जबलपुर के 21 साल के अथर्व चतुर्वेदी (Arthav Chaturvedi) ने बिना किसी के डिग्री के अपने लिए न्याय (Justice) की लड़ाई खुद ही की है. सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने की जमकर सरहाना की है.
अथर्व चतुर्वेदी ने बिना किसी के डिग्री के अपने लिए न्याय की लड़ाई खुद लड़ी है.
Who is Arthav Chaturvedi: मध्य प्रदेश के जबलपुर के 21 साल के अथर्व चतुर्वेदी ने वो कर दिखाया है जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं होगा. उन्होंने यह साबित कर दिया है कि न्याय पाने के लिए आपके पास महंगी डिग्री होना अनिवार्य नहीं होता है, मजबूत इरादों के साथ-साथ कानून की अच्छी समझ होना सबसे ज्यादा जरूरी है.
मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले अथर्व चतुर्वेदी की कहानी किसी फिल्मी कहानी से बिल्कुल भी कम नहीं लगती है. दरअसल, उन्होंने कानून की पढ़ाई (LLB) नहीं की है, लेकिन उनके अंदर न्याय दिलाने की एक ऐसी आग थी जिसने उन्हें देश की सबसे बड़ी अदालत के कटघर में आखिरकार खड़े होने का सुनहरा मौक दिया.
उन्होंने देश को यह साबित कर दिया कि सिर्फ 12वीं पास होनी सब कुछ नहीं होता है. तो वहीं, दूसरी तरफ उन्होंने बिना किसी वकील के सुप्रीम कोर्ट में अपना केस खुद लड़ा और शानदार जीत हासिल कर हर किसी को पूरी तरह से हैरान कर दिया. उनका उदाहरण अब देश के कानूनी इतिहास में एक प्रेरणादायक उदाहरण माना जा रहा है.
जानकारी के मुताबिक, अथर्व का विवाद एक राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा और उससे जुड़ी समस्याओं को लेकर था. लेकिन, जब उन्हें यह लगा कि उनके साथ अन्याय किया जा रहा है, तो उन्होंने हार मानने के बजाय कानूनी किताबों का सहारा लेना शुरू कर दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने 'एडवोकेट्स एक्ट' की धारा 32 का अध्ययन किया, जो किसी भी तरह के भी गैर-वकील व्यक्ति को अदालत की अनुमति से अपना केस खुद लड़ने (Party-in-Person) का अधिकार देती है.
तो वहीं, दूसरी तरफ निचली अदालतों से होते हुए जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा, तो कई लोगों को लगा कि एक 12वीं पास युवक अनुभवी वरिष्ठ वकीलों के सामने आखिर कैसे टिक पाएगा?
लेकिन, उन्होंने यह ठान लिया था कि उन्हें हार नहीं माननी है. इसके साथ ही हफ्तों तक लाइब्रेरी में बैठकर कानूनी किताबों के साथ-साथ पुराने फैसलों औक ड्राफ्टिंग की कला को अच्छे से न सिर्फ सीखा बल्कि समझने की पूरी तरह से कोशिश भी की.
सुनवाई के दौरान, जब अथर्व ने अपनी दलीलें पेश करना शुरू किया, तो सुप्रीम कोर्ट के जज भी उनकी कानूनी समझ देखकर पूरी तरह से दंग रह गए. जहां, उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के संवैधानिक तथ्यों को जजों के सामने रखा. तो वहीं, दूसरी तरफ कोर्ट ने न सिर्फ उनकी दलीलों को सुना, बल्कि उनके साहस की जमकर तारीफ भी की. और आखिरी में फैसला अथर्व के पक्ष में ही देखने को मिला.
अथर्व ने समाज को क्या दिया संदेश?
अथर्व चतुर्वेदी की यह जीत हमें दो बड़ी बातें सिखाती हैं. पहला डिग्री केवल एक कागज का टुकड़ा हो सकती है, लेकिन वास्तविक ज्ञान अनुभव और लगन से ही आता है. और दूसरा अगर नागरिक अपने अधिकारों और कानूनों के प्रति जागरूक हों, तो वे व्यवस्था की खामियों को एक बड़ी चुनौतियों में पूरी तरह से बदल सकते हैं. आज अथर्व उन सभी युवाओं के लिए एक प्रेरणा बन गए हैं, जो संसाधनों की कमी के बावजूद भी कुछ बड़ा करने का सपना देखते हैं.
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