Blackened Teeth Tradition: आज हम आपको एक ऐसी हैरतअंगैज पंरपरा के बारे में बताने वाले है, जहां लड़कियों के दांत काले किए जाते है.
Blackened Teeth Tradition
इस परंपरा के पीछे एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया थी. जापान में लोहे की बुरादे को सिरके में मिलाकर एक गाढ़ा काला तरल तैयार किया जाता था, जिसे ‘कनेमिज़ु’ कहा जाता था. इस घोल में गालनट पाउडर, चाय की पत्तियां, लौंग और दालचीनी जैसे तत्व मिलाए जाते थे ताकि स्वाद और सुगंध सुखद रहे. बांस की ब्रश, पंख या लकड़ी की छोटी छड़ियों से यह मिश्रण दांतों पर सावधानीपूर्वक लगाया जाता था. भारत में ‘मिस्सी’ के रूप में आयरन सल्फेट और हर्बल तत्वों का उपयोग किया जाता था. इसका उपयोग न केवल रंग बदलने के लिए बल्कि दांतों को कीड़ा लगने और संक्रमण से बचाने के लिए भी किया जाता था.
इस परंपरा के पीछे केवल सांस्कृतिक कारण ही नहीं थे, बल्कि इसमें छिपा था एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण. मिश्रण में मौजूद लौह तत्व और टैनिन दांतों की सतह पर एक मजबूत परत बना देते थे. यह परत बैक्टीरिया और एसिड से दांतों की रक्षा करती थी. आधुनिक शोध में पाया गया कि जिन लोगों ने ओहागुरो या मिस्सी जैसी प्रथाएं अपनाईं, उनके दांत दशकों तक सड़े बिना सुरक्षित रहे. कह सकते हैं कि यह परंपरा आधुनिक डेंटल सीलेंट का पारंपरिक रूप थी.
19वीं सदी के उत्तरार्ध में पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण सौंदर्य मानकों में बदलाव आया. 1870 में जापान की सरकार ने ओहागुरो पर आधिकारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया. सम्राज्ञी ने सार्वजनिक रूप से बिना काले दांतों के उपस्थिति दी, जो एक नए फैशन युग की शुरुआत थी. अभिजात वर्ग ने भी इसे धीरे-धीरे त्याग दिया. भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया में भी यह प्रथा शहरों में लगभग समाप्त हो गई. आज यह केवल नाटकों, गीशा परफॉर्मेंस और कुछ ग्रामीण जनजातियों में ही दिखाई देती है.
इस परंपरा का असर केवल वास्तविक जीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोककथाओं में भी अमर हो गया. जापान में ‘ओहागुरो बेट्टारी’ नामक भूतिया कथा में एक महिला के काले दांत और बिना चेहरे के प्रेत रूप का वर्णन है. यह कहानी इस प्रथा की गहराई और सांस्कृतिक प्रभाव को दर्शाती है.
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