Misleading Ads: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी विज्ञापन तब तक पोस्ट, ब्रॉडकास्ट या दिखाया नहीं जाएगा, जब तक विज्ञापन देने वाला पहले से यह सेल्फ-स्टेटमेंट न दे दे कि विज्ञापन गुमराह करने वाला नहीं है.
गुमराह करने वाले विज्ञापनों पर कार्रवाई होगी
Misleading Ads: उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाले विज्ञापनों से बचाने के मकसद से सुप्रीम कोर्ट ने 07.05.2024 को एक आदेश दिया. कोई भी विज्ञापन तब तक पोस्ट, ब्रॉडकास्ट, एयर या दिखाया नहीं जाएगा, जब तक विज्ञापन देने वाला पहले से यह सेल्फ-स्टेटमेंट न दे दे कि विज्ञापन गुमराह करने वाला नहीं है. कोर्ट ने स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार और सूचित उपभोक्ता पसंद को लागू करने के लिए अपनी संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल किया.
यह आदेश पतंजलि के खिलाफ गुमराह करने वाले विज्ञापन प्रकाशित करने के मामले में अवमानना की सुनवाई के दौरान पारित किया गया था. लेकिन, कोर्ट ने इस मौके का इस्तेमाल पूरे भारत में धोखे वाले स्वास्थ्य और FMCG विज्ञापनों की बड़ी सिस्टमैटिक समस्या को संबोधित करने के लिए किया. यह आदेश जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस एहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिया.
यह विज्ञापनों में गुमराह करने वाले मेडिकल और स्वास्थ्य दावों से जुड़ा एक चल रहा मामला है. कोर्ट ने साफ किया कि मौजूदा रेगुलेटरी सिस्टम धोखाधड़ी वाले प्रमोशन के प्रसार को रोकने में मदद नहीं कर रहा था और इसलिए न्यायपालिका को खाली जगह भरने के लिए दखल देना पड़ा.
यह रिट याचिका मूल रूप से इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) द्वारा दायर की गई थी. इसमें मेडिकल उपचार और स्वास्थ्य उत्पादों से संबंधित गुमराह करने वाले विज्ञापनों के बारे में चिंता जताई गई थी. सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने इस मुद्दे के दायरे को बढ़ाकर भारत में विज्ञापन विनियमन के पूरे इकोसिस्टम, आयुष मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय, उपभोक्ता मामले मंत्रालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय और राज्य लाइसेंसिंग अधिकारियों की भूमिका की जांच की. इस मामले में यह भी जांच की गई कि क्या गुमराह करने वाले विज्ञापनों के खिलाफ शिकायतें पोर्टल के तहत मिली शिकायतों पर वास्तव में कार्रवाई की जा रही थी और क्या केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) के दिशानिर्देशों को सही तरीके से लागू किया जा रहा था.
तत्काल कार्रवाही के सामने लाए गए अन्य दावों में ये आरोप शामिल थे कि कुछ पक्ष सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले दिए गए आदेशों के बावजूद अभी भी धोखे वाले विज्ञापन जारी कर रहे थे. सार्वजनिक रूप से माफी मांगी गई. फिर भी, कोर्ट एक बड़ी संरचनात्मक समस्या में उलझ गया कि कई कानून पहले ही बनाए जाने के बावजूद धोखे वाले विज्ञापन अभी भी क्यों फल-फूल रहे हैं.
बेंच ने अलग-अलग मंत्रालयों के हलफनामों की जांच की और पाया कि लागू करने की स्थिति बहुत असंतोषजनक है. आंकड़ों से पता चला कि पिछले कुछ सालों में काफी संख्या में शिकायतें मिलीं लेकिन बहुत कम मामलों में कोई असली कार्रवाई हुई. कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि उपभोक्ताओं से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे राहत पाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाएं. सिस्टम को एक स्पष्ट और प्रभावी समाधान देना चाहिए.
कोर्ट ने यह भी कहा कि ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज़ एक्ट, ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट के तहत कानूनी सुरक्षा होने के बावजूद, गुमराह करने वाले विज्ञापन बहुत कम या बिना किसी जवाबदेही के सर्कुलेट होते रहे. फैसले का एक और ध्यान खींचने वाला हिस्सा मशहूर हस्तियों की सिफारिशों से जुड़ा है. कोर्ट ने चेतावनी दी है कि मशहूर हस्तियां और इन्फ्लुएंसर गुमराह करने वाले सामानों के प्रमोशन से बच नहीं सकते.
इसने बताया कि ग्राहकों पर मशहूर हस्तियों की सिफारिश का प्रभाव बहुत ज़्यादा होता है और इसलिए उन्हें उचित सावधानी बरतनी चाहिए. कोर्ट ने CCPA गाइडलाइंस पर बहुत ज़्यादा भरोसा किया. खासकर गाइडलाइन 13 पर, जिसमें एंडोर्समेंट से पहले उचित सावधानी बरतने की जरूरत होती है. कोर्ट ने कहा कि पहले से ही गाइडलाइंस मौजूद हैं. विज्ञापन गुमराह करने वाला नहीं होना चाहिए. कोर्ट ने इस मामले को सिर्फ़ कंज्यूमर प्रोटेक्शन का मामला नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ा एक संवैधानिक मामला माना.
अब से किसी भी विज्ञापन को प्रिंट/प्रसारित/दिखाने से पहले, विज्ञापनदाता/विज्ञापन एजेंसी द्वारा एक स्व-घोषणा पत्र जमा किया जाएगा. कोर्ट ने कहा कि घोषणा में यह पुष्टि करनी होगी कि विज्ञापन कानून का उल्लंघन नहीं करता है और न ही इसमें कोई झूठे या गुमराह करने वाले बयान हैं. कोर्ट ने केबल टेलीविजन नियमों के नियम 7 के ढांचे का इस्तेमाल किया, जो ऐसे विज्ञापनों पर रोक लगाता है जो चमत्कारी या अलौकिक गुणों का दावा करते हैं. टीवी और ब्रॉडकास्टिंग के विज्ञापनों को ब्रॉडकास्ट सेवा पोर्टल पर घोषणाएं अपलोड करनी होंगी.
प्रिंट और इंटरनेट विज्ञापनों के लिए 4 हफ़्तों के भीतर एक नया डेडिकेटेड पोर्टल बनाया जाना चाहिए. स्व-घोषणा अपलोड किए बिना किसी भी विज्ञापन को चलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी. उपरोक्त निर्देशों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत इस कोर्ट द्वारा घोषित कानून माना जाएगा. कोर्ट ने सरकारी डेटा की भी जांच की, जिसमें दिखाया गया कि 2018 और 2024 के बीच ब्रॉडकास्टर्स के खिलाफ 1600 से ज़्यादा शिकायतें मिलीं. सिर्फ़ कुछ ही मामलों में कार्रवाई की गई. बेंच ने कार्रवाई के रिकॉर्ड को बहुत ही असंतोषजनक बताया.
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि गुमराह करने वाले विज्ञापन कोई छोटी-मोटी रेगुलेटरी समस्या नहीं हैं. बल्कि, यह सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के अधिकारों से जुड़ा मामला है, जो लोगों के स्वास्थ्य और समाज में भरोसे से जुड़ा है. कोर्ट ने आगे इस बात पर ज़ोर दिया कि कानूनों, नियमों और गाइडलाइंस का पूरा सेट इस तरह से बनाया गया है, वे उपभोक्ताओं को फायदा पहुंचाएं. साथ ही यह साफ करें कि ग्राहकों को इस बारे में साफ जानकारी मिले कि वे क्या खरीद रहे हैं.
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