Supreme Court Justice Ujjal Bhuyan: सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जस्टिस उज्जल भुइयां ने डेमोक्रेसी, बोलने की आज़ादी और नागरिक अधिकारों के बारे में ज़रूरी बातें कही हैं. मध्य प्रदेश के भोपाल में एक इवेंट में बोलते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी डेमोक्रेटिक सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत नागरिकों का असहमति जताने और शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार है.
जस्टिस भुइंया ने कहा अभिव्यक्ति की आजादी सिमट रही
Supreme Court Justice Ujjal Bhuyan: सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जस्टिस उज्जल भुइयां ने डेमोक्रेसी, बोलने की आज़ादी और नागरिक अधिकारों के बारे में ज़रूरी बातें कही हैं. मध्य प्रदेश के भोपाल में एक इवेंट में बोलते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी डेमोक्रेटिक सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत नागरिकों का असहमति जताने और शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार है.
जस्टिस उज्जल भुइयां ने साफ़ किया कि अगर नागरिक आज़ादी से अपने विचार नहीं बता पाते हैं, या अगर कोर्ट बोलने की आज़ादी को सीमित करने वाली शर्तें लगाते हैं, तो ज्यूडिशियरी पर लोगों का भरोसा कम हो सकता है.
नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी में जस्टिस जी.पी. सिंह मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि डेमोक्रेसी सिर्फ़ चुनावों तक सीमित नहीं है; विचारों की विविधता, बहस और असहमति इसकी असली पहचान हैं. उन्होंने कहा कि नागरिकों का शांतिपूर्ण विरोध करने और अपनी राय बताने का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है जिसे किसी भी हालत में कम नहीं किया जाना चाहिए.
वाराणसी में गंगा बोट इफ्तार की घटना का ज़िक्र करते हुए जस्टिस उज्जल भुइयां ने पूछा कि क्या गंगा में बिरयानी खाना जुर्म है? अगर ऐसा कोई कानून नहीं है, तो उन्हें तीन महीने तक बेल क्यों नहीं दी गई? एनवायरनमेंटल एक्टिविस्ट के साथ क्रिमिनल जैसा बर्ताव किया जा रहा है. यूनिवर्सिटी में शांति से प्रोटेस्ट कर रहे स्टूडेंट्स को अरेस्ट और सस्पेंड किया जा रहा है. पूरे देश में शांति से प्रोटेस्ट करने और बोलने की आज़ादी पर रोक लगाई जा रही है.
जस्टिस उज्जल भुयान ने आगे कहा कि बोलने की आज़ादी पर रोक नहीं लगनी चाहिए. कई मामलों में, कोर्ट बेल की ऐसी शर्तें लगा रहे हैं जिनका केस से कोई सीधा कनेक्शन नहीं लगता. उन्होंने फेसबुक पोस्ट और दिल्ली दंगों का ज़िक्र किया और पूछा कि क्या कोर्ट की ऐसी शर्तें लोगों को पब्लिक लाइफ से दूर रहने और अपने विचार रखने का मैसेज नहीं देतीं. उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणियों और मुंबई में गाजा-फिलिस्तीन के सपोर्ट में प्रदर्शन की परमिशन न देने पर भी हैरानी जताई. उन्होंने कहा कि किसी भी ग्लोबल मुद्दे पर शांति से दुख जताना या प्रोटेस्ट करना भी सिविल राइट्स का हिस्सा है.
स्टूडेंट्स के साथ बातचीत के दौरान, जस्टिस भुयान ने कहा कि यूनिवर्सिटी सिर्फ़ डिग्री देने के लिए नहीं हैं, बल्कि आज़ादी से सोचने और सवाल करने के लिए हैं. सरकारें बदलती हैं, लेकिन संविधान बना रहता है. इसलिए, सरकार, पार्लियामेंट और ज्यूडिशियरी, सभी को संविधान की भावना और बुनियाद की रक्षा करनी चाहिए.
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज जस्टिस विशाल धगत ने इस इवेंट की अध्यक्षता की. उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियरी की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी संविधान और व्यक्तिगत आज़ादी की रक्षा करना है. जजों को बिना किसी भेदभाव के, और जनता की भावना या दबाव में आए बिना, कानून और संविधान के आधार पर फ़ैसले देने चाहिए.
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