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हम जिस जुगाड़ की बात कर रहे हैं वो एक इको फ्रेंडली तकनीक है. वैसे तो इसे एल्गी ट्री कहा जा रहा है. इसकी खास बात ये है कि ना तो इसमें पत्ते हैं और न टहनी. फिर भी ये स्मार्ट मशीन वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड खींचकर 25 पेड़ों के बराबर ऑक्सीजन पैदा करती है.
Natural Air Purifier: न टहनियां, न पत्ते, फिर भी 25 पेड़ों जितनी ऑक्सीजन देता है Algae Tree, दिल्ली-NCR के लिए वरदान!
दिल्ली-NCR में जब भी प्रदूषण बढ़ता है तो सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है. हवा में मौजूद टॉक्सिंस के कारण फेंफड़े जाम हो जाते हैं, जिससे खांसी और सांस फूलने जैसी समस्याएं होने लगती हैं. ऐसी स्थिति में सबसे पहले पेड लगाने और पर्यावरण को बचाने का ख्याल आता है, लेकिन कंक्रीट के इन जंगलों में असली पेड़ लगाने की जगह तो बची नहीं, इसलिए हमारे वैज्ञानिकों ने एक ऐसा पेड़ खोज निकाला है, जिसमें न तो टहनी हैं और न ही पत्ते. पेड लगाने के लिए मिट्टी और खाद भी नहीं लगती. चौंकाने वाली बात तो ये है कि सिर्फ एक ही जुगाड़ 25 पेड़ों जितना ऑक्सीजन देता है.
जी हैं. हम बात कर रहे हैं Algae Tree की, जो एक फ्यूचरिस्टिक एयर-प्यूरिफायर है. दिल्ली-NCR जैसी घनी आबादी और प्रदूषण से जूझने वाले इलाकों के लिए तो एल्गी ट्री किसी वरदान से कम नहीं है. कुछ ही समय पहले भोपाल के स्वामी विवेकानंद पार्क में भारत का पहला ‘Algae Tree’ लगाया गया है, जिसके बाद सोशल मीडिया पर इसकी काफी चर्चा हो रही है.
एल्गी ट्री एक धूप से चलने वाली मशीन है, जिसके ऊपर एक सोलर पैनर और नीचे एक पारदर्शी बायो-रिएक्टर चैंबर होता है. इस चैंबर में पानी और ‘माइक्रोएल्गी’ भरी होती है. ये हरी काई सूरज की रोशनी से Photosynthesis के जरिए जहरीली हवा सोख लेती है और बदले में ऑक्सीजन छोड़ती है.
इस सिस्टम का बायो-रिएक्टर आसपास की कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर शुद्ध ऑक्सीजन बनाता है और रिलीज करता है. इस तकनीक की सबसे अच्छी बात तो ये है हवा में मौजूद PM2.5 कणों और बारीक धूल को भी अपने अंदर जकड़ लेता है.
रिपोर्ट्स की मानें तो देश के पहले एल्गी ट्री को 2 साल की रिसर्च के बाद तैयार किया गया है. एक ही प्लांट साल में 1.5 टन कार्बन डाइऑक्साइड एब्जॉर्व करके 1 टन शुद्ध ऑक्सीजन रिलीज करने की क्षमता है. आसान शब्दों में समझें तो जितना काम 25 हरे-भरे पेड़ करते हैं, उतनी क्षमता एक एल्गी प्लांट का सिस्टम कैरी करता है. सबसे अच्छी बात ये है कि एल्गी प्लांट में बिजली या ईंधन का कोई खर्च नहीं है. ये सोलर पैनर से चलता है.
एक्सपर्ट्स की मानें तो ये तकनीक असली पेड़ों की जगह नहीं ले सकती, क्योंकि असली पेड़ पर्यावरण के संतुलन, छांव, मिट्टी की सेहत और जैव-विविधता के लिए बहुत जरूरी हैं. लेकिन इसे मेट्रो स्टेशनों, ट्रैफिक सिग्नलों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में स्थापित करके प्रदूषण को कम करने में मदद मिल सकती है.
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