India News (इंडिया न्यूज़), Maratha Reservation, मुंबई: महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मुद्दा चार साल बाद एक बार फिर गरमा गया है, जालना में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज की घटना ने तूल पकड़ लिया है। जालना की घटना के बाद, नाराज मराठा समुदाय ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है, जिसमें उपमुख्यमंत्री अजीत पवार का गृहनगर बारामती भी शामिल है।
पिछले 15 दिनों से अनशन पर बैठे कार्यकर्ता मनोज जारांगे की एक सीधी मांग है- मराठों के लिए आरक्षण। राज्य सरकार ने मराठवाड़ा के मराठों को ओबीसी प्रमाण पत्र देने का फैसला किया था, लेकिन अब एक समिति बनाई है। समिति उन लोगों को कुनबी जाति प्रमाण पत्र जारी करेगी जिनके पास निज़ाम युग के राजस्व या शिक्षा दस्तावेज हैं जिसमें उन्हें कुनबी के रूप में पहचान मिली हुई है।
Maratha Reservation
मनोज जारांगे इस बात पर अड़े हैं कि पूरे महाराष्ट्र में मराठों को कुनबी माना जाए और सरकार को ओबीसी कोटा का लाभ उठाने के लिए जाति प्रमाण पत्र जारी करना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि राज्य सरकार ने 2004 में एक सरकारी संकल्प (जीआर) जारी किया था जिसमें मराठा-कुनबी, कुनबी-मराठा और कुनबी को कुनबी जाति प्रमाण पत्र देने का वादा किया गया था।
लेकिन पिछले 19 वर्षों से इस पर अमल नहीं हो सका है, जिसे राज्य सरकार को तत्काल जीआर में संशोधन कर लागू करना चाहिए। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मराठा आरक्षण के मुद्दे पर सोमवार देर शाम एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी, जहां सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया कि जारांगे को अपना विरोध समाप्त करना चाहिए और सेवानिवृत्त न्यायाधीश संदीप शिंदे समिति को इस मुद्दे पर काम करने के लिए कुछ समय देना चाहिए।
बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि जारांगे अपने खेमे से किसी व्यक्ति को शिंदे समिति का सदस्य मनोनीत कर सकते हैं। राज्य सरकार ने जालना घटना के दौरान मराठा समुदाय के खिलाफ दर्ज सभी अपराधों को वापस लेने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। 1931 में हुई अंतिम जाति जनगणना के अनुसार, महाराष्ट्र की 30% आबादी में मराठा शामिल हैं। 20 वर्षों से अधिक समय से, समुदाय शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग कर रहा है।
2017-18 के दौरान भाजपा-शिवसेना सरकार को समुदाय को 16% आरक्षण देने का फैसला किया गया। साल 2021 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इसमें इसे रद्द कर दिया और कोर्ट ने कहा कि 1992 का फैसला जिसमें 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा कय की गई उसपर विचार करने का कोई कारण नहीं है।
2024 के लोकसभा चुनाव नजदीक आने के साथ, मराठा आरक्षण मुद्दा निश्चित रूप से वर्तमान भाजपा-शिवसेना सरकार के लिए सिरदर्द बनता जा रहा है अगर सरकार ने जल्द इसका कोई समाधान नहीं निकाला तो चुनाव में इसका नुकसान हो सकता है।
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