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Home > देश > राजीव गांधी को ‘मजबूर’ करने वाला वह नेता, जिसे ‘हत्या-एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर’ के आरोप ने किया बर्बाद!

राजीव गांधी को ‘मजबूर’ करने वाला वह नेता, जिसे ‘हत्या-एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर’ के आरोप ने किया बर्बाद!

असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत पर कई गंभीर आरोप लगे. इनमें से निजी जीवन से जुड़ा था. आरोप था कि उनके कथित गैर-महिलाओं से संबंध थे. एक महिला ने दावा किया था प्रफुल्ल ने उनसे शादी की है. इसकी पुष्टि नहीं हो पाई.

Written By: JP YADAV
Last Updated: 2026-03-30 21:42:58

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Prafulla Kumar Mahanta Assam Assembly Election 2026 : असम विधानसभा चुनाव 2026 की तैयारी जोर-जोर से चल रही है. आगामी 9 अप्रैल को मतदान होना है जबकि 4 मई, 2026 को नतीजे आएंगे. इस बार राज्य में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के बीच मुख्य मुकाबला नजर आ रहा है. एक दौर था जब राज्य में भाजपा का वजूद नहीं के बराबर था और कांग्रेस बड़ी अहम पार्टी हुआ करती थी. 1980-90 के दशक में कांग्रेस के खिलाफ कई स्थानीय दल सक्रिय हुए. सत्ता विरोध लहर का फायदा मिला और कांग्रेस सत्ता कई बार बाहर हुई. आज के दौर में असम में जो रुतबा मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता हिमंता बिस्वा सरमा का है, वही हैसियत प्रफुल्ल कुमार महंत की थी. कांग्रेस जैसी मजबूत राजनीतिक पार्टी के सामने ना केवल प्रफुल्ल कुमार महंत लड़े बल्कि उन्होंने दो-दो बार राज्य की सत्ता संभाली. इस स्टोरी में हम आपको बताएंगे प्रफुल्ल कुमार महंत की राजनीति, उपलब्धि, नेटवर्थ और विवादों के बारे में. 

भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री का रिकॉर्ड

23 दिसंबर, 1952 में (उलुओनी, नागांव) असम में जन्में प्रफु्ल्ल कुमार महंत ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि वह राज्य के मुख्यमंत्री बनेंगे वह भी दो-दो बार. असम आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले प्रफुल्ल उस दौरान में यानी 1980-90 के दौर में युवाओं में खूब लोकप्रिय थे. उनका बोलना का अंदाज और शैली युवाओं को खूब भाता था. लोग कांग्रेस पार्टी से नाराज थे और विकल्प की तलाश में थे. ऐसे में प्रफुल्ल असम के युवाओं की उम्मीद बने. युवाओं के दम पर राज्य के दो बार मुख्यमंत्री बने. सिर्फ 33 वर्ष की उम्र में उन्होंने अमस के सीएम के तौर पर शपथ ली, हालांकि कुछ जानकार कहते हैं कि उस समय उनकी उम्र 33 वर्ष थी. अगर उनकी उम्र 33 साल भी मानें तो उनकी यह उपलब्धि कहीं से भी कम नहीं होती है.

असम आंदोलन के प्रमुख नेता थे

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, असम आंदोलन के सफल होने के बाद वर्ष 1985 में प्रफुल्ल कुमार महंत ने असम गण परिषद (AGP) की स्थापना में अहम भूमिका अदा की. इसके साथ ही उन्होंने सिर्फ 33 वर्ष की आयु में भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. 1985 में हुए असम विधानसभा चुनाव में असम गण परिषद ने शानदार जीत हासिल की. वह 1985 में भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने. इसके बाद 1990 में हुए असम विधानसभा चुनाव में उनकी सत्ता चली गई. 1996 में हुए चुनाव में उन्होंने वापसी की और 1985 में हुए चुनाव में असम गण परिषद चुनाव जीती और वह मुख्यमंत्री बने. 

क्या था असम आंदोलन 

आज की पीढ़ी असम आंदोलन के बारे में कम ही जानती है. असम में लोग अपने अस्तित्व और पहचान के लिए खड़े हुए. इस असम आंदोलन नाम मिला. यह आंदोललन 1979 से शुरू हुआ और 1985 तक चला. इसमें बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों की पहचान करना अहम मांगी थी.  इसके साथ अवैध प्रवासियों को मताधिकार से वंचित करने और राज्य से बाहर निकालने की मांग प्रमुख थी. यह एक ऐतिहासिक जन आंदोलन था. इसमें ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने अहम भूमिका अदा की. AASU की अगुवाई में यह आंदोलन 6 साल तक चला. इसमें आंदोलन का मुख्य उद्देश्य असम की सांस्कृतिक, भाषाई और जनसांख्यिकीय पहचान की रक्षा करना था. यह आंदोलन भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन यह मुद्दा अब भी चुनाव के दौरान गूंजता है.

