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‘मैंने बॉलीवुड कोरियोग्राफर बनने का सपना…’, इंसानियत को जिंदा रखने के लिए 24 साल का डिलीवरी बॉय कर रहा ऐसा काम, कहानी सुन दंग रह गया हर शख्स

Akash Saroj: आकाश ने बताया कि जिंदगी पहले से ही मुश्किल थी लेकिन पिता की मौत के बाद यह और भी मुश्किल हो गई. आकाश कहते हैं 'पिता परिवार का सबसे बड़ा सपोर्ट सिस्टम होते हैं. उन्हें खोना ऐसा लगता है जैसे सिर से कोई सुरक्षा कवच हट गया हो.'

Delivery Agent Kindness Story: कभी-कभी इंसान की असली दौलत उसके बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उसके दिल से मापी जाती है. इस भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहां लोग अपने सपनों और जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे रहते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी तकलीफों के बीच दूसरों के लिए उम्मीद की किरण बन जाते हैं. ऐसी ही एक कहानी है स्विगी डिलीवरी एजेंट आकाश सरोज की जो सीमित कमाई और भारी पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद जरूरतमंदों और बेजुबान जानवरों की मदद करने का हौसला रखते हैं. आकाश की कहानी सिर्फ संघर्ष की नहीं, बल्कि उस दर्द की भी है जिसने उन्हें इंसानियत का असली मतलब सिखाया. उसकी कहानी यह एहसास कराती है कि रिसोर्स से ज्यादा इरादा जरूरी है. 

आकाश सरोज 24 साल के डिलीवरी एजेंट हैं, जिन्होंने अपनी छोटी-छोटी मदद से सोशल मीडिया पर लोगों का सम्मान हासिल किया है. उनके पास दान करने के लिए बहुत पैसा नहीं है और वह अपने परिवार के लिए कमाने के लिए दिनभर सड़कों पर मेहनत करते हैं. फिर भी वह अपने काम के साथ-साथ दूसरों की मदद करते हैं. वह अपनी कमाई का कुछ हिस्सा जानवरों को खाना खिलाने में लगाते हैं और डिलीवरी करते समय ऐसे लोगों पर नजर रखते हैं जिन्हें मदद की जरूरत हो सकती है.

कभी वह रिक्शा चलाने वाले को खाना खिलाते हैं और उसका टूटा हुआ रिक्शा ठीक करवाते हैं, तो कभी फुटपाथ पर सो रहे लोगों को कंबल बांटते हैं. आकाश की सोच और मदद करने का जज्बा देखकर लोग हैरान हो जाते हैं कि वह कम आय और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बावजूद यह सब कैसे कर लेते हैं.

आकाश कहां से लाते हैं पैसे?

आकाश बताते हैं कि ‘डिलीवरी एजेंट की जिंदगी बहुत मुश्किल होती है. हर समय काम का दबाव रहता है और खाने-पीने या आराम का भी समय नहीं मिलता. लगातार कॉल आते रहते हैं और काम सबसे पहले करना पड़ता है, क्योंकि इसी से घर चलता है.’ जब उनसे पूछा गया कि वह दूसरों की मदद के लिए पैसे कहां से लाते हैं तो आकाश ने कहा, ‘मैं अपनी कमाई में से जितना हो सके उतना मैनेज करने की कोशिश करता हूं. मैं सोशल मीडिया पर पोस्ट जरूर करता हूं, लेकिन वहां से कोई कमाई नहीं होती. मुझे ज्यादातर जुआ या सट्टेबाजी वाले ऐप्स के प्रमोशन के ऑफर मिलते हैं, लेकिन मैं उन्हें प्रमोट नहीं करना चाहता, क्योंकि मैं पैसों के लिए लोगों को गलत रास्ता नहीं दिखाना चाहता.”

