Mohammad Rafi Quit Singing: एक मौलवी के 'पापी' कहने के बाद मोहम्मद रफी ने खुद पर कई पाबंदियां लगा ली थीं. महान सिंगर की जयंती पर हम बताएंगे उनके बारे अनसुने किस्से.
Mohammad Rafi
Mohammad Rafi Quit Singing: सिर्फ अपने दौर के नहीं बल्कि हर दौर के सबसे उम्दा सिंगर मोहम्मद रफी भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके अमर गीत सदियों तक सूरों की खूशबू बिखेरते रहेंगे. सिर्फ हिंदी ही नहीं, बल्कि भोजपुरी, ओड़िया, पंजाबी, बंगाली, मराठी, मगही, मैथिली, उर्दू, इंग्लिश, फारसी और अरबी में भी गीत गाने वाले मोहम्मद रफी देश के उन चुनिंदा गायकों में थे, जिन्होंने हर दौर और हर मूड के गीत गाए. महान गायक मोहम्मद रफी ने 31 जुलाई, 1980 को दुनिया को अलविदा कह दिया. यह उनकी संगीत और गायिकी के प्रति दीवानगी ही थी कि निधन से चंद घंटे पहले उन्होंने एक गाना रिकॉर्ड किया था. बावजूद इसके कि उन्होंने 1970 में रिटायरमेंट का फैसला लिया था, वह भी एक रोचक किस्सा है. देश-दुनिया बुधवार (24 दिसंबर 2025) को महान गायक मोहम्मद रफी की 101वीं जयंती मना रही है. एक दौर था जब सिंगर मोहम्मद रफी के गानों के बगैर फिल्म अधूरी मानी जाती थी और उनकी गायिकी का मतलब फिल्म का मुकम्मल होना. दर्शक फिल्म यह ध्यान में रखकर देखने जाते थे कि इसमें सिंगर मोहम्मद रफी ने गाना गया है या नहीं? ब्रिटानिका (Britannica) के अनुसार, मोहम्मद रफी ने 40 वर्षों के गायिकी के सफर में 25,000 से अधिक गीत रिकॉर्ड किए. इस बीच वर्ष 1970 के दशक में अपने करियर की ऊंचाई पर उन्होंने अचानक रिटायरमेंट लेने का फैसला लिया. इसके पीछे एक रोचक वजह है. उनके रिटायरमेंट का मसला एक मुस्लिम मौलवी से जुड़ा है. मौलवी ने मोहम्मद रफी को ‘पापी’ कह दिया तो गायक को डर लगा. सिंगर ने उस आदमी की बात पर यकीन कर लिया और मान लिया कि उन्होंने बहुत बड़ा पाप किया है. महान सिंगर के बेटे शाहिद रफी ने एक इंटरव्यू में इस रोचक किस्से का खुलासा किया.
मोहम्मद रफी के बेटे शाहिद रफी ने यह भी स्वीकार किया है कि किशोर कुमार के साथ पापा मोहम्मद रफी की कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं थी. जाने-माने जर्नलिस्ट विक्की लालवानी के साथ एक इंटरव्यू में शाहिद रफी ने इस बात को अफवाह करार दिया है कि किशोर कुमार के साथ पापा की कोई प्रतिद्वंद्विता थी. शाहिद के मुताबिक, वर्ष 1971-72 की बात होगी. वह पैरेंट्स के साथ हज के लिए मक्का गए थे. यह दूसरा हज था. इसे ‘बड़ा हज’, या ‘अकबरी हज’ भी कहा जाता है. पापा खुदा को बहुत मानते थे और खुदा से डरते भी थे. मक्का में हज के दौरान एक मौलवी से मुलाकात हो गई. इस दौरान उन्होंने कहा ‘रफ़ी साहब, यह जो आप संगीत में हैं, यह बहुत बड़ा गुनाह है, ऊपर वाला आपको माफ़ नहीं करेगा. मौलवी की यह बात सुनकर सिंगर हैरान और परेशान हो गए.