AASU छात्र नेता के रूप में बनी पहचान

प्रफुल्ल कुमार महंत ने 1979 से 1985 के दौरान असम आंदोलन (विदेशी नागरिकों के खिलाफ/घुसपैठियों के खिलाफ) की अगुवाई की थी. वह असम छात्र संघ – AASU के छात्र नेता के तौर पर पूरे राज्य में मशहूर हुए. उनके आंदोलन का ही असर था कि असम समझौता 1985 में हुआ. प्रफुल्ल कुमार महंता ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ प्रसिद्ध ‘असम समझौते’ पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद ही असम आंदोलन का समापन हुआ.  उन्होंने गौहाटी विश्वविद्यालय से कानून में स्नातक की डिग्री हासिल की है. 

बनाई अपनी राजनीतिक पार्टी 

छात्र नेता के दौरान प्रफुल्ल कुमार महंत की पहचान पूरे राज्य में बन चुकी थी. राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते उन्होंने अपने करीबी लोगों के साथ असम गण परिषद की स्थापना की. असम गण परिषद (AGP) ने असम विधानसभा चुनाव 2026 में शानदार अंदाज में जीत हासिल की. भारी बहुमत मिला तो वह सीएम बने. वह भी देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री.  प्रफुल्ल ने 1985-1990 और फिर 1996-2001 तक असम में बतौर सीएम जनता की सेवा की. वह एजीपी के सह संस्थापक होने के साथ ही अध्यक्ष भी बने. 

राजनीतिक करियर 

प्रफुल्ला कुमार महंत ने 1991 से 2021 के दौरान असम की बरहमपुर विधानसभा सीट और फिर 1985 से 1991 के दौरान नौगोंग विधानसभा सीट से दमदार तरीके से चुनाव जीते. उनकी पार्टी 1990 में विधानसभा चुनाव हारी तो 1991 से 1996 और फिर 2010 से 2014 तक असम विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में प्रफुल्ल ने जिम्मेदारी संभाली. यह भी रोचक बात है कि अगस्त 2005 में असम गण परिषद (एजीपी) में उनकी सदस्यता समाप्त कर दी गई थी. इसके बाद 15 सितंबर 2005 को एक नई राजनीतिक पार्टी असम गण परिषद (प्रगतिशील) का गठन किया, लेकिन वह पुराना दम नहीं दिखा सके. 

विवादों से घिरा रहा दूसरा कार्यकाल

असम गण परिषद ने विधानसभा चुनाव जीता तो प्रफुल्ल कुमार महंत वर्ष 1996 में  दूसरी बार असम के मुख्यमंत्री बने. पहली कार्यकाल जितना अच्छा रहा उतना दूसरा कार्यकाल नहीं. यह यानी दूसरा कार्यकाल अत्यधिक विवादों से घिरा रहा. इस दौरान आतंकवाद-विरोधी रणनीति का खुलासा हुआ तो हड़कंप मच गया. इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दी. प्रफुल्ल पर आरोप था कि यह सब उनके निर्देशन में  हुआ. उनकी मुसीबत बढ़ने लगी थी. जून 1997 में यूएलएफए ने महंत पर हमला किया. आरोप है कि पुलिस ने आत्मसमर्पण कर चुके यूएलएफए कार्यकर्ताओं को सक्रिय विद्रोहियों के परिवार के सदस्यों की हत्या करने के लिए मजबूर किया. मामला गंभीर था, इसलिए इन हत्याओं की जांच के लिए आयोग का गठन किया गया. गठित आधिकारिक आयोग ने 2007 में नतीजा निकाला कि इस नीति के लिए महंत सीधे तौर पर जिम्मेदार थे. इस मामले में वह बच गए, लेकिन इस मामले की जांच 2001 में फिर से शुरू की गई.  2001 के चुनाव में एजीपी ने केवल 20 सीटें जीतें.

