1913 में भारत की पहली पूर्ण-लंबाई वाली भारतीय फीचर फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' आई थी. इस फिल्म में कोई हीरोइन नहीं थी और न ही कोई संवाद था. इस आर्टिकल में राजा हरिश्चंद्र फिल्म से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्सों के बारे में बताया गया है.
raja harishchandra movie
बॉलीवुड, यह नाम सुनते ही सलमान खान, शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय और दीपिका पादुकोण ऐसे न जाने कितने ही नाम हमारे जहन में आते हैं. लेकिन इस बॉलीवुड की शुरुआत हुई थी 40 मिनट लंबी एक फिल्म से. 1913 में भारत की पहली पूर्ण-लंबाई वाली भारतीय फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ आई, और इंडियन सिनेमा का सूत्रपात किया.
हालांकि, पहली फिल्म और इसके निर्माता दादा साहब फाल्के के बारे में तो सभी जानते होंगे, लेकिन दिलचस्प बात ये है कि इस फिल्म में कोई हीरोइन नहीं थी और न ही कोई संवाद था. अब सवाल ये उठता है कि फिल्म में महिला पात्र का अभिनय किसने किया, तो आइये जानते हैं बॉलीवुड की पहली फिल्म से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से!
1913 में बनी मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ का निर्माण बिना किसी अभिनेत्री के किया गया था. अगर आप 20वीं सदी के भारतीय इतिहास पर नजर डालें तो आपको समझ आ ही जायेगा उस समय महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलना, या ऑफिस में काम करना कितना मुश्किल था. और अगर बात फिल्म में काम करने की हो, तो उसके लिए तो शायद ही कोई तैयार होता.
समाज में महिलाओं पर सख्त पाबंदियों के कारण दादा साहब फाल्के के पास दो ही ऑप्शन थे. या तो वे बिना महिला किरदार वाली फिल्म बनाएं या किसी पुरुष से महिला किरदार करवाएं. फाल्के साहब ने दूसरा ऑप्शन चुना. फिल्म में सभी महिला किरदार पुरुषों द्वारा निभाए गए थे, जिनमें रानी तारामती का किरदार अन्ना सालुंके ने निभाया था.
इस फिल्म में दादासाहब फाल्के ने पूरी तरह से पुरुष कलाकारों का इस्तेमाल किया, लेकिन बाद में अपनी दूसरी फिल्म, मोहिनी भस्मासुर (1913) में दुर्गाबाई कामत और उनकी बेटी कमलाबाई गोखले को कास्ट करके उन्होंने इस रूढ़िवादी परंपरा को तोड़ दिया.
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस फिल्म में कोई संवाद नहीं है. फिल्म थी और मूक फिल्म में अतिरंजित अभिनय, शारीरिक हास्य, अभिव्यंजक शारीरिक भाषा और नाटकीय प्रकाश व्यवस्था का उपयोग बिना करके कथानक को व्यक्त किया जाता है. इसके अलावा संवाद के लिए इंटरटाइटल (टेक्स्ट कार्ड) का सहारा लिया गया था, जिससे लोगों को कहानी समझ आ सके.
भारतीय सिनेमा में दादा साहब फाल्के का योगदान अविस्मरणीय है. भारतीय सिनेमा में दादा साहब फाल्के के योगदान को मान्यता देते हुए, भारत सरकार ने 1969 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार की स्थापना की. यह पुरस्कार भारतीय सिनेमा में आजीवन योगदान के लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता है. 1971 में इंडिया पोस्ट ने फाल्के की सिनेमाई उपलब्धियों की स्मृति में एक डाक टिकट भी जारी किया था.
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