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200 किलोमीटर का रोजाना सफर,600 गेंद रोज; पिता नाइट क्लब में बाउंसर; आसान नहीं था वैभव सूर्यवंशी का बल्लेबाज बनना

Vaibhav Suryavanshi: सूर्यवंशी ने यह कामयाबी सिर्फ दो दिन में हासिल नहीं की. यह तब शुरू हुआ जब वह सिर्फ चार साल के थे. सूर्यवंशी का बैट्समैन बनने का सफर आसान नहीं था. यह उनके पिता का सपना था और उन्होंने इसे पूरा करने के लिए हर दिन मीलों का सफर तय किया. तो चलिए जानते हैं कि बिहार के एक शांत शहर का लड़का कैसे एक खतरनाक बल्लेबाज बना.

Vaibhav Suryavanshi: आप शायद बिहार के समस्तीपुर जिले के बारे में जानते होंगे. लेकिन क्या आप ताजपुर के बारे में जानते हैं? यह बिहार का एक छोटा सा शहर है. आप सोच रहे होंगे कि ताजपुर में कुछ खास है, इसलिए हम इसके बारे में बात कर रहे हैं. लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि ताजपुर ने हमें क्या दिया है. ताजपुर ने हमें एक ऐसा सितारा दिया है जिसकी चमक के आगे बड़े-बड़े क्रिकेटर भी फीके पड़ जाते हैं. जी हां, हम बात कर रहे हैं बिहार के लाला वैभव सूर्यवंशी की. जिस शहर की रफ्तार आज भी चाय की चुस्कियों से मापी जाती है वहां से निकले 15 साल के लड़के ने अपने बल्लेबाजी से दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट लीग में तबाही मचा रखी है. दुनिया के बड़े-बड़े गेंदबाज सूर्यवंशी के आगे खौफ खाते हैं. राजस्थान रॉयल्स के ओपनर वैभव सूर्यवंशी ने शुक्रवार को गुवाहाटी में IPL 2026 के मैच में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के खिलाफ 15 गेंदों पर 50 रन बनाए. यह सूर्यवंशी का IPL 2026 सीज़न का दूसरा 15 गेंदों में अर्धशतक था. मुकाबले में सूर्यवंशी ने 26 गेंदों पर 78 रन बनाए. जिसके बदौलत राजस्थान रॉयल्स ने डिफेंडिंग चैंपियन रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु को छह विकेट से हराया. इससे पहले गलवार को जब वैभव ने दुनिया के सबसे अच्छे बॉलर जसप्रीत बुमराह के एक ओवर में दो छक्के मारे, तो हर कोई हैरान रह गया.सूर्यवंशी ने यह कामयाबी सिर्फ दो दिन में हासिल नहीं की. यह तब शुरू हुआ जब वह सिर्फ चार साल के थे. सूर्यवंशी का बैट्समैन बनने का सफर आसान नहीं था. यह उनके पिता का सपना था और उन्होंने इसे पूरा करने के लिए हर दिन मीलों का सफर तय किया. तो चलिए जानते हैं कि बिहार के एक शांत शहर का लड़का कैसे एक खतरनाक बल्लेबाज बना.

पिता का अधूरा सपना

वैभव सूर्यवंशी की कहानी उनके पिता संजीव सूर्यवंशी के बिना अधूरी है. संजीव खुद क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन उस समय बिहार को BCCI से मान्यता नहीं मिलने के कारण उनका सपना अधूरा रह गया. संजीव अपने संघर्ष के दिनों में मुंबई चले गए. वहां उन्होंने एक शिपिंग यार्ड में काम किया पोर्ट पर मेहनत की और कभी-कभी एक नाइट क्लब में बाउंसर का भी काम किया. एक करीबी दोस्त राजेश झा ने क्रिकेट मंथली को बताया, “वैभव के पिता को भी एक्टिंग का शौक था लेकिन गुजारा करने के लिए उन्हें कई तरह की नौकरियां करनी पड़ीं.” लगभग एक दशक तक संघर्ष करने के बाद, संजीव ताजपुर लौट आए और परिवार की ज्वेलरी की दुकान संभाली लेकिन क्रिकेट के लिए उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ.

100 किलोमीटर की साइकिल

संजीव के क्रिकेट के प्रति प्यार का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी टीनएज में वह हर साल सिर्फ़ एक टूर्नामेंट का फ़ॉर्म लेने के लिए 100 किलोमीटर साइकिल चलाकर पटना जाते थे. उन्होंने अपने बेटे में भी यही जुनून भरा.वैभव को उसके चौथे जन्मदिन पर पहली बार बल्ला दिया गया था. तब से उसके खेल में कुछ अलग दिखने लगा. 2018 के आसपास जब उसका टैलेंट सामने आया तो संजीव ने फिर से वही संघर्ष शुरू किया लेकिन इस बार अपने बेटे के लिए.

पिता ने नहीं मानी हार

संजीव ने एक सेकंड-हैंड SUV खरीदी और हर दूसरे दिन ताजपुर और पटना के बीच 200 किलोमीटर का सफर करने लगा. वैभव ने पटना के संपतचक में जेन नेक्स्ट क्रिकेट एकेडमी में ट्रेनिंग ली. जहां कोच मनीष कुमार ओझा ने उसे कोचिंग दी. सफर आसान नहीं था. तीन घंटे का एक तरफ का सफर सुबह चार बजे उठना और देर रात घर लौटना एक रूटीन बन गया था. कोच ओझा ने क्रिकेट मंथली को बताया, “रोज सुबह चार बजे उठना 100 किलोमीटर का सफर करना ट्रेनिंग करना और फिर वापस आना यह आसान नहीं था. लेकिन वैभव और उनके पिता ने कभी हार नहीं मानी.”

एक दिन में 600 गेंदें

वैभव की ट्रेनिंग भी उतनी ही कड़ी थी. ओझा बताते हैं, “मैं आमतौर पर बच्चों को 200-250 गेंदें डालता हूं लेकिन वैभव के लिए कोई गिनती नहीं थी. वह एक दिन में कम से कम 600 गेंदें खेलता था.” सबसे जरूरी बात यह थी कि वैभव को अटैक सिखाया गया डिफ़ेंस नहीं. फोकस हर गेंद के लिए नए शॉट और ऑप्शन डेवलप करने पर था.

13 साल की उम्र में करोड़ों की बात क्यों?

 जब कोई फ्रेंचाइजी 13 साल के खिलाड़ी के लिए ₹10 करोड़ अलग रखती है, तो यह सिर्फ टैलेंट की कहानी नहीं है, बल्कि सालों की कड़ी मेहनत और त्याग से बने भरोसे की कहानी है. वैभव सिर्फ़ एक खिलाड़ी नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम का उदाहरण हैं जहां छोटे शहरों से भी बड़े सपने पूरे किए जा सकते हैं.

Divyanshi Singh

दिव्यांशी सिंह उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले की रहने वाली हैं। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई की है और पिछले 4 सालों से ज्यादा वक्त से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। जियो-पॉलिटिक्स और स्पोर्टस में काम करने का लंबा अनुभव है।

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