विवाहेतर संबंध ने पहुंचाया राजनीतिक तौर पर नुकसान

प्रफुल्ल कुमार महंत की मुसीबत बढ़ने लगी और उनका राजनीतिक अवसान जारी था. उन पर विवाहेतर संबंध होने का भी आरोप लगा. यही वजह थी कि प्रफुल्ल को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया.यह अलग बात है कि राजनीतिक विवादों और व्यक्तिगत जीवन की अटकलों का कोई आधिकारिक सबूत नहीं मिला. कहने का मतलब कोई आधिकारिक कानूनी दोषसिद्धि या पुष्टि नहीं हो पाई, लेकिन प्रफुल्ल का राजनीतिक करियर बहुत प्रभावित हुआ. 

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Prafulla Kumar Mahanta Assam Assembly Election 2026 : असम विधानसभा चुनाव 2026 की तैयारी जोर-जोर से चल रही है. आगामी 9 अप्रैल को मतदान होना है जबकि 4 मई, 2026 को नतीजे आएंगे. इस बार राज्य में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) के बीच मुख्य मुकाबला नजर आ रहा है. एक दौर था जब राज्य में भाजपा का वजूद नहीं के बराबर था और कांग्रेस बड़ी अहम पार्टी हुआ करती थी. 1980-90 के दशक में कांग्रेस के खिलाफ कई स्थानीय दल सक्रिय हुए. सत्ता विरोध लहर का फायदा मिला और कांग्रेस सत्ता कई बार बाहर हुई. आज के दौर में असम में जो रुतबा मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता हिमंता बिस्वा सरमा का है, वही हैसियत प्रफुल्ल कुमार महंत की थी. कांग्रेस जैसी मजबूत राजनीतिक पार्टी के सामने ना केवल प्रफुल्ल कुमार महंत लड़े बल्कि उन्होंने दो-दो बार राज्य की सत्ता संभाली. इस स्टोरी में हम आपको बताएंगे प्रफुल्ल कुमार महंत की राजनीति, उपलब्धि, नेटवर्थ और विवादों के बारे में. 

भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री का रिकॉर्ड

23 दिसंबर, 1952 में (उलुओनी, नागांव) असम में जन्में प्रफु्ल्ल कुमार महंत ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि वह राज्य के मुख्यमंत्री बनेंगे वह भी दो-दो बार. असम आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले प्रफुल्ल उस दौरान में यानी 1980-90 के दौर में युवाओं में खूब लोकप्रिय थे. उनका बोलना का अंदाज और शैली युवाओं को खूब भाता था. लोग कांग्रेस पार्टी से नाराज थे और विकल्प की तलाश में थे. ऐसे में प्रफुल्ल असम के युवाओं की उम्मीद बने. युवाओं के दम पर राज्य के दो बार मुख्यमंत्री बने. सिर्फ 33 वर्ष की उम्र में उन्होंने अमस के सीएम के तौर पर शपथ ली, हालांकि कुछ जानकार कहते हैं कि उस समय उनकी उम्र 33 वर्ष थी. अगर उनकी उम्र 33 साल भी मानें तो उनकी यह उपलब्धि कहीं से भी कम नहीं होती है.

असम आंदोलन के प्रमुख नेता थे

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, असम आंदोलन के सफल होने के बाद वर्ष 1985 में प्रफुल्ल कुमार महंत ने असम गण परिषद (AGP) की स्थापना में अहम भूमिका अदा की. इसके साथ ही उन्होंने सिर्फ 33 वर्ष की आयु में भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. 1985 में हुए असम विधानसभा चुनाव में असम गण परिषद ने शानदार जीत हासिल की. वह 1985 में भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने. इसके बाद 1990 में हुए असम विधानसभा चुनाव में उनकी सत्ता चली गई. 1996 में हुए चुनाव में उन्होंने वापसी की और 1985 में हुए चुनाव में असम गण परिषद चुनाव जीती और वह मुख्यमंत्री बने. 

क्या था असम आंदोलन 

आज की पीढ़ी असम आंदोलन के बारे में कम ही जानती है. असम में लोग अपने अस्तित्व और पहचान के लिए खड़े हुए. इस असम आंदोलन नाम मिला. यह आंदोललन 1979 से शुरू हुआ और 1985 तक चला. इसमें बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों की पहचान करना अहम मांगी थी.  इसके साथ अवैध प्रवासियों को मताधिकार से वंचित करने और राज्य से बाहर निकालने की मांग प्रमुख थी. यह एक ऐतिहासिक जन आंदोलन था. इसमें ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने अहम भूमिका अदा की. AASU की अगुवाई में यह आंदोलन 6 साल तक चला. इसमें आंदोलन का मुख्य उद्देश्य असम की सांस्कृतिक, भाषाई और जनसांख्यिकीय पहचान की रक्षा करना था. यह आंदोलन भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन यह मुद्दा अब भी चुनाव के दौरान गूंजता है.

