Dharti Pakad Death: 2012 में नागरमल बाजोरिया ने राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ा था. उन्होंने प्रणब मुखर्जी के खिलाफ अपना नॉमिनेशन पेपर फाइल किया था. उन्होंने ग्राम पंचायत वार्ड लेवल से लेकर प्रेसिडेंट पद तक के चुनाव लड़े.
280 से ज्यादा चुनाव लड़ने वाले धरती पकड़ नागरमल बाजोरिया का निधन
Dharti Pakad Death: बिहार के भागलपुर के रहने वाले नागरमल बाजोरिया उर्फ ”धरती पकड़” का निधन हो गया है. उन्होंने पंचायत से लेकर राष्ट्रपति पद तक 280 से ज़्यादा चुनाव लड़े थे. 3 सितंबर को पटना में 96 साल की उम्र में उन्होंने आखिरी सांस ली. भले ही उन्हें हर चुनाव में हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने इसे कभी हार नहीं माना. चुनाव लड़ने का उनका इरादा आखिर तक कायम रहा. शुक्रवार को भागलपुर के बरारी श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.
नागरमल बाजोरिया ने अपने लंबे चुनावी करियर में कई बड़ी राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ चुनाव लड़ा. उन्होंने सबसे पहले 1969 में पूर्व राष्ट्रपति वी.वी. गिरी के खिलाफ अपना नॉमिनेशन फाइल किया था. उन्होंने रायबरेली से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और अमेठी से राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था. इन चुनावों में उनके चुनावों ने उन्हें नेशनल सेंसेशन बना दिया था.
2012 में, नागरमल बाजोरिया ने राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़ा था. उन्होंने प्रणब मुखर्जी के खिलाफ अपना नॉमिनेशन पेपर फाइल किया था. उन्होंने ग्राम पंचायत वार्ड लेवल से लेकर प्रेसिडेंट पद तक के चुनाव लड़े.
नागरमल बाजोरिया और उनका परिवार 1930 में लाहौर, पाकिस्तान से भागलपुर आ गया. भागलपुर उनकी कर्मभूमि बन गया और वे वहाँ लंबे समय तक सामाजिक और चुनावी गतिविधियों में सक्रिय रहे. चुनाव लड़ने के बारे में नागरमल बाजोरिया ने कहा कि चुनाव जीतना कभी उनकी प्राथमिकता नहीं रही. उनका मुख्य लक्ष्य लोगों को लोकतंत्र में आम आदमी की ताकत का एहसास कराना था.
नागरमल बाजोरिया का चुनावी करियर भी उनकी समाज सेवा जितना ही चर्चा में रहा. अपने आखिरी सालों में वे बढ़ती उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते रहे. इसके बावजूद, चुनाव लड़ने का उनका जुनून कम नहीं हुआ.उनका जीवन लोकतंत्र में आम लोगों की भागीदारी और अपनी ताकत पर उनके विश्वास का एक उदाहरण माना जाता था.
वे हर हार के बाद फिर से चुनावी मैदान में उतर जाते थे. नागरमल बाजोरिया ज़िंदगी भर चुनावी मैदान में डटे रहे. उनके विरोधियों ने उन्हें हर चुनाव में हराया, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. चुनाव के नतीजों की परवाह किए बिना वे बार-बार चुनाव लड़ते रहे.
इसी हिम्मत की वजह से उन्हें भागलपुर में “धरती पकड़” निकनेम मिला. उनके लिए चुनाव लड़ना सिर्फ़ जीत का ज़रिया नहीं था, बल्कि डेमोक्रेटिक प्रोसेस में अपनी हिस्सेदारी दर्ज कराने का एक तरीका था.
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