शाहिद का कहना है कि इसके बाद से पापा लगातार टेंशन में थे. जब वह मुंबई लौटे तो साफ-साफ उन्होंने कहा कि वह रिटायर हो रहे हैं. उन्होंने काफी समय तक किसी से बात नहीं की. उन्होंने कहा कि वह दोबारा गाना नहीं गाएंगे. शाहिद ने बताया कि मुंबई छोड़कर लंदन चले गए. उस समय सिंगर मोहम्मद रफी की उम्र 40 बरस के आसपास थी. वह लंदन इसलिए गए कि वहां कोई उन्हें परेशान नहीं करेगा. शाहिद ने कहा कि यह बड़ा झटका था. उन्होंने कहा कि कुछ समय बाद पापा के भाई को चिंता होने लगी. वहीं, मोहम्मद रफी ने साफ कह दिया कि वह रिटायर हो गए हैं और गीत गाना अल्लाह को पसंद नहीं है, यह गुनाह है. शाहिद के बड़े भाई ने भी उनसे कहा कि उनके पास गाने के अलावा कोई और हुनर नहीं है. ऐसे में वह तो वह कोई बिजनेस नहीं चला पाएंगे या नौकरी नहीं कर पाएंगे. इस सबके बीच मोहम्मद रफी के बड़े बेटे ने उनसे कहा कि भगवान ने आपको सिर्फ एक चीज दी है, और वह आपकी आवाज है. बावजूद इसके रफी ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया.
शाहिद की मानें तो मोहम्मद रफी यह मान चुके थे कि गाने गाकर वह गुनाह ही कर रहे हैं. विडंबना यह थी कि एक दूसरे मौलाना ने उन्हें समझाया कि वह कोई गुनाह नहीं कर रहे हैं. बावजूद इसके रफी साहब नहीं माने. शाहिद ने बताया कि वह मौलाना लंदन में थे और उन्होंने मेरे पिता से कहा कि उन्हें भगवान द्वारा दिए गए तोहफे को बर्बाद नहीं करना चाहिए. मौलाना ने उन्हें समझाने की भी कोशिश की. इस दौरान उन्हें याद दिलाया कि उन्हें अपने परिवार का पेट पालना है. आखिरकार काफी सोच-विचार करने के बाद रफी ने मुंबई लौटने का फैसला किया. यहां संगीत निर्देशक नौशाद ने भी उनसे यही बात कही. लेकिन नुकसान हो चुका था. कई कलाकार रफी से आगे बढ़ चुके थे. कई संगीतकारों-प्रॉड्यूसर्स ने अपने प्रोजेक्ट्स के लिए दूसरे गायकों को हायर कर लिया था. शाहिद ने कहा कि इन झटकों के बावजूद उनके पिता ने कभी काम के लिए भीख नहीं मांगी. उन्हें हुनर के दम पर लगातार काम मिला.
मोहम्मद रफी ने एक दौर में एक गाने के लिए 70,000 से 80,000 तक चार्ज किए थे. लेकिन यह फीस लता मंगेशकर की फीस से काफी कम थी. बताया जाता है कि लता एक एक गाने के लिए 1-3 लाख तक चार्ज करती थीं. मोहम्मद रफी कम फीस लेते थे. रोचक बात यह है कि सिंगर ने सिर्फ 1 रुपये में भी कई सदाबहार गाने गाए. कहा जाता है कि ‘वो जब याद आए, बहुत याद आए’ और ‘रोशन तुम्हीं से दुनिया’ जैसे गानों को उन्होंने बिना किसी पैसे के गाया था. फीस के रूप में सिर्फ 1 रुपये लेने के पीछे का मकसद नए संगीतकारों को मौका देना था. यह भी कहा जाता है कि ‘हमसाया’ फिल्म के लिए मोहम्मद रफी ने 10,000 की फीस तक वापस लौटा दी थी.
मोहम्मद रफी को वर्ष 1967 में भारत सरकार ने पद्म श्री से सम्मानित किया. 31 जुलाई, 1980 में 55 साल की उम्र में उनका असमय निधन हो गया. बताया जाता है कि वह डायबिटीज और दिल की बीमारियों से पीड़ित थे. अपने गायकी के करियर में न सिर्फ हिंदी, बल्कि ओड़िया, पंजाबी, बंगाली, मराठी, मगही, मैथिली, उर्दू, इंग्लिश, फारसी और अरबी में भी गाने गाए हैं.
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