AASU छात्र नेता के रूप में बनी पहचान

प्रफुल्ल कुमार महंत ने 1979 से 1985 के दौरान असम आंदोलन (विदेशी नागरिकों के खिलाफ/घुसपैठियों के खिलाफ) की अगुवाई की थी. वह असम छात्र संघ – AASU के छात्र नेता के तौर पर पूरे राज्य में मशहूर हुए. उनके आंदोलन का ही असर था कि असम समझौता 1985 में हुआ. प्रफुल्ल कुमार महंता ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ प्रसिद्ध ‘असम समझौते’ पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद ही असम आंदोलन का समापन हुआ.  उन्होंने गौहाटी विश्वविद्यालय से कानून में स्नातक की डिग्री हासिल की है. 

बनाई अपनी राजनीतिक पार्टी 

छात्र नेता के दौरान प्रफुल्ल कुमार महंत की पहचान पूरे राज्य में बन चुकी थी. राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते उन्होंने अपने करीबी लोगों के साथ असम गण परिषद की स्थापना की. असम गण परिषद (AGP) ने असम विधानसभा चुनाव 2026 में शानदार अंदाज में जीत हासिल की. भारी बहुमत मिला तो वह सीएम बने. वह भी देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री.  प्रफुल्ल ने 1985-1990 और फिर 1996-2001 तक असम में बतौर सीएम जनता की सेवा की. वह एजीपी के सह संस्थापक होने के साथ ही अध्यक्ष भी बने. 

राजनीतिक करियर 

प्रफुल्ला कुमार महंत ने 1991 से 2021 के दौरान असम की बरहमपुर विधानसभा सीट और फिर 1985 से 1991 के दौरान नौगोंग विधानसभा सीट से दमदार तरीके से चुनाव जीते. उनकी पार्टी 1990 में विधानसभा चुनाव हारी तो 1991 से 1996 और फिर 2010 से 2014 तक असम विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में प्रफुल्ल ने जिम्मेदारी संभाली. यह भी रोचक बात है कि अगस्त 2005 में असम गण परिषद (एजीपी) में उनकी सदस्यता समाप्त कर दी गई थी. इसके बाद 15 सितंबर 2005 को एक नई राजनीतिक पार्टी असम गण परिषद (प्रगतिशील) का गठन किया, लेकिन वह पुराना दम नहीं दिखा सके. 

विवादों से घिरा रहा दूसरा कार्यकाल

असम गण परिषद ने विधानसभा चुनाव जीता तो प्रफुल्ल कुमार महंत वर्ष 1996 में  दूसरी बार असम के मुख्यमंत्री बने. पहली कार्यकाल जितना अच्छा रहा उतना दूसरा कार्यकाल नहीं. यह यानी दूसरा कार्यकाल अत्यधिक विवादों से घिरा रहा. इस दौरान आतंकवाद-विरोधी रणनीति का खुलासा हुआ तो हड़कंप मच गया. इसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दी. प्रफुल्ल पर आरोप था कि यह सब उनके निर्देशन में  हुआ. उनकी मुसीबत बढ़ने लगी थी. जून 1997 में यूएलएफए ने महंत पर हमला किया. आरोप है कि पुलिस ने आत्मसमर्पण कर चुके यूएलएफए कार्यकर्ताओं को सक्रिय विद्रोहियों के परिवार के सदस्यों की हत्या करने के लिए मजबूर किया. मामला गंभीर था, इसलिए इन हत्याओं की जांच के लिए आयोग का गठन किया गया. गठित आधिकारिक आयोग ने 2007 में नतीजा निकाला कि इस नीति के लिए महंत सीधे तौर पर जिम्मेदार थे. इस मामले में वह बच गए, लेकिन इस मामले की जांच 2001 में फिर से शुरू की गई.  2001 के चुनाव में एजीपी ने केवल 20 सीटें जीतें.

विवाहेतर संबंध ने पहुंचाया राजनीतिक तौर पर नुकसान

प्रफुल्ल कुमार महंत की मुसीबत बढ़ने लगी और उनका राजनीतिक अवसान जारी था. उन पर विवाहेतर संबंध होने का भी आरोप लगा. यही वजह थी कि प्रफुल्ल को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया.यह अलग बात है कि राजनीतिक विवादों और व्यक्तिगत जीवन की अटकलों का कोई आधिकारिक सबूत नहीं मिला. कहने का मतलब कोई आधिकारिक कानूनी दोषसिद्धि या पुष्टि नहीं हो पाई, लेकिन प्रफुल्ल का राजनीतिक करियर बहुत प्रभावित हुआ. 

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