पिता से सीखी थी दयालुता

आकाश कहते हैं कि उन्होंने दयालुता अपने पिता से सीखी थी, जो मजदूरी करते थे. साल 2024 में एक बीमारी के बाद उनके पिता का निधन हो गया. आकाश बताते हैं, “मेरे पिता मजदूर थे और काम के लिए विजयवाड़ा गए हुए थे. एक रात मेरी उनसे सामान्य बात हुई थी. अगले दिन सुबह उनके एक दोस्त का मैसेज आया कि उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई है और मुझे तुरंत आना चाहिए.”

“विजयवाड़ा दिल्ली से बहुत दूर है और ट्रेन से जाने में काफी समय लगता. मैंने उधार पैसे लेकर फ्लाइट से वहां पहुंचा. वहां पहुंचने पर देखा कि मेरे पिता अस्पताल में भर्ती थे, लेकिन उनका ठीक से इलाज नहीं हो रहा था. मैंने डॉक्टरों से बार-बार पूछा कि आखिर क्या हुआ, क्योंकि पहले वह बिल्कुल ठीक थे.”

आकाश ने बताया कि ‘डॉक्टरों ने कहा कि अब कुछ नहीं किया जा सकता. मैं पूरी तरह असहाय हो गया था. विजयवाड़ा में मुझे कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. लोगों को हिंदी समझ नहीं आती थी, मेरे पास बहुत कम पैसे थे और कई बार खाने के लिए भी कुछ नहीं होता था. जो थोड़े पैसे थे, वह पिता के इलाज में खर्च हो गए. मैंने डॉक्टरों से उन्हें दिल्ली के अस्पताल में भेजने की विनती की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. मेरा दिल टूट गया और मुझे लगा कि दुनिया में इंसानियत खत्म हो गई है.’ ‘आखिरी कोशिश के तौर पर मैंने पिता को दिल्ली लाने का फैसला किया. मैंने 2.5 लाख रुपये उधार लिए और ट्रेन एंबुलेंस बुक की, जिसमें डॉक्टर, इमरजेंसी सुविधा और जरूरी इंतजाम थे. लेकिन जब हम नागपुर के पास पहुंचे, तो मेरे पिता की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई और रास्ते में ही उनका निधन हो गया.’

पिता की मौत के बाद जिंदगी काफी मुश्किल

आकाश ने बताया कि जिंदगी पहले से ही मुश्किल थी लेकिन पिता की मौत के बाद यह और भी मुश्किल हो गई. आकाश कहते हैं ‘पिता परिवार का सबसे बड़ा सपोर्ट सिस्टम होते हैं. उन्हें खोना ऐसा लगता है जैसे सिर से कोई सुरक्षा कवच हट गया हो.’ ‘मैंने बॉलीवुड कोरियोग्राफर बनने का सपना देखा था. मैंने कलाकारों और डांसरों से ट्रेनिंग ली थी, और मेरे पिता ने हमेशा मेरे सपने को सपोर्ट किया था. उनकी अचानक मौत ने उन सपनों को पूरी तरह से तोड़ दिया.’

 ‘लेकिन उनके पिता की मौत ने उन्हें ज़िंदगी का एक सबक सिखाया. मुझे एहसास हुआ कि इस दुनिया में दया की बहुत कमी है. मैंने अपने पिता से दान का मतलब सीखा. वह एक दयालु और रहमदिल इंसान थे. गरीब होने के बावजूद, वह हमेशा दूसरों की हर तरह से मदद करते थे. आकाश की कहानी हमें याद दिलाती है कि दया के लिए दौलत की ज़रूरत नहीं होती. दया ज़रूरी है, और यह ऐसी चीज़ है जिसे हमें कभी नहीं खोना चाहिए चाहे ज़िंदगी कितनी भी मुश्किल क्यों न हो जाए.’

Divyanshi Singh

दिव्यांशी सिंह उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की रहने वाली हैं। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई की है और पिछले 4 सालों से ज्यादा वक्त से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। जियो-पॉलिटिक्स और स्पोर्टस में काम करने का लंबा अनुभव है।

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