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Noida News: जब सड़क पर आ गए थे 150,000 मजदूर! भारत में कब-कब रोजी रोटी के लिए युवाओं ने उठाई आवाज?

Noida Workers Protest: यूपी के नोएडा में युवाओं ने तब अपनी आवाज बुलंद की जब उनका हक मारा गया. वहीं ये प्रदर्शन कब हिंसक प्रदर्शन बन गया पता ही नहीं चला. देखते ही देखते इस प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया और प्रशासन और युवाओं के बीच अच्छी-खासी हाथापाई भी देखने को मिली.

Noida Workers Protest: यूपी के नोएडा में युवाओं ने तब अपनी आवाज बुलंद की जब उनका हक मारा गया. वहीं ये प्रदर्शन कब हिंसक प्रदर्शन बन गया पता ही नहीं चला. देखते ही देखते इस प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया और प्रशासन और युवाओं के बीच अच्छी-खासी हाथापाई भी देखने को मिली. बता दें कि उत्तर प्रदेश के नोएडा में कल यानी 14 अप्रैल 2026 को अच्छा-खासा बवाल देखने को मिला . खास तौर पर, फेज़ 2 में. दरअसल, यहां विरोध प्रदर्शन वेतन भुगतान की मांग को लेकर किया जा रहा था. इतना ही नहीं इस विरोध प्रदर्शन ने एक हिंसक रूप धारण कर लिया. मज़दूरों ने पत्थरबाज़ी की और तोड़-फोड़ भी की. इसके बाद, पुलिस और मज़दूरों के बीच झड़पें और तेज़ हो गईं. वहीं बता दें कि इस घटना ने एक बार फिर भारत में मज़दूर आंदोलनों के लंबे और मज़बूत इतिहास को जगा दिया. आज हम आपको बताएंगे भारत में कब-कब और कहां कहां विरोध प्रदर्शन देखने को मिले हैं. 

यहां से मजदूरों ने उठाई आवाज

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत में संगठित मज़दूर आंदोलन 19वीं सदी के आखिर में, ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुआ. उस दौर में औद्योगिक मज़दूरों ने सही मज़दूरी और काम करने की बेहतर स्थितियों की मांग उठाई. सबसे शुरुआती पहलों में से एक, 1890 में नारायण मेघाजी लोखंडे द्वारा ‘बॉम्बे मिल हैंड्स एसोसिएशन’ का गठन था. बता दें कि लोखंडे को भारत के मज़दूर आंदोलन के अग्रणी नेताओं में से एक माना जाता है. इससे भी पहले, 1862 में, हावड़ा में रेलवे मज़दूरों ने देश में दर्ज किए गए पहले विरोध प्रदर्शनों में से एक किया था.

जब 150,000 मजदूरों ने उठाई आवाज

सिर्फ यही नहीं, बता दें कि देश आजाद होने से पहले ही कई ऐतिहासिक विरोध प्रदर्शनों ने संगठित मज़दूर आंदोलन की नींव रखी. 1918 की अहमदाबाद में मिल हड़ताल हुई और इसका नेतृत्व खुद देश महान शख्स महात्मा गांधी ने किया था, और ये आंदोलन एक अहम मोड़ साबित हुई. इसने मज़दूर विवादों में विरोध के अहिंसक तरीकों के इस्तेमाल की शुरुआत की. इसी तरह, 1928 की बॉम्बे कपड़ा हड़ताल के दौरान, लगभग 150,000 मज़दूरों ने कई महीनों तक विरोध प्रदर्शन किया. इसने औपनिवेशिक काल के दौरान ट्रेड यूनियनों की बढ़ती ताकत को दिखाया.

आज़ादी के बाद विरोध प्रदर्शन

आज़ादी के बाद, मज़दूर आंदोलन और ज़्यादा संगठित हो गया और इसका दायरा भी बढ़ा. 1968 की केंद्र सरकार के कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान, लगभग दस लाख मज़दूरों ने सही मज़दूरी की मांग की. यह आज़ाद भारत में सबसे शुरुआती देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों में से एक था. बाद में, 1974 की अखिल भारतीय रेलवे हड़ताल ने पूरे देश को ठप कर दिया; लाखों रेलवे मज़दूरों ने बेहतर वेतन और काम करने की बेहतर स्थितियों की मांग की.

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बॉम्बे में कपड़ा हड़ताल

आपको याद होगा जब 1982 में बॉम्बे में हुई कपड़ा हड़ताल ने भारत के इतिहास के सबसे बड़े औद्योगिक विरोध प्रदर्शनों में से एक साबित कर दिया था. इस दौरान मज़दूरों ने वेतन में कटौती और नौकरियों के जाने के खिलाफ आवाज उठाई थी. बता दें कि इस आंदोलन के मुंबई के कपड़ा उद्योग पर दूरगामी परिणाम हुए. इसने शहरी भारत में मज़दूरों और औद्योगिक प्रबंधन के बीच बढ़ते तनाव को उजागर किया.

2019 में भी सड़क पर आए थे मजदूर

सिर्फ यही नहीं पिछले कुछ सालों में, बढ़ते मज़दूरों के विरोध प्रदर्शनों ने चिंता और भी ज्यादा बढ़ा दी है. 2019 की राष्ट्रव्यापी हड़ताल में लगभग 150 मिलियन श्रमिकों ने हिस्सा लिया. इसके बाद, 26 नवंबर 2020 को लगभग 250 मिलियन श्रमिक और किसान इस हड़ताल में शामिल हुए. इन विरोध-प्रदर्शनों का मुख्य कारण श्रम कानूनों, रोज़गार की सुरक्षा और आर्थिक सुधारों से जुड़ी चिंताएँ थीं.

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