वक्त था 1739 का जब दिल्ली पर उसके समृद्ध और लंबे इतिहास के सबसे बड़े हमलों में से एक हुआ. उस टाइम ईरान को फारस के नाम से पहचाना जाता था. ईरान के शासक ने भारत पर हमला किया और जमकर लूटपाट मचाई.
नादिर शाह ने जब लूटा था मयूर सिंहासन
दिल्ली। ईरान इस वक्त बड़े युध्द से गुजर रहा है. तो चलिए ईरान से जुड़े इतिहास के बारे में बात कर लेते हैं. वक्त था 1739 का जब दिल्ली पर उसके समृद्ध और लंबे इतिहास के सबसे बड़े हमलों में से एक हुआ. उस टाइम ईरान को फारस के नाम से पहचाना जाता था.
फारसी शासक (अब ईरान) नादिर शाह ने मयूर सिंहासन लूट लिया और फिर कभी वापस नहीं लौटा. उसने बादशाह मुहम्मद शाह को हराकर, मशहूर रत्न जड़ित सिंहासन जो दौलत और ताकत का एक शानदार प्रतीक था, छीनने के लिए मुगल राजधानी में मार्च किया.
नादिर शाह को कोई गद्दी विरासत में नहीं मिली थी. उसने शुरू में ईरान के ऊबड़-खाबड़ खुरासान के योद्धाओं के एक ग्रुप को लीड करते हुए अपना करियर शुरू किया था. हालांकि, उसने जल्द ही अपनी अलग पहचान बनाई और ईरान की पॉलिटिक्स को देखने वाला असली अधिकारी बन गया. 1736 तक, उसने अफ़शरीद राजवंश की स्थापना की और औपचारिक रूप से खुद को ईरान का शाह घोषित कर दिया.
उसने दिल्ली में 57-दिन तक नरसंहार किया और कोहिनूर के साथ आज के समय में लगभग 10,50,000 करोड़ रुपये के बराबर दौलत लूटी. 1730 के दशक के आखिर तक शाह की इच्छा पूरब की ओर मुड़ गई. जब कभी शानदार मुगल साम्राज्य बर्बाद हो गया था, तो उसने भारत में एक अभियान शुरू किया. फरवरी 1739 में उसने एक बार फिर अपनी सैन्य ताकत दिखाई और सम्राट मुहम्मद शाह को हराकर करनाल की लड़ाई जीत ली. इसके बाद जो हुआ वह भारत के इतिहास की सबसे खतरनाक घटनाओं में से एक थी. दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया गया और हज़ारों लोगों का कत्लेआम कर दिया गया. नादिर शाह साम्राज्य के अमीर और कीमती खज़ानों के साथ चला गया, जिनकी कीमत उस समय लगभग 70 करोड़ रुपये थी. उसने मुगल दरबार के दो सबसे बड़े खज़ानों कोहिनूर और तख्त-ए-मुरासा, जिसे मयूर सिंहासन (मुगल दरबारों में मौजूद सबसे शानदार सीट) के नाम से जाना जाता था, को लूट लिया.
मयूर सिंहासन को मुगल सम्राट शाहजहां ने 1628 में बनवाया था. इसे 1635 तक बनाने में सुनारों और जौहरियों को सात साल लगे. इसकी कीमत लगभग 1 करोड़ रुपये आंकी गई है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसे 1,150 kg वज़न के ठोस सोने, 230 kg वज़न के कीमती रत्नों, जिसमें कोहिनूर हीरा, रूबी, पन्ना और मोती शामिल थे, से सजाया गया था. इस डिजाइन में 12 पन्ना के खंभे थे जिन पर रत्नों से सजे मोर के आकार, गहने और पेड़ों और पक्षियों को दिखाते हुए एनामेल पैनल थे. नादिर शाह ने दूसरे कीमती खजानों के साथ, हाथी, घोड़े और ऊंट पर लादकर सिंहासन को लूटा और ईरान ले गया.
1747 में नादिर शाह की उसके ही गार्ड्स ने हत्या कर दी. इतिहास के जानकारों के मुताबिक, बदनाम सिंहासन को तोड़ दिया गया और उसका सोने का फ्रेम पिघला दिया गया और रत्नों को शाही कलेक्शन में बांट दिया गया. दिल्ली के नरसंहार और मोर सिंहासन की लूट ने भारत में मुगल शासन के खत्म होने का संकेत दिया.
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