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Israel-Iran Conflict Expained: तीसरा विश्व युद्ध शुरू? दो हिस्सों में बँटी दुनिया, मिडिल ईस्ट महाजंग में आमने-सामने महाशक्तियां!

क्या इज़राइल-ईरान संघर्ष तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत है? महाशक्तियां दो खतरनाक गुटों में बँट चुकी हैं. जानिए किन देशों के बीच छिड़ चुका है ये महाविनाशकारी खेल...

Israel-Iran Conflict Expained: जैसे ही अमेरिका के ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और इजरायल के ‘ऑपरेशन लायंस रोर’ ने ईरान पर हमले शुरू किए, पूरी दुनिया तुरंत दो ध्रुवों में बंट गई है. यह स्थिति बिल्कुल वैसी ही लग रही है जैसी पिछले विश्व युद्धों से पहले देखी गई थी. अब यह लड़ाई सिर्फ वाशिंगटन और तेहरान के बीच नहीं रह गई है, बल्कि यह इस बात की जंग बन चुकी है कि मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) के भविष्य पर राज कौन करेगा?

अमेरिकी गठबंधन: आधुनिक ‘मित्र राष्ट्र’

इस हमले की कमान मुख्य रूप से अमेरिका और इजरायल के हाथों में है, जिन्हें पश्चिमी देशों का पूरा खुफिया और लॉजिस्टिक सपोर्ट मिल रहा है. ब्रिटेन हमेशा की तरह अमेरिका के साथ मजबूती से खड़ा है और नाटो (NATO) के अन्य देश भी कूटनीतिक समर्थन दे रहे हैं. इनका साफ कहना है कि वे ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खत्म करना चाहते हैं ताकि इस क्षेत्र में पश्चिमी देशों का दबदबा बना रहे.

ईरान का ‘प्रतिरोध का धुरी’ (Axis of Resistance)

अमेरिका की विशाल सैन्य ताकत का मुकाबला करने के लिए ईरान ने अपने उन सहयोगियों को एक्टिव कर दिया है जिन्हें वह ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ कहता है. इसमें लेबनान का हिजबुल्लाह, यमन के हूती विद्रोही और इराक व सीरिया के सशस्त्र गुट शामिल हैं. यह एक ऐसी रणनीति है जिसमें कई मोर्चों से एक साथ हमले करके अमेरिका और इजरायल के रक्षा तंत्र को उलझाया जा सके.

रूस और चीन: पर्दे के पीछे के खिलाड़ी

रूस और चीन अभी तक सीधे तौर पर युद्ध के मैदान में नहीं उतरे हैं, लेकिन वे ईरान के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम कर रहे हैं. इन दोनों देशों का फायदा इसी में है कि अमेरिका मिडिल ईस्ट की इस जंग में उलझा रहे और उसकी ताकत कम हो. रूस को अपने संघर्षों के लिए ईरान के ड्रोन चाहिए, जबकि चीन को सस्ते तेल की जरूरत है. दोनों ही देश संयुक्त राष्ट्र (UN) में अमेरिका की आलोचना कर रहे हैं और इस मौके का फायदा उठाकर दुनिया में अपना दबदबा बढ़ाना चाहते हैं.

खाड़ी देश: दो पाटों के बीच में

सऊदी अरब, यूएई और बहरीन जैसे देश इस वक्त सबसे बड़ी दुविधा में हैं. एक तरफ वे चाहते हैं कि ईरान की सैन्य ताकत कम हो, लेकिन दूसरी तरफ उन्हें डर है कि ईरान उन पर पलटवार करेगा। चूंकि उनके यहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं, इसलिए वे सीधे निशाने पर हैं. ये देश खुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं और इस युद्ध में सीधे कूदने से बच रहे हैं ताकि उनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद न हो जाए.

दक्षिण एशिया का अनिश्चित रुख

इस संघर्ष ने पुराने रिश्तों में दरार डाल दी है. पाकिस्तान ने अमेरिका के हमलों की निंदा करते हुए ईरान का साथ दिया है, जबकि वह खुद अफगानिस्तान की सीमा पर संघर्ष कर रहा है. ऐसे चौंकाने वाले कदम बताते हैं कि यह युद्ध केवल अरब देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दक्षिण एशिया जैसे परमाणु संपन्न क्षेत्रों तक भी फैल सकता है.

तो क्या यह तीसरा विश्व युद्ध है?

सैन्य जानकारों का मानना है कि भले ही यह एक बहुत बड़ी और विनाशकारी क्षेत्रीय जंग है, लेकिन तकनीकी रूप से इसे अभी ‘तीसरा विश्व युद्ध’ नहीं कहा जा सकता. एक विश्व युद्ध तब होता है जब बड़ी महाशक्तियां (जैसे अमेरिका, रूस और चीन) सीधे एक-दूसरे पर गोलियां चलाने लगें। जब तक रूस और चीन केवल कूटनीतिक और आर्थिक मदद तक सीमित हैं, तब तक इसे एक महा-विनाशकारी क्षेत्रीय युद्ध ही माना जाएगा.

Shivani Singh

नमस्ते, मैं हूँ शिवानी सिंह. पिछले 5 से अधिक वर्षों से डिजिटल मीडिया में सब-एडिटर, एंकर और कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट के रूप में सक्रिय हूँ. 'Chakde Cricket', 'InKhabar' और 'Bihari News' जैसे प्रमुख मीडिया हाउसों में काम करने के बाद, वर्तमान में मैं 'इंडिया न्यूज़' में अपनी सेवाएँ दे रही हूँ. क्रिकेट के मैदान से जुड़ी इनसाइड स्टोरीज़, मैच एनालिसिस और आंकड़ों की बारीकियों को डिकोड करना मेरी मुख्य विशेषज्ञता है. क्रिकेट के अलावा, मैं बिजनेस/फाइनेंस (मार्केट ट्रेंड्स, सरकारी योजनाएं और पर्सनल फाइनेंस), राजनीति और बॉलीवुड के ज्वलंत मुद्दों पर भी पैनी नज़र रखती हूँ. मेरा उद्देश्य हर जटिल विषय को आपके लिए आसान भाषा में प्रस्तुत करना है.

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