Human Behavior: हम बचपन से सुनते आ रहे हैं कि औरतें ज्यादा भावुक होती हैं, ज्यादा समझदार होती हैं, दूसरों का दर्द जल्दी समझ लेती हैं. और मर्दों के बारे में कहा जाता है कि वो कम रोते हैं, कम भाव दिखाते हैं, इसलिए कम संवेदनशील होते हैं.लेकिन क्या सच में ऐसा है? या ये बस समाज की बनाई हुई सोच है? आइए जानते हैं.
क्या महिलाएं सच में पुरुषों से ज्यादा संवेदनशील होती हैं?
Empathy Social Norms: अक्सर लोग कहते हैं कि महिलाएं पुरुषों से ज्यादा दूसरों का दर्द समझती हैं. उन्हें ज्यादा संवेदनशील, भावुक और दिल से सोचने वाली होती हैं. वहीं पुरुषों को मजबूत, कम बोलने वाला और भावनाएं कम दिखाने वाला समझा जाता है.लेकिन यह धारणा कहां से आई? क्या यह सच में शरीर की बनावट से जुड़ी है या समाज ने हमें ऐसा बना दिया है?
बीबीसी के अनुसार सहानुभूति का मतलब है किसी और की भावना को समझना और उसके दर्द या खुशी को महसूस करना. सिर्फ इतना नहीं कि “हाँ, वो दुखी है”, बल्कि अंदर से जुड़ जाना.यह एक इंसानी क्षमता है. हर किसी में होती है, बस मात्रा और तरीका अलग हो सकता है.
बचपन से ही लड़कों और लड़कियों को अलग तरीके से पाला जाता है.लड़कियों से कहा जाता है कि सबका ध्यान रखो, नरम रहो, खुलकर रो लो.
लड़कों से कहा जाता है कि मजबूत बनो, ज्यादा मत रो, भावनाएं मत दिखाओ.जब किसी को बार-बार कहा जाए कि भावना दिखाना कमजोरी है, तो वह उन्हें दबाना सीख जाता है. इसका मतलब यह नहीं कि उसके अंदर भावना नहीं है. बस वह उन्हें जाहिर नहीं करता.
कुछ शोध बताते हैं कि औसतन महिलाएं सहानुभूति के परीक्षणों में थोड़ा आगे हो सकती हैं. लेकिन यह अंतर बहुत बड़ा नहीं होता. कई जगह तो पुरुष और महिलाएं लगभग बराबर पाए गए हैं.असली बात यह है कि एक ही लिंग के लोगों के बीच का फर्क, पुरुष और महिला के औसत फर्क से ज्यादा होता है. यानी हर महिला बहुत संवेदनशील और हर पुरुष कम संवेदनशील, ऐसा नहीं है.
इतिहास में पुरुषों के पास ज्यादा सामाजिक ताकत रही है. कई बार जिन लोगों के पास शक्ति होती है, वे दूसरों की भावनाओं पर कम ध्यान देते हैं. यह भी एक कारण हो सकता है कि फर्क दिखता है.लेकिन जैसे-जैसे समाज बदल रहा है, भूमिकाएं भी बदल रही हैं. अब बहुत से पुरुष बच्चों की देखभाल में सक्रिय हैं और खुलकर भावनाएं व्यक्त करते हैं.
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