Raja Beta Syndrome: आजकल 'राजा बेटा सिंड्रोम' का खूब जिक्र हो रहा है. ये वही विकार है, जिसमें मां कहती है कि, 'मेरा बेटा तो राजा बेटा है', इसे कोई काम मत करने दो. अभी बच्चा है, मजे करने दो. इसलिए वे अपने बच्चों की गलतियों पर पर्दा डालने में जरा भी संकोच नहीं करतीं हैं. इसी को लेकर साइकोलॉजिस्ट राही (Psychologist Snowy Rahi) ने एक वीडियो शेयर किया है. वीडियो में उन्होंने इस तथाकथित ‘राजा बेटा सिंड्रोम’ की पोल खोली है-
क्या है राजा बेटा सिंड्रोम, जिसकी सोशल मीडिया पर हो रही चर्चा. (Canva)
Raja Beta Syndrome: वो कहते हैं न, अति किसी भी चीज की बुरी होती है. फिर चाहे वह प्रेम हो, भरोसा हो फिर काम. ठीक इसी तरह बच्चे के प्रति मां का अधिक लाड़-प्यार है. इसको नाम दिया गया है ‘राजा बेटा सिंड्रोम’. दरअसल, हम सभी जानते हैं कि हमारी माताएं हमसे असीम प्रेम करती हैं. वे अक्सर कहती हैं कि, ‘मेरा बेटा तो राजा बेटा है’, इसे कोई काम मत करने दो. अभी बच्चा है, मजे करने दो. इसलिए वे अपने बच्चों की गलतियों पर पर्दा डालने में जरा भी संकोच नहीं करतीं हैं. फिर एक समय बाद वह बिगड़ैल बन जाता है. आप भले ही इसको सही मानें, लेकिन साइकोलॉजिस्ट इसे बिलकुल सही नहीं मानते हैं. आजकल इसी को लेकर एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. ये वीडियो साइकोलॉजिस्ट राही (Psychologist Snowy Rahi) ने शेयर किया है. वीडियो में उन्होंने इस तथाकथित ‘राजा बेटा सिंड्रोम’ की पोल खोली है और बताया है कि कैसे यह परवरिश बच्चों (खासकर बेटों) को भविष्य के लिए अक्षम बना रही है. अब सवाल है कि आखिर राजा बेटा सिंड्रोम क्या है? बच्चों को जिम्मेदार कैसे बनाएं? यह परवरिश बच्चों के भविष्य को कैसे बना रही अक्षम-
एक्सपर्ट के अनुसार, राजा बेटा सिंड्रोम कोई मेडिकल बीमारी नहीं है, बल्कि एक ‘व्यवहारिक स्थिति’ है. यह तब पैदा होती है जब माता-पिता अपने बेटे को बिना किसी जिम्मेदारी के रखते हैं. उसे घर के किसी काम में हाथ नहीं बटाने दिया जाता और उसकी हर गलती को ‘बचपना’ कहकर माफ कर दिया जाता है. बाद में ऐसे बच्चे घर के कामों से दूर रहते हैं, अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते, हर चीज तुरंत मिलने की उम्मीद रखते हैं और अपनी गलती दूसरों दूसरों पर थोपते हैं.
‘राजा बेटा सिंड्रोम कोई प्यारा शब्द नहीं है. यह उस परवरिश का नतीजा है जहां हमने बच्चे को कभी एक उंगली तक नहीं हिलाने दी. हमने उसे सुख-सुविधाएं तो दीं, लेकिन जिम्मेदारी और जवाबदेही (Accountability) कभी नहीं सिखाई.’
वीडियो में साइकोलॉजिस्ट राही ने एक असल घटना का जिक्र करते हुए बताया कि वह एक परिवार से मिलने गईं, जहां उनका वयस्क बेटा (दाढ़ी-मूंछ वाला वयस्क) सोफे पर लेटा हुआ था. उसने न किसी का अभिवादन किया, न ही अपनी जगह से हिला, बल्कि एक ‘प्रीमियम बैड एटीट्यूड’ दिखा रहा था. जब उसकी मां ने प्यार से उसके सिर को चूमा, तो उसका जवाब था- ‘अरे यार मम्मी, गेम खेलने दो. ‘यह व्यवहार दिखाता है कि कैसे अत्यधिक लाड़-प्यार ने उसे दूसरों के प्रति सम्मान और अपनी जिम्मेदारियों से पूरी तरह काट दिया है.
रिपोर्ट के अनुसार, इस सिंड्रोम का सबसे बुरा असर उस लड़के की भविष्य की पार्टनर या पत्नी पर पड़ता है. ऐसे पुरुष वयस्क होने पर भी अपनी छोटी-छोटी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं. एक्सपर्ट बताती हैं कि जब पत्नी खाना बनाने, घर मैनेज करने और चीजों को ठीक करने में जुटी होती है, तब ‘राजा बेटा’ यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि ‘मुझे यह सब करना नहीं आता, तुम ही कर लो.’ वह काम इसलिए नहीं करता क्योंकि वह असमर्थ है, बल्कि इसलिए क्योंकि उससे कभी कुछ सीखने की उम्मीद ही नहीं की गई.
• घर के छोटे कामों में शामिल करें
• हर मांग तुरंत पूरी न करें
• गलती पर समझाएं, छुपाएं नहीं
• मेहनत और धैर्य की अहमियत बताएं
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