अंके गौड़ा (Anke Gowda) को आपमें से बहुत कम लोग जानते होंगे. उनकी कहानी जितनी ही मुश्किल उतनी ही कही ज्यादा प्रेरणादायक (Inspiring) भी है.
बस कंडक्टर से लेकर सबसे बड़ी पुस्तकालय खोलने तक का सफर, कौन हैं अंके गौड़ा?
Who is Anke Gowda: यह कहानी किसी चमत्कार से कम देखने को नहीं मिलेगी. जहां, कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) में एक साधारण बस कंडक्टर की नौकरी करने वाला व्यक्ति देश का सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय खोलकर पूरे देश का नाम विश्वभर में गर्वा से ऊंचा कर देते हैं. यह कहानी एक ऐसे महान व्यक्ति के बारे में जिन्होंने अपनी मेहनत और लगन से यह साबित कर दिया कि इंसान चाहे तो क्या कुछ नहीं कर सकता है.
कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) में एक साधारण बस कंडक्टर की नौकरी करने वाला अंके गौड़ा के बारे में आपमें से बहुत कम लोगों को पता होगा. अंके गौड़ा को प्यार से देशभर में ‘पुस्तकों का मसीहा’ भी कहा जाता है. उन्होंने अपने जीवन में 30 साल की उम्र से ज्यादा अपनी जमा-पूंजी का एक-एक पैसा किताबों को सहेजने में लगा दिया. तो वहीं, मांड्या जिले के एक छोटे से गांव में उनका पुस्तकालय आज देशभर के लोगों के लिए ज्ञान के मंदिर के रूप में स्थापित है.
अंके गौड़ा की यात्रा की शुरुआत 1970 के दशक में शुरू हुई थी. जब वह साधारण बस कंडक्टर के रूप में काम करते थे. जब उन्होंने देखा कि लोग अखबार और पत्रिकाएं बस में ही छोड़ जाते हैं, तब से उन्होंने इन्हें एकत्रित करना शुरू कर दिया. इस बात से बेहद ही अंजान की धीरे-धीरे उनका यह शौक एक जुनून में तेजी से बदलता जा रहा था. इस जुनून को उन्होंने सच में बदलने के लिए अपनी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा पुरानी किताबों की दुकानों और रद्दी वालों से दुर्लभ पुस्तकें खरीदने में पूरी तरह से खर्च करने का एक बड़ा फैसला लिया. बेशक उनके पास रहने के लिए शायद आलीशान घर न हो, लेकिन उनकी किताबों के लिए उन्होंने अपना सब कुछ पूरी करह से समर्पित कर दिया था.
आपमें से बहुत कम लोगों को इस बात की हैरानी होगी कि उनके पुस्तकालय में 10 लाख से ज्यादा पुस्तकें हैं, जो 20 से अधिक भाषाओं में उपलब्ध हैं. तो वहीं, यहां खगोल विज्ञान से लेकर कृषि, साहित्य और इतिहास तक की दुर्लभ तरह की पुस्तकें पूरी तरह से देखने को मिलेंगी. हालांकि, सबसे ज्यादा खास बात यह है कि यह पुस्तकालय शोधकर्ताओं, छात्रों और आम जनता के लिए पूरी तरह से निःशुल्क है. इसके अलावा, अंके गौड़ा स्वयं हर किताब की लोकेशन और विषय को जुबानी याद रखते हैं, जो किसी आधुनिक सर्च इंजन से कम नहीं है.
उनकी इस निस्वार्थ सेवा को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से भी सम्मानित किया था. हालांकि, अंके गौड़ा के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार वह छात्र हैं, जो उनके पुस्तकालय से पढ़कर आज बड़े पदों पर काम कर रहे हैं. उनकी कहानी हमें सिखाती है कि संसाधनों की कमी कभी भी बड़े इरादों के आगे नहीं आती है. एक मामूली बस कंडक्टर ने पूरी दुनिया को यह साबित कर दिया कि अगर इंसान की नीयत साफ हो, तो एक अकेला व्यक्ति भी समाज में एक बहुत बड़ी क्रांति लाने का काम कर सकता है.
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