक्र’ (1981) के पोस्टर्स जारी हुए थे. फिल्म के एक पोस्टर में उन्हें खुले में नहाते हुए दिखाया गया था, जिसे काफी ‘बोल्ड’ माना गया. इंटरव्यू में जब उनसे इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि एक कलाकार के तौर पर फिल्म के भीतर सीन की अपनी अहमियत हो सकती है, लेकिन उसे पब्लिसिटी के लिए इस तरह पेश करना डिस्ट्रीब्यूटर्स और फिल्म निर्माताओं की व्यावसायिक सोच को दर्शाता है. उन्होंने तर्क दिया कि दर्शक भावनात्मक कहानियों को पसंद करते है, लेकिन उन पर यह विचार थोप दिया गया है कि फिल्में केवल ‘सेक्स’ और ‘एक्सपोज़र’ के दम पर चलती है.
एक सशक्त विरासत
स्मिता पाटिल ने अपने छोटे से करियर में 80 से अधिक फिल्मों में काम किया, जिनमें ‘मंथन’, ‘भूमिका’, ‘अर्थ’ और ‘मिर्च मसाला’ जैसी कालजयी फिल्में शामिल है. उन्होंने हमेशा ऐसे किरदारों को चुना जो महिलाओं को केवल बेचारी या सजावटी वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि निर्णय लेने वाली सशक्त हस्तियों के रूप में दिखाते थे. उन्होंने अपनी राष्ट्रीय पुरस्कार की राशि भी महिला कल्याण के लिए दान कर दी थी, जो उनके सिद्धांतों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है.
स्मिता पाटिल का प्रसिद्ध दूरदर्शन इंटरव्यू
यह वीडियो इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि इसमें स्मिता पाटिल ने स्वयं उन विचारों को साझा किया है जो आज भी बॉलीवुड में महिलाओं के चित्रण और ‘ऑब्जेक्टिफिकेशन’ पर होने वाली बहसों का आधार है.
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