Seema Kumari Asian Games 2026: हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के रेटा गांव की 25 वर्षीय धाविका सीमा कुमारी ने एशियन गेम्स 2026 में महिलाओं की 10,000 मीटर स्पर्धा में 32:50.05 के समय के साथ कांस्य पदक जीता. यह इस स्पर्धा में भारत का 16 साल बाद पहला एशियन गेम्स पदक है. खास बात यह है कि सीमा ने अपनी 78 वर्षीय मां को यह नहीं बताया था कि वह जापान में एशियन गेम्स खेलने जा रही हैं, क्योंकि उन्हें मां की चिंता और सेहत की फिक्र थी.
सीमा ने एशियन गेम्स में जीता कांस्य
Seema Kumari Asian Games 2026: हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के छोटे से गांव रेटा से निकलकर एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंचने वाली सीमा कुमारी की कहानी सिर्फ एक पदक की कहानी नहीं है. 25 साल की इस धाविका ने महिलाओं की 10,000 मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर भारत के लिए इतिहास रच दिया. लेकिन इस ऐतिहासिक दौड़ से पहले उन्होंने अपनी 78 वर्षीय मां को यह तक नहीं बताया था कि वह जापान के नागोया में एशियन गेम्स खेलने जा रही हैं. वजह थी मां की चिंता और उनकी सेहत. सीमा जानती थीं कि उनकी मां को पता चला कि बेटी जापान जा रही है तो वह परेशान हो जाएंगी. इसलिए उन्होंने मां को यही बताया कि वह ट्रेनिंग के सिलसिले में बाहर हैं. परिवार में सिर्फ उनकी बड़ी बहन को पता था कि सीमा वास्तव में जापान पहुंच चुकी हैं और एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं.
पदक जीतने के बाद सीमा ने बताया कि उनके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं और उनकी मां काफी बुजुर्ग हैं. जब भी वह किसी प्रतियोगिता या ट्रेनिंग के लिए बाहर जाती हैं तो मां काफी तनाव में आ जाती हैं. उनकी मां को हाई ब्लड प्रेशर की भी समस्या है. इसी वजह से सीमा उन्हें अपनी यात्राओं की पूरी जानकारी नहीं देतीं. सीमा ने बताया कि उनकी बड़ी बहन को पूरी जानकारी थी. उन्होंने उम्मीद जताई कि शायद बहन ने मां को बता दिया होगा या फिर मां ने टीवी पर उन्हें एशियन गेम्स में दौड़ते हुए देख लिया होगा. यानी जिस वक्त सीमा देश के लिए पदक की दौड़ लगा रही थीं, उनकी मां शायद अब भी यही समझ रही थीं कि बेटी ट्रेनिंग कैंप में है.
सीमा की सफलता के पीछे संघर्ष की लंबी कहानी है. चंबा के रेटा गांव में पली-बढ़ी सीमा ने कम उम्र में अपने पिता को खो दिया था. इसके बाद उनकी मां और परिवार ने उन्हें आगे बढ़ने में सहयोग दिया. गांव में सुविधाओं की कमी के बीच सीमा ने सड़कों और छोटे से स्कूल मैदान पर दौड़ लगाकर अपनी तैयारी शुरू की. शुरुआती दिनों में उनके पास प्रशिक्षण की आधुनिक सुविधाएं और संसाधन भी नहीं थे. बचपन में मवेशी चराने से लेकर दौड़ को अपना करियर बनाने तक का उनका सफर आसान नहीं रहा. लेकिन परिवार के समर्थन और अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने धीरे-धीरे जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का रास्ता तय किया. सीमा 2015 में धर्मशाला के साई सेंटर से भी जुड़ीं और आगे चलकर लंबी दूरी की दौड़ में अपनी पहचान बनाई.
सीमा पिछले करीब तीन वर्षों से कोच स्कॉट सिमंस के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण ले रही हैं और अमेरिका में कैंप व ट्रेनिंग का अनुभव भी हासिल कर चुकी हैं. उनके मुताबिक वहां ओलंपिक चैंपियनों के साथ प्रशिक्षण ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में तैयारी करने और मानसिक रूप से मजबूत होने में मदद की. चंबा के एक छोटे से गांव से निकलकर एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंची सीमा की कहानी में इसलिए सिर्फ 32:50.05 का समय नहीं है. इसमें उस मां का साथ भी है जिसने बेटी के सपने को आगे बढ़ाया और उस बेटी की मेहनत भी, जिसने मां की चिंता से बचाने के लिए अपना सफर छिपाया. अब वही बेटी देश के लिए ऐतिहासिक पदक जीतकर अपने घर और गांव तक खुशी की खबर पहुंचा चुकी है.
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