Medu Vada: मेदू वड़ा का नाम सुनते ही लोगों के मुंह में पानी आने लगता है. अपने कुरकुरे स्वाद और बेहतरीन बनावट के लिए पहचाने जाने वाला वड़ा सेहत से भरपूर होता है. लेकिन, इसके बीच में छेद क्यों किया जाता है, आइए जानते हैं सब कुछ?
Medu Vada
Medu Vada: जब भी खाने-पीने की बात आती है तो साउथ इंडिया का नाम अक्सर टॉप पर होता है. यहां का कल्चर और खाने की वैरायटी वाकई में लाजवाब है. खाना भी ऐसा वैसा नहीं बल्कि पौष्टिक और सेहतमंद से भरपूर होता है. यूं तो साउथ इंडिया में कई तरह की डिश आपके लिए मिल जाएंगी लेकिन आज हम यहां पर बात करने वाले हैं फेमस ‘वड़ा’ की.
यह काफी लजीज पकवान है. दक्षिण भारतीय घरों और खाने की जगहों पर ताजा तला हुआ वड़ा आपको सुनहरा, कुरकुरा, हल्की भाप निकलता हुआ सांबर या नारियल की चटनी में डुबोने के लिए जब मिलता है तो जीभ से पानी टपकने लगता है. लेकिन, कई लोगों को मन में यह सवाल आता है कि इसमें बीच में छेद क्यों होता है? आइए जानते हैं.
मेदू वड़ा का खास छेद सिर्फ़ सजावट के लिए नहीं है. यह कई पीढ़ियों की किचन की समझ का नतीजा है, जहां स्वाद, तकनीक और व्यावहारिकता ने मिलकर चुपचाप उस चीज़ को आकार दिया जिसे अब हम परंपरा मानते हैं. असल में यह छेद खाना पकाने की एक टेक्नीक होती है. दरअसल, मेदू वड़े भीगी और पिसी हुई उड़द दाल के गाढ़े घोल से बनाए जाते हैं. जब यह गाढ़ा घोल गरम तेल में जाता है तो इसे समान रूप से पकने में मदद की ज़रूरत होती है. बीच का खुला हिस्सा गर्मी को वड़े के अंदर तक जाने देता है, जिससे यह पकता है. अंदर का हिस्सा भी बाहर की तरह ही पके इसलिए इसके बीच में एक छेद किया जाता है. इसके बिना सतह बहुत जल्दी भूरी हो जाएगी जबकि बीच का हिस्सा कच्चा रह जाएगा. शायद ही कोई कच्चा पकवान खाना पसंद करे.
यह आकार वड़े को हल्का भी बनाता है. तेल के संपर्क में ज़्यादा सतह होने से वड़ा तेज़ी से तल जाता है और इस प्रक्रिया में कम तेल सोखता है. यही वह चीज है जो एक अच्छे मेदू वड़े को उसकी खास पहचान देती है. खाने पर इसके किनारे कुरकुरे की तरह कड़कड़ाते हैं और बीच में नरम हवादार हिस्सा मुंह में एक अलग ही स्वाद घोल देता है. छेद ज्यादा किनारे बनाता है और किनारे ही कुरकुरापन देते हैं. हर बाइट में आनंद देने वाली इस डिश को घरों, मंदिरों और सड़क के कोनों पर नाश्ते के तौर पर काफी पसंद किया जाता है. वड़े का यह आकार उसके सांस्कृतिक प्रतीक और परंपरा का एक संकेत बन गया है.
वड़े बनाने के तरीके में भी एक शांत लय होती है। पारंपरिक रूप से हाथ से आकार देते हुए, रसोइया गीली हथेली पर एक चम्मच घोल रखता है, धीरे से अंगूठे से बीच में दबाता है, और रिंग को गरम तेल में डाल देता है। छेद वड़े को अपना आकार बनाए रखने में मदद करता है और तलते समय पलटना आसान बनाता है। यह कुशल, सहज और लगभग ध्यान जैसा है — एक ऐसी तकनीक जो लिखित रेसिपी के बजाय देखकर ज़्यादा सीखी जाती है।

जब आप वड़े को नारियल की चटनी और सांभर में डुबोते कर खाते हैं तो यह आपको बेहत संतुष्टि और स्वाद के एक अलग ही लेवल पर ले जाता है. काम के अलावा यह छेद वड़े की पहचान का हिस्सा बन गया है. डोनट जैसा आकार तुरंत पहचाना जा सकता है, चाहे वह सड़क किनारे की दुकान पर स्टील की प्लेट में हो या किसी त्योहार के खाने में केले के पत्ते पर. किसी से वड़ा बनाने को कहिए, तो वे अपने आप बीच में छेद वाला एक गोल आकार बनाएंगे.यह आकार समय के साथ एक सांस्कृतिक प्रतीक बन गया है.
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